Thursday, December 31, 2009

सहारा समय के नये न्यूज डायरेक्टर उपेंद्र राय ने पत्रकारिता की दुनिया में एक मिसाल कायम की है।

पत्रकारिता की दुनिया में उपेंद्र राय ने एक नई मिसाल कायम की है। स्टार न्यूज के वरिष्ट संपादक रहे उपेंद्र ने सहारा न्यूज में बतौर न्यूज डायरेक्टर ज्वाईन किया है। इतने कम उम्र में एक बड़े संस्थान का न्यूज डायरेक्टर बनना बड़ी बात है। उपेंद्र के बारे में जितनी तारीफ की जाये वह कम होगा। क्योंकि उसका व्यक्तित्व ही ऐसा है।

ब्रेकिंग न्जूय - उपेंद्र ने हार्ड न्यूज से लेकर मनोरंजन की दुनिया तक में ऐसे न्यूज ब्रेक किये जिसके बारे में आम लोग जानना चाहते हैं। उन्होंने दर्जनों न्यूज ब्रेक किये हैं लेकिन जो याद है उनका उल्लेख आगे कर रहा हूं। 20 अक्टूबर 2005 को उन्होंने डीमेट एकाउंट घोटाला का पर्दाफाश किया था। इस घोटाले में देश की बड़ी बड़ी फाईनेंश कंपनियां और ट्रैड से जुड़े दिग्गज लोग शामिल थे। इनलोगों ने गरीब लोगों ने नाम पर फर्जी डीमेट एकाउंट खोल रखे थे और करोड़ो करोड़ रुपये के घोटाले को अंजाम दिया। उपेंद्र की रिपोर्ट के बाद दिल्ली से लेकर मुंबई तक की सारी सरकारी मशिनरी हरकत में आई।

26 अक्टूबर 2005-2006 के दौरान उपेंद्र ने फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन सहित अन्य कलाकारों के कमाई का लेखा जोखा पेश किया। और टैक्स से जुड़े सारे मामले सामने लाये। यह खबर भी उन दिनों काफी चर्चित रही। जैसे जैसे समय निकलता गया उपेंद्र एक से एक खोजी खबर जनता के सामने लाते गये।

5 जनवरी 2007 को उन्होंने घोड़े के कारोबार से जुडे हसन अली को लेकर जबरदस्त खबर ब्रेक की । देश-दुनिया से जुड़े 36 हजार करोड के घोटाले का पर्दाफाश जब उपेंद्र ने किया तो सारी दुनिया चकित रह गई। पूरा सरकारी महकमा सकते में आ गया। इतना बड़ा घोटाला देश के सामने पहले कभी नहीं आया था। इसके अलावा दर्जनों हार्ड न्यूज ऐसे हैं जिसका ब्रेक उपेंद्र ने किया। और खास बात यह रही कि जिस न्यूज को ब्रेक उपेंद्र ने किया। वह खबर दूसरे रिपोर्टर को अगले दिन भी ठिक से नहीं मिल पाती थी।

मनोरंजन से जुड़े क्षेत्र में भी उपेद्र का जबरदस्त दखल रहा है। फिल्मी दुनियां की हस्ती ऐश्वर्या और अभिषेक बच्चन की शादी को लेकर मीडिया जगत में कयास लगाये जाते रहे। शादी की तिथियों को लेकर अटकलें लगती रही लेकिन पुख्ता तौर पर इस खबर को उपेंद्र ने हीं स्टार न्यूज में ब्रेक किया।

अवार्ड से सम्मानित -
उनके जाबांजी रिपोर्टिंग के कारण हीं कई बार उपेंद्र को महत्वपूर्ण पुरूस्कारों से नवाजा गया। 19 जुलाई 2007 को देश का सबसे बढिया टीवी पत्रकार के लिये उन्हें न्यूज टेलीविजन अवार्ड से नवाजा गया। उन्हें इस वर्ष भी शानदार रिपोर्टिंग और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिये लायन गोल्ड अवार्ड से नावाजा गया। इन सबसे पहले उपेद्र को 2006 में स्टार न्यूज एचिवर अवार्ड से नवाजा गया।

ब्रेकिंग न्यूज और शानदार रिपोर्टिंग के लिये लगातार किसी न किसी अवार्ड से सम्मानित किया जाना हीं उनकी शानदार सफलता को दर्शाता है।

बहरहाल उपेंद्र ने पत्रकारिता में अपनी कैरियर की शुरूआत राष्ट्रीय सहारा अखबार से शुरू की। सहारा के बाद वे स्टार न्यूज ज्वाईन किये। फिर वे बिजनस चैनल आवाज में गये। यहां यह बता दूं कि उपेंद्र की बिजनस न्यूज के मामले में भी जबरदस्त पकड़ है। उसके बाद फिर स्टार न्यूज आये और अब वे सहारा समय चैनल के न्यूज डायरेक्टर हैं।

Wednesday, December 30, 2009

देश का हीरो राहुल गांधी

19 जून 1970 को नई दिल्ली में जन्मे राहुल गांधी ने कम हीं उम्र में भारत की राजनीति में एक मिसाल कायम कर दिया है। उन्होंने वह कर दिखाया जो आज तक देश के इतिहास में किसी राष्ट्रीय नेता ने नहीं किया। अब वह दिन दूर नहीं जब लोग यह कहेंगे कि देश की आइरन लेडी इंदिरा गांधी राहुल गांधी की दादी थी। देश के विकास पुरूष के नाम से जाने जाने वाले राजीव गांधी राहुल गांधी के पिता थे। कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष और दुनियां की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में से एक सोनिया गांधी राहुल गांधी की मां है। यानी परिवार की बड़ी हस्तियां राहुल गांधी के नाम से जाने जायेंगे। आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्यों ?

राहुल गांधी न तो कोई राष्ट्रपति हैं और न हीं प्रधानमंत्री फिर भी देश के धरोहर हैं। व्यक्तिगत तौर पर राहुल गांधी से अधिक लोकप्रिय देश का कोई नेता नहीं है। क्योंकि देश की राजनीति में राहुल गांधी ने वो मिसाल कायम कर दिया है अपने व्यवहार से जिसे आज तक किसी ने नहीं किया था, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को छोड़कर। राहुल गांधी विकास के मोर्चे पर उल्लेखनिय योगदान तो दे ही रहे हैं लेकिन साथ हीं उन्होंने जो सकारात्मक राजनीति की शुरूआत की है उससे काम नहीं करने वाले और सिर्फ दूसरों को गाली देने और दूसरों की गलतियां निकाल कर अपनी राजनीति चमकाने वाले नेताओं के होश उड़ गये हैं।

राहुल गांधी की राजनीति से उच्च वर्ग की राजनीति करने वाले बीजेपी, पिछड़ो की राजनीति करने वाले सपा, राजद और दलितों की राजनीति करने वाले बसपा और लोजपा सभी पार्टियों के होश उड गये हैं। समाज के सबसे कमजोर पायदान पर जीवन यापन करने वाले गरीब व दलित-आदिवासी समाज के यहां जाकर, उनके यहां भोजनकर , रात बिताकर, परिश्रम के कामों में तपती धूप में योगदान कर उन्होंने जहां स्वर्ण समाज को लज्जित किया और एक नई राह दिखाई कि सामज को जोड़ो। तोड़ो नहीं। वहीं पिछडे-दलित-आदिवासी समाज की राजनीति करने वाले नेताओं को भी जता दिया कि राजनीति तोडकर नहीं जोड़कर की जाती है।

राहुल के कदम का काट किसी के पास नहीं है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने यहां तक आरोप लगा दिया कि राहुल गांधी गरीबो के यहां खाना खा कर नहाते हैं। दरअसल मायावती राहुल गांधी के सकारात्मक राजनीति से डर गयी।

बहरहाल, राहुल गांधी देश के किसी भी कोने से चुनाव लड़े वो जीत जायेंगे लेकिन आज के तारीख में उन्हें अपनी पार्टी कांग्रेस के लिये काफी मेहनत करनी होगी क्योंकि कांग्रेस का हर उम्मीदवार राहुल गांधी नहीं हो सकता। और न है। वे अभी भी अपनी राजशाही जीवन शैली के लिये जाने जाते हैं। उनका व्यवहार क्रूर और घंमडी सांमती वाला है। ऐसे में राहुल गांधी की तरह कांग्रेस को भी समर्थन मिलेगा इसमें संदेह है।

सुरक्षा बल के जवानों से माओवादियों की अपील

नक्सल प्रभावित राज्यों में सुरक्षा बलों के जवान और नक्सल कैडेट्स के बीच संघर्ष जारी है। इसमें दोनो ही तरफ के लोग मारे जा रहे हैं। इससे देश की शांति और विकास की प्रक्रिया बाधित हो रही है। सरकार नक्सल को एक समस्या मान कर इससे से जुड़े लोगों की सफाया करना चाहती है। वहीं नक्सल से जुडे लोगों का कहना है कि गरीबो के प्रति सरकार और जमीदारों की नकारात्मक रवैये के कारण हीं हथियार उठाना पड़ा। इस बीच महाराष्ट्र ईकाई के माओवादी संगठन ने मीडिया के लिये जो पर्चे जारी किये वह निम्नलिखित प्रकार से है -
“ तुम हमारे हो, हमारे बीच के हो ... हालांकि यह जो पुलिस की वर्दी तुमने पहन रखी है इसका सीधा रिश्ता तुम्हारी रोजी-रोटी से है मगर भाई मेरे, ऐसे जीने का भला क्या मतलब ? ”

जवानों और अधिकारियों,
छत्तीसगढ के अविभाजित बस्तर, राजनांदगांव और महाराष्ट्र के गढचिरोली क्षेत्र जिसे दण्डकारण्य के नाम से पुकारा जाता है, में तैनात आप लोगों को अब एक युद्व लड़ने के लिये प्रेरित किया जा रहा है। आपके हाथों में अत्याधुनिक हथियार हैं और ढेर सारा गोलाबारूद। आपको इस मिशन पर भेजते समय आपके अधिकारियों और जंगल वारफेर स्कूल के प्रशिक्षकों ने हमारे (यानी माओवादियों के ) बारे में बहुत सी झूठी बातें बतायी होंगी। जाने अनजाने में आप यहां यह समझकर आये होंगे कि आप यहां युद्व लड़कर देश की सेवा करेंगे या रक्षा करेंगे। यहां आने पर आप एक सच्चाई को जरूर जाना समझा होगा। वो यह है कि आपके थानों-कैंपों के इर्द-गिर्द मौजूद बस्तियों में जीने वाले आदिवासी जो बेहद गरीबी में, बुनियादी सुविधाओं के अभाव में तथा सरकारों द्वारा दशकों से जारी लापरवाही का शिकार बनकर जिंदगी के साथ जद्दोजहद करते हैं। उन्हीं लोगों के खिलाफ आप लोगों को लड़ाई लड़ना है। उन्हीं लोगों के सीने पर ताननी है अपनी रायफलें। क्योंकि सोनिया, मनमोहन सिंह, चिदंबरम, रमण सिंह, ननकीराम, अशोक चव्हान, महेंद्र कर्मा आदि नेताओं ने निर्णायक युद्व या आरपार की लड़ाई का जो हुंकार मार रहे हैं वो यहां के भोले भाले गरीब और मेहनतकश आदिवासी जन समुदाय के खिलाफ हीं है। आखिर यहां के जनता पर इतना गुस्सा क्यों?

भोली-भाली व शांति चाहने वाली यहां की आदिवासी जनता का इतिहास देश के अन्य इलाकों के आदिवासी की तरह ही रहा है। इन्होंने 19 वीं सदी की शुरूआत से लेकर आज तक शोषण, लूट, उत्पीड़न, अन्याय और परायों के शासन के खिलाफ बगावत का परचम हमेशा ऊंचा उठाए रखा है। 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ इनलोगों ने जबरदस्त विरोध किया था जो इतिहास के पन्नों में महान भूमकाल के नाम से अंकित है। आने वाले 2010 में इस विद्रोह की 100 वीं सालगिरह मनानी है। और अब एक ऐसा संयोग बना है कि यह सौवां साल यहां के समूचे आदिवासियों को एक बार फिर प्रतिरोध का झंडा बुंलद करने पर मजबूर कर रहा है।

बहरहाल यहां के आदिवासियों ने कई बिद्रोह किये। काफी खून बहाया, शहादतें दी। पर आजादी और मुक्ति की उनकी चाहतें पूरी नहीं हुई। पहले गोरें लुटेरों और 1947 के बाद से उनका स्थान लेने वाले काले लुटेरों ने इनके हिस्से में अभाव, अन्याय, अपमान और अत्याचार हीं दिये हैं। अपने हीं मां समान जंगल में वन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें चोर बना दिया। जंगल माफिया, मुनाफाखोर व्यापारी, ठेकेदार, पुलिस, फॉरेस्ट अफसर ....सभी ने उनका शोषण किया। उनकी मां-बहनों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया। हालांकि इनके खिलाफ उनके दिलो दिमाग में गु्स्सा उबल रहा था, लेकिन उसे सही दिशा देने की राजनैतिक ताकत उनके पास नहीं थी। ऐसी स्थिति में 1980 के दशक में उन्हें एक नई राह मिल गई। मुक्ति की एक वैज्ञानिक सोच लेकर और जनयुद्व का संदेश लेकर यहां पर हमारी माओवादी पार्टी ने कदम रखा। यहां की दमित-शोषित-उत्पीड़ित आदिवासी जनता में काम करना शुरू किया।

सिर्फ यहां की आदिवासियों की नहीं बल्कि देश के तमाम इलाकों के लोगों की या यूं कहें कि देश की 90 प्रतिशत मेहनतकश लोगों की कमोबेश यही बदहाली है। देश के मजदुरों, किसानों, छोटे छोटे मंझोले व्यापारियों तथा आदिवासी, दलित, महिलाएं और अन्य पिछड़े समुदायों पर शोषण उत्पीड़न का एक व्यापक दुष्चक्र जारी है। इस स्थिति के लिये जिम्मेदार वे लोग हैं जो आबादी के महज 10 फिसदी का प्रतिनिधि होने के बावजूद देश की समूची सम्पदाओं में 90 प्रतिशत पर हिस्सेदारी रखते हैं। इन गिद्वों को हमारी पार्टी तीन वर्गों – सामंती वर्ग, दलाल पूंजीपति वर्ग और साम्राज्यवादियों में बांटती है जिनकी सांठगांठ से निर्मित व्यवस्था हीं देश की सारी समस्याओं की जड़ है।

आज की तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था दरअसल इस दुष्ट तिकड़ी की मुठ्ठी में ही है। यही लोग चुनाव लड़ते हैं, यही लोग जीतते हैं, पार्टी का नाम और झंडा का रंग जो भी हो। संसद भी इन्हीं लोगों का है। थान, कचहरी, जेल सभी पर नियंत्रण इन्ही का है। देश की श्रमशक्ति, संपदाओं और संसाधनों को यही लोग लुटते हैं। इसके खिलाफ लड़ने पर पुलिस और फौजी बलों को उतारकर जनता पर अकथनीय जु्ल्म ढाते हैं। और उल्टा उन्हीं लोगो पर आंतकवादी या उग्रवादी का ठपा लगा देते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, अकाल, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, किसानों की आत्महत्या, पलायन आदि सभी समा्स्यायें इन्ही तीन वर्गों की निर्मम लूट खसोट के कारण है। मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण के आधार पर खड़ी इनकी व्यवस्था को ध्वस्त करना निहायत जरूरी है ताकि शोषणविहीन, भेदभावरहित तथा रह प्राकर के उत्पीडन से मुक्त खुशहाल समाज का निर्माण किया जा सके। जनता के पास कोई दूसरा और नजदीकी रास्ता नहीं बचा है। हमारी पार्टी की इसी राजनीतिक सोच के साथ दण्डकारण्य के आदिवासी सचेत हुए हैं और फिर संघर्ष का शंखानाद बज गया। सरकारी गुस्से का कारण यही है।

आपलोग क्या इन बदहाल आदिवासियों से अलग हैं? नहीं, हमारी पार्टी ऐसा नहीं मानती। आप लोग जवान और छोटे स्तर के अधिकारी ( आपके बलों का नाम जिला पुलिस, सीएएएफ, सीपीओ, एसपीओ, एसटीएफ, सीआरपीएफ, बीएसएफ, ग्रे-हाउण्डस, कोबरा, आईटीबीपी, एसएसबी....जो भी हों) ऐसे ही शोषित व मेहनतकश माता-पिता की संताने हैं। रोजी रोटी की तलाश में आपने इस रास्ते को चुना है। वरना इन लोगों के खिलाफ आपके मन में गुस्से का कोई आधार हीं नहीं है। यहां की आदिवासी जनता और उनका नेतृत्व कर रही हमारी पार्टी को आंतकवादी या उग्रवादी कहकर चिदंबरम गिरोह और आपके उच्च अधिकारी आपके मन में हमारे खिलाफ कृत्रिम तरीके से गुस्सा भरने की कोशिश करते हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादियों का वफादार सेवक मनमोहन सिंह जो हमारी पार्टी को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा कहते नहीं थकता, इस बात को छुपा देता है कि दरअसल हमारी पार्टी से देश के मुठ्ठी भर लुटेरों को खतरा है। चूंकि रेडियो, अखबार, और टीवी पर उन्हीं लुटेरों का कब्जा है। इसलिये एक झूठ को सौ बार दोहराकर सच बनाने की उनकी चालें कुछ हद तक चल भी पा रही है।

आज हम (यानी यहां का आदिवासी अवाम और उनके जायज संघर्ष की अगुवाई करने वाली हमारी पार्टी) और आप लोग आमने सामने हैं। आप अपने अधिकारियों के उकसावे और आदेश पर आदिवासियों के गांवों को जला रहे हैं। लूट रहे हैं। या फिर सलवा जुडूमियों के द्वार लुटवा रहे हैं। मारपीट कर रहे हैं। आदिवासी महिलओं के साथ बलात्कार कर रहे हैं। निहत्थे लोंगों पर गोलियां बरसा रहे हैं। झूठी मुठभेड़ कर रहे हैं। और नरसंहारों को अंजाम दे रहे हैं। यह सब उस संविधान के खिलाफ जाकर कर रहे हैं जिसका पालन करने की आप शपथ लेकर इस नौकरी में आये थे। विडम्बना यह है कि जिन लोगों के खिलाफ आप यह सब कुछ कर रहे हैं वो भी आप जैसे गरीब और मेहनतकश लोग हीं हैं। जनता की रक्षा की खातिर हमारी जन सेना- पीएलजीए – आपके खिलाफ जवाबी हमले कर रही है जिसमें दर्जनों की संख्या में आप लोग हताहत हो रहे हैं।

लेकिन यही सबकुछ नहीं है। आपमें से कई लोंगों ने कम मौके पर हीं सही निर्दोष आदिवासियों पर गोली चलाने से इनकार किया। अत्याचारों का विरोध किया। यहां तक कि अपने अधिकारियों के खिलाफ कुछ मौंको पर विद्रोह भी किया। छतीसगढ पुलिस के कई जवानों और अधिकारियों ने हमारे संघर्षके इलाके में ड्यूटी करने से मना कर दिया। क्योंकि उन्हें मालूम है यहां ड्यूटी करने का मतलब अपने हीं भाई बहनों के खिलाफ खड़ा होना और अपनों पर हीं गोलियां बरसाना। हमारे इलाके में नहीं जाने के कारण कई कर्मचारियों को निलंबन किया गया फिर भी वे अपने फैसले पर कायम पर रहे। यहां तक कि कुछ जवानों ने हथियार लाकर भी भी हमें दिया। हम उन सभी लोगों का सरहाना करते हैं जिन्होंने किसी न किसी वजह से आदिवासियों के सीने पर बंदूक उठाने से मना कर दिया। हमारे इलाके में पदस्थ जवान कई परेशानियों और प्रताडनाओं के दौर से गुजर रहे हैं। खास कर उच्च अधिकारियों के बूरे बर्ताव से आहत पुलिस और अर्द्वसैनिक बलों के जवानों ने खुदकुशी कर ली। कुछ लोगों ने दरिंदे अफसरों को गोली मारकर खुद को भी गोली मारी।

हम तमाम जवानों से अपील करते हैं कि आप इस इस तरह निरर्थक मौत को गले न लगायें। आपमें ताकत है और सोच विचार कर फैसला लेने का विवेक भी। अपनी वर्गिय जड़ों को पहाचानिये ... आपको उकसाने और जनता पर कहर ढाने का आदेश देने वालों की वर्गीय जड़ो को पहचानिये। चिदम्बरम, रमनसिंह, महेंद्र कर्मा जैसों के असली चेहरे को पहचानिये। दोनो बिल्कुल अलग अलग हैं। एक दूसरे के विपरित। इसलिये आइए ... दोनो हाथ फैला कर हम आपका स्वागत कर रहे हैं। आप अपनी बंदूकें लुटेरों, घोटालेबाजों, रिश्वतखोरों, जमाखोरों, देश की संपदाओं को बेचने वाले दलालों, देश की अस्मिता के साथ सौदा करने वाले देशद्रोहियों के सीने पर तानिये। जिस मेहनत वर्ग में से आपने जन्म लिया है उस वर्ग की मुक्ति के लिये जारी महासंग्राम के सैनिक बनिये। घुसखोरी, गालीगलौज, दलाली, जातिगत भेदभाव, धार्मिक साम्प्रदायिकता आदि सामंती मान्यताओं के ढांचे पर निर्मित पुलिस और अर्द्वसैनिक बलों से वापस आइये।

दोस्तों अगर आप अपने मजबूरियों के कारण नौकरी नहीं छोड सकते तो कम से कम हमारे इलाके में काम करने से मना कर दीजिये। हमलों में शामिल होने से इंकार करिये। अपने अफसरों के हुक्म का पालन मत करिये। जनता के खिलाफ लाठी-गोलियां का प्रयोग करन से दूर रहिये। हमारे साथ सशस्त्र झड़पों के सूरत में हथियार डाल दीजिये और अपनी जान बचा लीजिये। हमारी जनता के जीवन को और संघर्ष को जानने-बूझने की कोशिश कीजिये। यह भी समझने की कोशिश कीजिये कि इतनी व्यापक सरकारी बर्बरता, आतंक और नरसंहारों के बावजूद भी यहां की जनता हमारी पार्टी के साथ क्यों खड़ी है। अपने अधिकारियों और सरकार के झूठे प्रचार के प्रभाव से खुद को बाहर लाइये। सच्चाई को समझने की कोशिश कीजिये। और सच के साथ लड़े हो जाइये।

“ मत भूलों की जिन लोगों ने तुम्हारे हाथों में बंदूके थमाई हैं
वो गद्दार हैं – मुल्क के दुश्मन हैं
मत भूलो, कि तुम हमारे हो, हमारे बीचे के हो...”

क्रांतिकारी अभिनन्दन के साथ,
भाकपा(माओवादी) दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी, महाराष्ट्र राज्य कमेटी। "
उपरोक्त पत्र मीडिया के लिये माओवादियों ने जारी किया है।

शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, बीजेपी में नाराजगी, सरकार के भविष्य को लेकर सवाल।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के (झामुमो) अध्यक्ष शिबू सोरेन ने आज तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद शपथ ली। उनके साथ बीजेपी के रघुवर दास और ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन(आजसू) के अध्यक्ष सुदेश महतो ने भी मंत्री पद की शपथ ली। ये दोनों हीं राज्य के उप मुख्यमंत्री बने।

आज राज्य के राज्यपाल के शंकर नारायणन ने झामुमो नेता शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद और गोपनियता की शपथ दिलायी। इनके अलावा आजसू नेता सुदेश महतो और बीजेपी नेता रघुवर दास को भी मंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। दोनो हीं नेताओं को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया है।

कुल 12 लोगों को मंत्री बनाया जाना है। किसे मंत्री बनाया जायेगा और किसे नहीं इसका फैसला विश्वासमत प्राप्त के बाद ही किया जायेगा। 7 जवनरी को विश्वासमत प्राप्त करने की संभावना है। गुरूजी के पास 81 विधान सभा सीटों में 45 विधायकों का समर्थन हासिल है। इनमें झामुमो के 18, बीजेपी के 18, आजसू के 5, जदयू के 2 और दो निर्दलीय विधायकों का समर्थन प्राप्त है।


झारखंड सरकार के गठन को लेकर बीजेपी में असंतोष

बीजेपी के समर्थन से बनने वाली शिबू सोरेन सरकार के भविष्य को लेकर अभी से हीं चर्चाएं शुरू हो गई है। शपथ समारोह में बीजेपी संगठन से जुड़े कोई भी कदावर नेता शामिल नहीं हुआ। बीजेपी के जो बड़े चेहरे हैं जैसे बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के अलावा अन्य केंद्रीय नेताओं में लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी, वैंक्कया नायडू, अरूण जेटली, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज शामिल नहीं हुए। बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के शिबू सोरेन के समर्थन में सरकार बनाने के फैसले को लेकर बीजेपी में अंसतोष साफ दिख रहा है।

पार्टी विधायकों का रूख क्या होगा। इसको भी लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। शायद इसीलिये विश्लास मत प्राप्त करने के बाद ही मंत्रिमंडल विस्तार करने का फैसला किया गया है।

शपथ समरोह में बीजेपी के जो लोग शामिल हुए उनमें बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा, छतिसगढ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, बिहार के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सुशील मोदी शामिल थे।

28 दिसंबर को हीं बीजेपी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूढी ने झामुमो नेता शिबू सोरेन के खिलाफ कड़ा बयान दिया था। बाद में वे अपने बयान को व्यक्तिगत बताया और बतौर प्रवक्ता उन्होंने कहा कि वे पार्टी फैसले के साथ हैं। दबे जुबान इस प्रकार के बयान लगातार आ रहे हैं। बीजेपी छोड चुके गोविंदाचार्य ने भी बीजेपी द्वारा झामुमो नेता शिबू सोरेन को समर्थन देने पर आलोचना की।

बहरहाल, बीजेपी में शिबू सोरेन को लेकर मतभेद के बीच शपथ समारोह तो संपन्न हो गया लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि बीजेपी झामुमो नेता शिबू सोरेन को कब तक समर्थन देगी ?

Sunday, December 27, 2009

शिबू सोरेन 30 दिसंबर को मुख्यमंत्री पद का शपथ लेंगे।

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) सुप्रीमो शिबू सोरेन 30 दिसंबर को मुख्यमंत्री पद का शपथ लेंगे। शपथ समारोह का कार्यक्रम झारखंड की राजधानी रांची स्थित मोरहाबादी मैदान में आयोजित किया जायेगा। श्री सोरेन ने राज्यपाल के. शंकर नारायणन से मुलाकात करने के बाद राज्य में सरकार गठन करने का दावा किया। समर्थन में झामुमो के अलावा बीजेपी और आजसू के विधायकों की सूची सौपी, जिसे राज्यपाल ने स्वीकार कर लिया। झामुमो नेता शिबू सोरेन के अलावा किसी अन्य पार्टियों के नेता ने कोई भी दावा पेश नहीं किया।


झारखंड का विकास हीं प्राथमिकता – सुदेश महतो
ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष सुदेश महतो ने कहा है झारखंड में हर क्षेत्र में विकास की जरूरत है। राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण जितनी बदनामी राज्य की हुई है वह हम सभी के लिये लेशन है। राज्य को हर हाल में भ्रष्टाचार मुक्त बनाना होगा। इसके लिये सभी लोगों का सहयोग जरूरी है। श्री महतो ने यह भी कहा कि राज्य को हर हाल में अपराध मुक्त भी बनाया जायेगा। राज्य में किसी अपराधी को कोई पनाह नहीं मिलेगी।


उन्होंने विकास को प्राथमिकता देते हुए कहा कि पंचायत चुनाव कराने पर उनका जोर रहेगा। श्री महतो ने कहा कि ग्रामिण विकास के लिये जो धन राशि केंद्र से मिलती है वह धन राशि पंचायत चुनाव न होने की वजह से नहीं मिल रही है।

सुदेश महतो झारखंड के तेज तर्रार और काफी सुलझे हुए नेता माने जाते हैं। झारखंड में इनका जन समर्थन लगातार बढता जा रहा है। इस बार आजसू के पांच विधायक चुने गये है जबकि पिछली बार दो हीं विधायक चुने गये थे।

Thursday, December 24, 2009

कांग्रेस को डर है कि यदि शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने तो कांग्रेस के कई नेता सलाखों के पीछे होंगे

झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन यानी गुरूजी को कांग्रेस और जेवीएम मुख्यमंत्री बनाने के लिये क्यों नहीं तैयार हो रही है? यह एक अह्म सवाल है। कांग्रेस-जेवीएम को 25 सीटें मिली है जबकि अकेले अपने दम पर झामुमो को 18 सीटें। यदि झामुमो को समर्थन चाहिये तो कांग्रेस पार्टी को भी कम से कम 16 विधायकों का समर्थन चाहिये। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर झामुमो नेता शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने से कांग्रेस क्यों हिचक रही है।

राजनीति गलियारों में कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी के जो लोग गुरूजी को दागी कहकर मुख्यमंत्री बनने से रोकना चाह रहे हैं शायद उन कांग्रेसी नेताओं को डर है कि यदि शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बन गये तो कांग्रेस के कई नेता सलाखों के पीछे होंगे। दूसरे को बेवजह बदनाम करने वाले नेता खुद कानून के चंगुल में फंस दागी बन जायेंगे।

मधुकोडा प्रकरण में कांग्रेस के कई नेताओं के नाम चर्चा में है। कहा जा रहा है कि इसके तार यदि खुलते गये तो इसके चपेट में कांग्रेस के कई दिग्गज नेता आ सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनियां गांधी और महासचिव राहुल गांधी ने जो त्याग तपस्या कर कांग्रेस को नये सिरे एक साख वाली पार्टी बनाया है उसमें दाग लग सकता है।

झामुमो नेता शिबू सोरेन एक क्रांतिकारी नेता हैं। उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। दुख-कष्ट तो वे बचपन से हीं झेल रहे हैं। उन्हें किसी का डर नहीं है क्योंकि झारखंड की जनता उनके पक्ष में गोलबंद होने लगी है। कहा जा रहा है कि झाममो नये सिर से झारखंड में अपने आपको ताकतवर बनाने में जुट गई है। किसी राजनीतिक कारण या अन्य कारणों से झारखंड के जो नेता झामुमो से अलग हो चुके थे उन्हें भी जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

Wednesday, December 23, 2009

शिबू सोरेन या हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने की मांग

उदय रवानी की रिपोर्ट -
झारखंड विधान सभा चुनाव के परिणाम के बाद सबसे अह्म सवाल है कि राज्य का मुख्यमंत्री किसे बनाया जाये? ऐसी हालात में सबसे अधिक उपयुक्त नाम झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन(गुरूजी) का हीं सामने आता है। यदि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है तो झामुमो के महासचिव और गुरूजी के बेटे हेमंत सोरेन का नाम सबसे उपर आता है। लेकिन गुरूजी के नाम को लेकर दस सवाल खड़े किया जा रहे हैं। आईये जानते हैं गुरूजी के पक्ष और विपक्ष के बारे में।

सबसे पहले चर्चा करते हैं कि गुरूजी पर क्या आरोप हैं – अपने पीए शशि झा की हत्या – शशि झा के हत्या के मामले में अदालत उन्हें बरी कर चुका है। उनके विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि शिबू सोरेन के इशारे पर ही हत्या हुई। लेकिन उनके समर्थको का कहना है कि उन्हें राजनीतिक तौर पर बदनाम किया गया। उन्हें अदालत बरी कर चुका है। कांग्रेस और बीजेपी दोनो को टक्कर देने में झामुमो ही सक्षम है इसलिये उन्हें रास्ते से हटाने की चाल चली गई। और बदनाम किया गया।
सांसद रिश्वत प्रकरण – कांग्रेस पार्टी ने अपनी सरकार बचाने के लिये झामुमो के सासंदों को पैसे देने के प्रलोभन दिये। और बड़ी ही चालाकी से उसे बदनाम करने के लिये इस खबर को लीक कर दी। गुरूजी के विरोधी कह रहे हैं कि उन्होंने रिश्वत ली। जबकि उनके समर्थकों कहना है कि झामुमो पिछड़ों की पार्टी है। यह पार्टी आदिवासी, दलित और पिछड़ो के खूनपसिनों से खड़ी हुई है। इस पार्टी को चलाने के लिये चंदा की जरूरत होती है। कोई व्यापारी चंदा नहीं देता। ऐसे में इन्होंने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया। बीजेपी और कांग्रेस के नेता व्यापारियों से पैसा लेकर उनके लिये नियम हीं बदल देतें है और उनके लिये अरबों रूपये कमाने की व्यवस्था कर देते और खुद भी करोंड़े में कमाते हैं। उन्हें कोई दागी क्यों नहीं कहता। इनके अलावा उनपर जो भी आरोप हैं वे सभी आंदोलन के दौरान हुए हादसे के आरोप हैं।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्य़क्ष गुरूजी के पिताजी की हत्या जमींदारों ने कर दी थी। वे झारखंड को जमींदारों के चंगुल से छुड़ाने की लड़ाई छेड़ी। वे क्रांतिकारी आंदोलन भी किये। यह लंबा इतिहास है। शिबू सोरेन क्रांतिकारी हैं। उन्हें पूरा सहोयग मिला झामुमो के क्रांतिकारी नेता और झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो का। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद कभी भी क्रांतिकारी नेताओं को शासन चलाने का मौका नहीं मिला। गुरूजी को जो दो बार मुख्यमंत्री बनाया गया वह अव्यवस्थित राजनीति का हिस्सा था। इस बार यदि उन्हें नहीं बनाया जाता है तो यह गलत होगा।

यदि गुरूजी को किसी आरोप के तहत मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है तो मुख्यमंत्री झामुमो से हीं हेमंत सोरेन को बनाया जाना चाहिये। हेमंत युवा हैं। काफी पढे-लिखे हैं। इनजीनियरिंग कर चुके हैं। विषय की समझ है। यदि इन्हें नहीं बनाया जाता है तो आने वाला समय काफी कठिन होगा झारखंड की राजनीति के लिये। हेमंत वर्तमान में राज्य सभा के सदस्य और झामुमो के महासचिव हैं।

बहरहाल, झारखंड के विधान सभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने सभी राष्ट्रीय दलों के चुनौती को ध्वस्त कर दिया है। इसका पूरा श्रेय झामुमो अध्यक्ष गुरूजी यानी शिबू सोरेन और महासचिव हेमंत सोरेन के नेतृत्व में पूरी टीम को जाता है। झामुमो एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसने अपने दम पर राज्य में चुनाव लड़ा और 18 सीटों पर जीत हासिल की। देश के दोनो बड़े राष्ट्रीय दल कांग्रेस और बीजेपी गठबंधन के साथ मैदान में उतरी। कांग्रेस ने जहां झारखंड विकास मोर्चा के साथ हाथ मिलाया वहीं बीजेपी जनता दल यूनाईटेड के साथ मैदान में उतरी। सबसे बुरा हा हुआ बीजेपी का। कुछ हीं महीने पहले लोक सभा के चुनाव हुए जिसमें लोक सभा के 14 सीटों में से 8 पर बीजेपी का कब्जा हो गया वही विधान सभा चुनाव में 81 में से सिर्फ 19 सीटें मिली। जबकि पिछली बार बीजेपी को 30 सीटें मिली थी।

समाचार लिखने तक - सबसे पहले आईये देखते हैं झारखंड के 81 विधान सभा सीटों में से किसा पार्टी को कितने मत मिले –
झामुमो – 18 , कांग्रेस गठबंधन – 24 (कांग्रेस – 13, झाविमो – 11), बीजेपी गठबंधन – 21 ( बीजेपी – 19, जेडीयू – 02), राजद गठबंधन – 05 (राजद – 05, लोजपा – 00, सीपीआई – 00, सीपीएम – 00), अन्य – 13 ( आजसू – 05, मासस – 01, सीपीआईएमएल – 02, झारखंड पार्टी – 01, निर्दलीय – 4)। इनमें एक दो सीटों का उतार चढाव हो सकता है। )

Wednesday, December 16, 2009

लालू यादव और रामविलास पासवान ने रामचंद्र चंद्रवंशी समेत सभी आरजेडी-लोजपा उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करने की अपील की।

उदय रवानी की रिपोर्ट -
आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव और लोजपा नेता रामविलास पासवान ने विश्रामपुर से रामचंद्र चंद्रवंशी समेत सभी आरजेडी-लोजपा गठबंधन उम्मीदवारों को जिताने का ऐलान किया। लालू यादव ने कहा कि कांग्रेस ने देश को तहस नहस कर दिया है। श्री यादव ने झारखंड में भ्रष्टाचारमुक्त शासन व गरीबों की सरकार बनाने के लिए विश्रामपुर विधान सभा क्षेत्र से राजद-लोजपा प्रत्याशी रामचंद्र चंद्रवंशी के पक्ष में लालटेन छाप पर मतदान करने की अपील की। लोजपा नेता रामविलास पासवान ने भी रामचंद्र चंद्रवंशी के पक्ष में मतदान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की रोशनी पहुंचाने के लिए वे आरजेडी-लोजपा उम्मीदवार रामचंद्र चंद्रवंशी के पक्ष में मतदान करे।

झारखंड विधानसभा चुनाव के पांचवें और अंतिम चरण का चुनाव प्रचार आज थम गया। 18 दिसंबर को 16 विधानसभा सीटों के लिये चुनाव होने हैं। जिन सीटो के लिये चुनाव होने हैं उनमें विश्रामपुर, डालटनगंज, चतरा, गढ़वा, भवनाथपुर, बरकट्ठा, चाईबासा, जगन्नाथपुर, सरायकेला, खरसांवा, पांकी, छत्तरपुर, हुसैनाबाद, सिमरिया, लातेहार और मनिका विधानसभा क्षेत्र हैं। इन 16 विधानसभा क्षेत्रों में 20 महिला उम्मीदवारों समेत कुल 290 उम्मीदवारों के भाग्य का फ़ैसला 33 लाख 96 हजार 472 मतदाता 4579 मतदान केन्द्रों पर करेंगे. इन क्षेत्रों में 1772399 पुरुष और 1624073 महिला मतदाता हैं। इन क्षेत्रों में जिन प्रमुख उम्मीदवारों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है उनमें से विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष बागुन सुम्ब्रई, आरजेडी नेता और पूर्व मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी, पूर्व मंत्री गिरिनाथ सिंह भानु प्रताप शाही, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के पुत्र दिलीप सिंह नामधारी, राधाकृष्ण किशोर, कमलेश कुमार सिंह, रामचन्द्र केशरी और जर्नादन पासवान शामिल हैं।

Tuesday, December 15, 2009

बिनोद बाबू के 18वीं बरसी पर विशेष (जन्म 1921 – मृत्यु 18 दिसंबर 1991)

लेखक - राजा विक्रम चंद्रवंशी और उदय रवानी
असंभव काम को संभव कर दिखाने की ताकत थी बिनोद बाबू में। उनके नाम के बिना झारखंड राज्य की चर्चा अधूरी ही रहेगी। बिनोद बाबू यानी बिनोद बिहारी महतो। इन्हें झारखंड का भिष्मपितामाह भी कहा जाता है। इनके जीवनी पर शोध किया जा सकता है।

स्वतंत्रता सेनानी रहे बिनोद बाबू का जन्म 1921 में धनबाद जिले के बलियापुर अंतर्गत बड़ादाह गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। पूरे इलाके के लोग जमींदार और अंग्रेजों से सहमे रहते थे। आजादी मिलने के बाद बिनोद बाबू ने प्रण किया था कि जिस प्रकार देश से अंग्रेजों को मार भगाया उसी प्रकार देश से भी जमींदारी प्रथा खत्म कर देंगे। गरीबों को उनका हक दिलाकर रहेंगे।

बिनोद बाबू ने कसम तो खा ली लेकिन इस काम को करना इतना आसान नहीं था। क्योंकि बिनोद बाबू के पास अपनी साहस और क्षमता के अलावा कुछ भी नहीं था। आजादी के बाद सबसे साहसी कदम उन्होंने 1952 में उठाया। उन्होंने देश के पहले विधान सभा चुनाव में चुनाव लड़ने का फैसला किया वो भी धनबाद जिले के झरिया विधान सभा सीट से। इस सीट से झरिया के राजा चुनाव लड़ रहे थे। इसलिये प्रशासन के अलावा राजा के गुर्गों ने उन्हें धमकाना शुरू किया। मारने की योजना बनाई लेकिन बिनोद बाबू नहीं माने और चुनाव मैदान में डटे रहे। यह अलग बात है वे चुनाव हार गये। लेकिन क्रांति का बिगुल उन्होंने बजा ही दिया।

कुछ समय बाद वे वामपंथ की राजनीति से जुड़ गये। सत्तर दशक के शुरूआती दौर तक वे वामपंथ से जुड़े रहे लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय पार्टी स्थानीय मुद्दे की ओर विशेष घ्यान नहीं दे रही है तो उन्होंने गरीबों को न्याय दिलाने के लिये एक अलग पार्टी का गठन करने का निर्णय लिया। और झारखंड के एक और क्रांतिकारी नेता शिबू सोरने को अपने साथ मिलाकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। और इसके बैनर तले उग्र आंदोलन हुए जिससे केद्र सरकार भी कई बार सहम जाती थी। इस उग्र आंदोलन के लिये नौजवानों में जोश भरने का काम बिनोद बाबू अपने सामाजिक संस्था शिवाजी समाज के बैनर तले पहले से हीं करते आ रहे थे। और कई क्रांतिकारी कदम उठाये। अन्याय के खिलाफ बिनोद बाबू का जो मूल संदेश था वो निम्नलिखित प्रकार से है -

विनोद बाबू के संदेश
1. लडना है तो पढना सिखो।
2. सभी का सम्मान करो लेकिन अन्याय बर्दाश्त मत करो।
3. तुम्हें कोई मारता है तो जवाबी हमला करो।
4. किसी के मार खाकर मरने से अच्छा है मारकर मरो।
5. हमलोग क्रांतिकारी हैं कोई जालिम या जमींदार नहीं। इसलिये दुश्मन पर हमला करते समय इस बात का ख्याल रखें कि बच्चों और महिलाओं को नुकसान न पहुंचे।
6. न्यायलय-प्रशासन सभी जमींदारों के साथ है इसलिये गरीबों की आपसी एकता हीं काम आयेगी।
7. गरीबी से कभी मत घबराना उसे कमजोरी की वजाय अपनी ताकत बनाओ।
8. अपने महापुरुषों का हमेशा सम्मान करो। इससे गलत रास्ते में जाने से बचोगे और संघर्ष करने में हमेशा नैतिक बल मिलेगा।
9. संघर्ष के रास्ते में आगे बढने पर बहुत सारे लोग प्रलोभन देंगे। तुम्हें बदनाम करने की कोशिश करेंगे। प्रचार करेंगे। इससे कभी मत घबराना क्योंकि जो हम लड़ाई लडने जा रहे हैं उसमें यह सबकुछ सहना होगा।
10. हमारा मूल मकसद ऐसे अलग झारखंड राज्य का गठन करना है जिसमें वास्तव में समानता हो। लोगों की बुनियादी जरूरते पूरी हो सके। हम झारखंडवासी दुनिया भर में एक सकारात्मक योगदान दें सके। हमारे क्षेत्र में विकास के सभी संसाधन मौजूद हैं। जरूरत है सिर्फ ईमानदार कोशिश की।

विनोद बाबू सिर्फ उपरोक्त बातें हीं नहीं करते थे बल्कि वे पहले स्वयं व्यवहार में लाते भी थे। वे खुद उदाहरण पेश करते थे। उनके क्रांतिकारी रूख के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। प्रशासन की ओर से चेतावनी मिली। लेकिन वे कभी झूके नहीं। अंतिम क्षण तक अपने विचार पर कायम रहे। उनकी समाज के प्रति त्याग-तपस्या को लेकर उनके पक्ष के हों या विरोधा दल सभी उनका सम्मान करते थे। इस बारे में बीजेपी नेता अटल बिहारी वाजपेयी, कांग्रेस नेता नरसिम्हा राव, वामपंथी नेता ज्योति बसु, बुद्वदेव भट्टाचार्या, आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव, समाजवादी नेता वी पी सिंह के अलावा दर्जनों प्रमुख हस्तियों के विचार दस्तावेज में दर्ज हैं।

Monday, December 14, 2009

अलग राज्य की मांग को लेकर राजनीति

झारखंड, उत्तराखंड और छतीसगढ के गठन के बाद तेलंगाना, विदर्भ, गौरखालैंड, बुंदेलखंड, पूर्वाचंल और हरित प्रदेश राज्य बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। यह यही थमने वाला नहीं है बल्कि और भी राज्यों की मांग बनाने की आवाज उठ सकती है। हालांकि भारतीय संविधान में इस बात की पूरी आजादी है और केंद्र सरकार को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह संवैधानिक प्रावधान को अपनाते हुए किसी भी राज्य के क्षेत्र को घटा-बढा सकती है। नये राज्य का गठन कर सकती है। इतना हीं नहीं दो या इससे अधिक राज्यों के भूभागों को मिलाकर एक नये राज्य का गठन भी कर सकती है।

समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने कहा कि देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने छोटे छोटे राजवाडों को मिलाकर देश की एक कायम की थी लेकिन यूपी की मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश की एकता छिन्न-भिन्न करने में लगी है। लेकिन यहां मैं साफ कर दूं कि इससे देश की एकता को कोई खतरा नहीं होगा। क्योंकि अलग होने के बावजूद नवगठित राज्य अन्य राज्यों की तरह हीं काम करेंगे। मुंबई को विभाजित कर महाराष्ट्र और गुजरात का गठन किया गया, बंगाल को विभाजित कर बिहार और उडीसा का गठन हुआ, बिहार से अलग कर झारखंड का गठन हुआ। ऐसे देश भर में दर्जनों राज्यों का गठन हुआ है। इसलिये सामान्य तौर पर इसे देश की एकता अखंडता के लिये खतरा नहीं माना जा सकता।

लेकिन दूसरी ओर हमें यह भी ध्यान देना होगा कि आखिर राज्य गठन के पीछे की मंशा क्या है? यदि राज्य गठन के पीछे की मंशा विकास और आम जनता को बेहतर जीवन देना है तो इसमें कोई गलत नहीं। यदि कोई सियासी मंशा है तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है।

उदारहरण के तौर पर झारखंड को हीं लें। अलग झारखंड राज्य की मांग आजादी से पहले की है। इसके लिये क्रांतिकारी आंदोलन हुए। झामुमो के क्रांतिकारी नेता विनोद बिहारी महतो और शिबूसोरेन के नेतृत्व में झारखंड अलग राज्य की मांग जोर पकड़ी। इनके आंदोलन और अलग राज्य बनाने के पीछे मंशा साफ थी कि वर्षों से झारखंड के आदिवासी-दलित-पिछड़े वर्ग के साथ जो भेदभाव क्या जा रहा है उसे खत्म कर राज्य का विकास करना है।

झारखंड अलग राज्य की तैयारी भी शुरू हो गई। लेकिन जब झारखंड राज्य को अलग किया गया, उस समय अलग राज्य की मंशा के पीछे आर्थिक विकास और जनकल्याण की भावना नहीं थी बल्कि राजनीतिक और लूटखसोट की भावना थी। बिहार के ताकतवर नेता लालू प्रसाद यादव को कमजोर करने की मकसद से झारखंड अलग राज्य का गठन किया गया। ऐसे में वहां नये राज्य की सत्ता में वे लोग आ गये जिसका जिनका संबंध कभी क्रांति या विकास की भावना से नहीं रहा। सिर्फ लूट खसोट करना हीं मकसद था। और यही हुआ। बीजेपी और कांग्रेस के नेतृत्व में जो मिली जुली सरकार बनी उसमें सिर्फ लुट खसोट हुआ। यदि एक व्यवस्थिक तरीके से राज्य का गठन किया जाता तो आज झारखंड की स्थिति अलग होती। झारखंड के भीष्णपितामाह कहे जाने वाले विनोद बिहारी महतो यदि जिंदा होते तो शायद झारखंड की यह दुर्दशा नहीं होती।

जिस प्रकार आजादी से पहले अंग्रेज कहा करते थे कि भारत के लोग सरकार नहीं चला पायेंगे लेकिन आज हम सिर्फ सरकार हीं नहीं चला रहे हैं बल्कि विश्व को नेतृत्व देने की ताकत रखते हैं। झारखंड और झारखंड के बाहर लोग यही कहते हैं कि झारखंड के लोग सरकार नहीं चला सकते। विकास का काम नहीं कर सकते। लेकिन मैं कहता हूं कि झारखंड के नेताओं में अपार क्षमता है विकास करने की। लेकिन उन्हें सावधान रहना है दलालो से अन्यथा वे भी कुछ नहीं कर पायेंगे।

केद्र सरकार और राज्य सरकारों के अलावा संसद के सदस्यों और विधान सभा के सदस्यों को कोई फैसला लेने से पहले यह जरूर देख लेना चाहिये कि अलग राज्य का दर्जा देने के बाद वहां किस प्रकार की दिक्कते आ सकती है। उसके लिये पहले ही इंतजाम कर लेना चाहिये। यदि यह तय हो जाता है कि अलग राज्य का गठन होना है तो एक निश्चित सीमा के अंदर नये राज्य के लिये आधारभूत ढांचा खड़ी कर लेनी चाहिये नहीं तो लूट खसोट की संभावना बनी रहेगा।

Monday, November 30, 2009

पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा गिरफ्तार

स्टेट विजिलेंस विभाग के अधिकारियों ने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को आय से अधिक संपत्ति के मामले में आखिरकार गिरफ्तार कर लिया । उन्हें चार दिसंबर को अदालत में पेश किया जायेगा। उनकी गिरफ्तारी झारखंड के चाईबांसा से हुई। मधु कोडा पर आरोप है कि उन्होंने मंत्री और मुख्यमंत्री रहते लगभग 4000 करोड़ से अधिक के घोटाले किये।

इस मामले में उनसे लगातार पुछताछ होती रही। इस बीच वे पेट दर्द के चलते हॉस्पीटल में भी दाखिल हुए। फिर चुनावी व्यस्तता के चलते वे अधिकारियों से नहीं मिलने की बात कहते रहे। पूछताछ के लिये जब अधिकारीगण उनके घर पहुंचे तो वहां भी वे नहीं मिले। आखिरकार उन्हें चाईबांसा में हिरासत में लिया गया।

इस मामले में को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। बीजेपी आरोप लगा रही है कि इसमें कांग्रेस के लोग शामिल हैं उन्हीं के बदौलत सरकार चल रही थी। वहीं कांग्रेस के लोगों का कहना है कि इसमें बीजेपी के लोग शामिल हैं। बीजेपी की जब पहली बार राज्य में सरकार बनी थी तभी कोड़ा खनिज मंत्रालय के मंत्री बने थे।

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और तत्कालीन बीजेपी नेता बाबूलाल मंराडी ने बीजेपी छोड अलग पार्टी बनाई उसका सबसे बड़ा कारण बीजेपी की सरकार में भ्रष्टाचार को बोलबाला था। तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मंराडी भ्रष्ट लोगों का साथ देने के पक्ष में नहीं थे। इसीलिये उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया।
बहरहाल, आरोप-प्रत्यारोप का दौर तो चलता रहेगा लेकिन इसमें राज्य का हीं नुकसान हो रहा है।

Thursday, November 19, 2009

नक्सल के नाम पर जिस दिन हवाई हमला होगा उसी दिन संघर्ष की जगह सामाजिक-आर्थिक न्याय के लिय खूनी क्रांति का बीजारोपण हो जायेगा।

कई ऐसे सरकारी अधिकारी हैं जिन्हें पता हीं नहीं है कि नक्सल क्या है? माओवादी कौन लोग हैं ? माओवाद क्या है ? इस बारे में आम आदमी को पता हो या नहीं लेकिन जो लोग नक्सल पर काम कर रहें हैं उन्हें तो इसकी जानकारी होनी ही चाहिये। मैं किसी अधिकारी के नाम का उल्लेख नहीं कर रहा हूं लेकिन उनसे बातचीत से अंदाजा हो गया कि वे जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं। वे सीधे मानते हैं कि जिस इलाकें में नक्सली का प्रभाव है वहां गोलियों की बरसात कर देनी चाहिये। यही बात तो नक्सल से जुड़े लोग कहते है कि जहां सरकारी सिस्टम काम नहीं कर रहा है वहां बंदूक का सहारा लेना चाहिये।

सबसे पहले नक्सल और माओवादी को संक्षेप में समझिये। दोनो के बीच काफी समानता होने के बावजूद भारत में दोनो को एक साथ नहीं मिला सकते। नक्सल का उदय भारत(पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव) में हुआ और माओवाद का उदय चीन में। दोनो के बीच बड़ा अंतर है। माओवाद राजतंत्र के खिलाफ एक सिंद्वात के आधार पर लड़ा गया गृहयुद्व है। जिसमें बंदूक का बड़ा महत्व रहा है । इसके सहारे लोकतांत्रिक तानाशाही के नेतृत्व में एक समाजवादी सरकार का गठन करना है। जैसा कि चीन में हुआ। और इसका आंशिक प्रभाव चीन के पड़ौसी देशों पर भी पड़ा जिसमें भारत भी है। लेकिन जो चीन में हुआ वह भारत में नहीं हो सकता।

भारत में कभी भी क्रांति नहीं हुआ। सामाजिक खूनी क्रांति नहीं हुआ। हम अंग्रेज के गुलाम थे लेकिन आजादी मिलने के बाद देश का केद्रीय शासन भले हीं एक सुलझे हुए लोगों के हाथ में रहा हो लेकिन प्रांतीय शासन जमीनदारों के हाथों में चला गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत के आजाद होने के बाद भी देश की जो आम जनता थी उनकी हालत और पतली हो गई।

अंग्रेजों के जमाने में मजदूर किसान कोड़े खाते थे। कोड़े मारने वाले लोग अंग्रेजों के पैसों पर पले भारतीय जमींदार के गूर्गे हीं होते थे। वे भी भारतीय हीं थे। आजादी के बाद जमींदार देश के मंत्री बन बैठे और उनके गुर्गे उसी प्रकार कोड़े चालते रहे। इतना हीं नहीं गरीबो के खेत खलीहान भी अपने नाम करवा लिये। इससे आगे बढकर उनकी बहुबेटियों की इज्जत भी तार-तार करने लगे। ऐसा लगने लगा कि 15 अगस्त 1947 को जो आजादी मिली वो सिर्फ भारत के एक वर्ग के लिये था।

आजादी के बाद देश की सत्ता में आये केंद्रीय शासन के पास इतना अधिक काम था कि वह हर चीजों पर ध्यान दे पाने में समर्थ्य नहीं थे। आम लोगों के लिये योजना बनाते उनके लिये बजट पास करते लेकिन उसका फोलोअप नहीं कर पाते थे।

राज्यों में जो सरकार बनीं वो तो बदतर थी। आमलोगों के नाम पर जो बजट पास करते या केंद्र से जो मदद मिलती उसे हजम कर जाते थे। उस समय की मानसिकता ऐसी थी कि पिछडे-दलित-आदिवासियों की बस्ती में कोई स्कूल बनाना नहीं चाहता था। सड़क, स्वास्थ्य और जल व्यवस्था के क्षेत्र में कोई काम नहीं करता था। विकास के नाम पर बजट पास करते थे लेकिन खर्चा अपने घरों के लिये करते थे। गरीबो के विकास के नाम पर हजारो करोड नहीं, लाखो करोड़ रूपये के बजट पास हो चुके हैं अब तक। लेकिन विकास नाममात्र को हुआ। इसके लिये दोषी कौन है क्या कभी सरकार ने इसबारे में सोचा है?

पश्चिम बंगाल के नक्सलाबाडी़ गांव से जमींदारों के खिलाफ जो आवाज उठी है वह धीरे धीरे अब ताकतवर होता जा रहा है। यह लड़ाई किसी वाद से जुड़ा हुआ नहीं था। जमींदारों के आंतक से देश का अधिकांश हिस्सा पीड़ित है। पीडित परिवारों में से कुछ ऐसे नौजवान थे जो गरीबों को अपने अधिकार प्रति जागरूक करना शुरू किया। यह सब कुछ सत्ता में बैठे लोगों को अच्छा नहीं लगा और उनकी ह्त्याएं की जाने लगी। इसके जवाब में गरीब नौजवान इकठ्ठा होने लगे। एक से दो, दो से चार, एक इलाके से दूसरे इलाके, एक जिला से दूसरे जिले और एक राज्य से दूसरे राज्य तक फैल गया।

नक्सलबाडी से उठी लड़ाई का जो आधार था वह बहुत कुछ मिलता-जुलता था माओवाद से। भारत में माओवाद की राजनीति करने वालों ने इसे एक वैचारिक ताकत दे दी। इससे शोषण से लाचार गरीबों ने अपनी आत्म रक्षा में हथियार उठाये और उसे एक सूत्र में पिरोया माओवाद के सिद्वांत ने। इससे गरीबो की ताकत में जबरदस्त की वृद्वि हुई। देश के केद्रीय और राज्य सरकारों को इस बारे में नये सिरे से सोचना होगा। सरकारी सिस्टम की मदद से सामंतों ने जो वर्षो तक गरीबों पर जुल्म ढाये हैं उसके विरोध को नक्सल के नाम पर गोली बारी कर न्याय की लड़ाई को खत्म नहीं कर सकते। इसके उल्ट आप जाने-अनजाने एक और खूनी क्रांति का बीजारोपण कर देंगे। क्योंकि ये लोग न तो कोई अलग देश की मांग कर रहे हैं और न हीं ये लोग किसी माफिया गिरोह चला रहे हैं। हो सकता है कि कुछ लोग ऐसे होंगे जो नक्सल के नाम पर गलत काम कर रहे हों।

इसका एकमात्र हल है एक साथ अनेक क्षेत्रों में काम करने की। सबसे पहले नक्सल से बातचीत के प्रति ईमानदारी से पहल करना। उन्हें विश्वास दिलाना की सरकर के पास ऐसी योजना है जो पिछडे इलाको में विकास के लिये ठोस कदम उठायेगी और यह काम कुछ महीनों में शुरू हो जायेगा। यदि इसमें किसी प्राकर की राजनीति होती है तो स्थिति और विस्फोटक हो जायेगी।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और केंद्रीय गृहमंत्री के अलावा वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को इस बारें में सोचना होगा। हेलीकॉप्टर से फायरिंग और जहाज से बम गिराने से कोई फायदा नहीं। उस बम को नहीं पता होगा कि न्याय की लड़ाई लड़ने वाले नक्सली कौन हैं और आम आदमी कौन है। यदि हवाई हमला होता है तो यह मान लिजिये की आपने सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिये खूनी क्रांति का बीजारोपण कर दिया है। अमेरिका हो या रूस या चीन य़ा ब्रिटेन या फ्रांस सभी देशों में न्याय के लिये खूनी क्रांति हो चुकी है लेकिन भारत में नहीं।


राहुल गांधी तो ऐसे नेता हैं जो सिर्फ गरीबों के हितों के लिये विचार हीं नहीं करते बल्कि गरीबों को व्यवहार में मानसिक ताकत देते हैं। उनसे मिलते हैं। उनके दर्द को महसूस करते हैं तो आपसे यही उम्मीद होगा कि आप इस बारे में शांति पूर्वक रास्ता निकालेंगें। हम पत्रकार तो सिर्फ आपलोगों का ध्यान हीं आकृषित कर सकते हैं बल्कि निर्णय तो आपको हीं करना है। क्योंकि आपलोग हीं देश का आधार हैं।

Wednesday, November 18, 2009

यदि झारखंड में कांग्रेस की सरकार बनती है तो ईवीएम मशीन के इस्तेमाल को लेकर हंगाम होना तय लगता है

झारखंड विधान सभा चुनाव में एनडीए जहां एकजुट होकर चुनाव लड़ रही है वहीं यूपीए बिखरी हुई है। एनडीए में मुख्य रूप से बीजेपी और जनता दल यूनाईटेड के बीच गठबंधन है तो वहीं यूपीए तीन भागों में बिखरा हुआ है।

पहला, कांग्रेस पार्टी ने इस बार झारखंड विकास मोर्चा के साथ गठबंधन किया है। झारखंड विकास मोर्चा के नेता सांसद बाबूलाल मरांडी हैं। दूसरा, झारखंड मुक्ति मोर्चा अपने दम पर सभी सीटों पर चुनाव लड रही है वहीं तीसरा, एक समय यूपीए का हिस्सा रहे राष्ट्रीय जनता दल और लोक जन शक्ति पार्टी सीपीएम और सीपीआई के साथ मिलकर चुनावी मैदान में ताल ठोक रही है।

ऐसे में झारखंड में यह सवाल उठने लगा है कि यदि झारखंड में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनती है या 20 से भी अधिक सीटें आती है तो इसका मतलब ईवीएम मशीन के साथ छेड छाड की गई है। और इसके खिलाफ राज्य भर में आंदोलन चलाया जायेगा। इस तरह की बातें कोई एक नहीं बल्कि कांग्रेस को छोड हर राजनीतिक पार्टियां कर रही है।

आखिर सवाल उठता है कि ऐसे सवाल क्यों उठ रहें हैं? ऐसे सवाल के पीछे झारखंड में जो चर्चा उसके कई कारण बताये जा रहे हैं –1. कांग्रेस को लोक सभा चुनाव और विधान सभा चुनावओ में मिल रही लगातार सफलता 2. आखिर कांग्रेस ने ऐसा क्या कर दिया है कि विरोधी दलों के गढ में चुनाव जीत रही है। 3. झारखंड में पांच चरणों में चुनाव कराने को लेकर आशांकाएं बढ रही है। 4. लोग कह रहे हैं कि झारखंड नक्सल प्रभावित है लेकिन इतना भी नहीं है कि पांच चरण में चुनाव कराने की जरूरत हो। देश में इस समय सिर्फ झारखंड में हीं चुनाव हो रहे हैं इसलिये सुरक्षा बलो की कमी का हवाला देना भी उचित नहीं लगता। 5. राजनीतिक दलें यह मानने लगी है कि 81 सीटों के लिये चुनाव कराने के लिये एक महीने का समय लेना आशांकाओं को जन्म दे रहा है।

लोगों से बातचीत के बाद हालात यही कह रहा है कि आखिर चुनाव आयोग एक चुनाव कराने के लिये एक महीने का समय क्यों ले रहा है? हालांकि ईवीएम मशीन को लेकर कांग्रेस पार्टी की ओर संकेत करना उचित नहीं लगता। लेकिन झारखंड में जो हालात है उसमें यदि कांग्रेस जीतती है तो ईवीएम मशीन को लेकर हंगाम होना तय लगता है।

Sunday, November 15, 2009

सिंद्री विधान सभा क्षेत्र में राजकिशोर महतो का पलड़ा भारी

झारखंड में चुनावी महौल धीरे धीरे गरमाता जा रहा है। राजकिशोर महतो, आंनद महतो, हाफिजुद्दीन अंसारी, फूलचंद मंडल और दुर्योधन चौधरी – ये पांच मुख्य उम्मीदवार है जो धनबाद जिले के सिंद्री विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड रहे हैं। राजकिशोर महतो निर्वतमान विधायक हैं और इस बार भी बीजेपी के उम्मीदवार हैं। आंनद महतो मार्क्सवासदी समन्यवय समिति(मासस) के उम्मीदवार हैं। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हाफीजुद्दीन अंसारी है। झारखंड विकास मोर्चा(झाविमो) ने फूलचंद मंडल को खड़ा किया है। और दुर्योधन चौधरी झारखंड मु्क्ति मोर्चा के उम्मीदवार हैं। इस सिंद्री विधान सभा सीट पर राजकिशोर महतो का पलडा भारी दिख रहा है। एक बारगी सभी उम्मीदवारों के प्रोफाइल पर नजर -

फूलचंद मंडल(झाविमो) – श्री मंडल सिंद्री विधान सभा से पहले विधायक बन चुके हैं लेकिन उस समय वे भाजपा में थे। झाविमों के श्री मंडल को विश्वास है कि वे चुनाव जीत जायेगें लेकिन वर्तामान में मतदाता का रूख उनकी ओर नहीं दिखता।

हफीजुद्दीन अंसारी(समाजवादी पार्टी) – सिद्री विधान सभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। अंसारी साहेब को पिछली बार जबरदस्त मत मिला था। इसलिये वे मुस्लिम मतदाताओं और सपा वोटों के भरोसे वे चुनाव मैदान में उतरे हैं। हालांकि सपा का कोई खास जनाधार यहां नहीं है।

दुर्योंधन चौधरी(झामुमो) – दुर्योधन चौधरी को भरोसा है कि झामुमो के दम पर वे चुनाव जीत जायेगे। श्री चौधरी व्यवसायी है। इन्हें लगता है कि मुख्य राजनीतिक दलों में से एक मात्र अगड़ी जाति के हैं और झामुमो के वोट मिलाकर वे जीत जायेगें।

आंनद महतो(मासस) - आंनद महतो सिंद्री क्षेत्र के एक ताकतवर नेता हैं। कुर्मी जाति के है और सिंद्री विधान सभा क्षेत्र में कुर्मी जाति का सर्वाधिक वोट हैं। वे यहां से चुनाव जीत चुके हैं। पिछली बार इन्हें बीजेपी के राज किशोर महतो ने हराया था।

राजकिशोर महतो(बीजेपी) – श्री महतो को उम्मीद है कि वे इस बार भी चुनाव जीत जायेगें। मतदाता उनके काम के आधार पर उन्हें मत जरूर देंगे। श्री महतो कुर्मी जाती के हैं और इस विधान सभा क्षेत्र में सबसे अधिक कुर्मी मतदाता हैं। उन्हें भरोसा है कि उन्हें हर वर्ग का वोट मिलेगा। मुस्लिम मतदाता भी उन्हें वोट करेगे। मासस के आंनद महतो उनका वोट नहीं काट पायेंगे। पिछले चुनाव में भी आंनद महतो को हराये थे।

सिंद्री विधान सभा क्षेत्र के इन पांचो उम्मीदवार पर नजर डाले तो बीजेपी उम्मीदवार राजकिशोर महतो के सामने और कोई उम्मीदवार कही नहीं ठहरते। चाहे जनमानस आधार का मामला हो या शिक्षा का या राज्य के विकास में भूमिका निभाने का या आर्थिक दूरदृष्टि का। राजकिशोर महतो की छवि साफ सुथरी है। ये ऐसे नेता हैं जिनका जनाधार राज्य भर में होने के साथ साथ काफी पढे-लिखे हैं। इसलिये सिंद्री की जनता को यह लगता है कि यदि राजकिशोर महतो जीतते है तो क्षेत्र का विकास चरणबद्ध तरीके से जारी रहेगा।

चुनाव में किसकी हार होती है या किसकी जीत यह तो चुनाव परिणाम के बाद हीं मालूम चल पायेगा।

झारखंड दिवस के मौके पर दो शब्द

झारखंड की स्थापना दिवस पर मैंने दो पंक्तियां लिखी है शायद आपको पंसद आये। मैं जानता हूं कि झारखंड में इन दिनों चुनाव का महौल है और भ्रष्टाचार का बोलबाला। यही दो बातें समाचार के सुर्खियों में है। लेकिन मुझे विश्वास है कि झारखंड जल्द हीं भ्रष्टाचार से मुक्त हो जायेगा। और विकास की गति मे तेजी आयेगी। झारखंड दिवस आपको मुबारक हो

श्रमिकों और किसानो.... की भूमि है झारखंड
करते हैं कठोर मेहनत कारखानों में, खेतों में
रहते हैं अंधेरों में लेकिन करते हैं दुनिया को रोशन।

घबराओ नहीं होने वाला है उजाला
यूरेनियम, कोयला, लौह, अबरख ....
और अब मिथेन गैस की चमक है
साथ में है हरेभरे जंगल और लहलहाते खेत।

कस लो कमर
और लगे रहो
देश को श्रेष्ठतर बनाने में ।
जरूरत है योजनाबद्ध शिक्षा, विकास
और सही दिशा में सोच की।

यदि कुछ कर गुजरने की तमन्ना है
तो जागो, उठो, संकोच छोड़ो
और उज्ज्वल भविष्य की परिकल्पनाओं के लिए
ईमानदार कोशिश करो।
बस जरूरत है उस ईमान की
जो देश को कर सके रोशन।

Wednesday, November 4, 2009

भाजपा में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की तलाश

झारखंड में जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं उससे सभी राजनीतिक दल सावधान हो गये हैं। अपनी छवि बनाने के लिये सभी राजनीतिक दलों ने विचार मंथन करना शुरू कर दिया है कि यदि उनकी पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिलता है तो मुख्यमंत्री किसे बनाया जाये। ताकि राज्य का विकास हो सके और पार्टी की छवि भी साफ सुथरी रहे।

मधु कोडा बतौर निर्दलीय उम्मीदवार झारखंड के मुख्यमंत्री बने और उसका क्या हर्ष हुआ यह अभी सामने है। लेकिन इस बात की भी क्या गांरटी है किसी बडे राजनीतिक दल का नेता मुख्यमंत्री बनेगा तो वह भ्रष्ट नहीं होगा। इसलिये देश के दो बडे राजनीति दल कांग्रेस और भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिये नेताओं के नाम पर विचार विमर्श करना शुरू कर दिया है।

पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली थी। 14 में से आठ सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की लेकिन इस बार भाजपा और जदयू का गठबंधन टूट गया है। इसलिये सबसे पहले बीजेपी पर चर्चा करना उचित होगा। इसके बाद अन्य पार्टियों पर।
मुख्यमंत्री पद के लिये कई नाम चर्चा में हैं भाजपा अध्यक्ष रघुवर दास, भाजपा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, वरिष्ठ नेता सरयू राय, रामटलह चौधरी, दिनेश सांरगी और राजकिशोर महतो।

11 अशोक रोड सूत्रों के अनुसार बीजेपी नेतृत्व ऐसे व्यक्ति की खोज में हैं जिसकी छवि साफ सूथरी हो और राज्य को विकास की दिशा दे सके और राज्य को एक मॉडल राज्य के रूप में विकसित किया जा सके। इसके लिये चार पांच मुद्दो पर चर्चा हो रही है।

1. भाजपा इस बार किसी आदिवासी समुदाय से किसी को मुख्यमंत्री बनाना नहीं चाहती। पिछले दस सालों से आदिवासी नेता हीं मुख्यमंत्री होते रहे हैं। ऐसे में बीजेपी से तीन बड़े आदिवासी नेता रहे - करिया मुंडा, अर्जुन मुंडा और बाबू लाल मरांडी। बाबूलाल मरांडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे अब वो भाजपा छोड चुके हैं। करिया मुंडा लोकसभा में उपाध्यक्ष बन चुके हैं और अर्जुन मुंडा सांसद बन कर केंद्र की राजनीति में पहुंच चुके है। ऐसे में आदिवासी मुख्यमंत्री नहीं बनाने पर भाजपा को अधिक परेशानी नहीं होगी।

2. भाजपा के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि झारखंड में यदि किसी आदिवासी नेता को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता और किसी गैर मूलवासी को मुख्यमंत्री पद के लिये आगे लाया जाता है तो भाजपा का गढ झारखंड में पार्टी मुसिबत में आ सकती है। विरोध भी हो सकता है।


3. भाजपा किसी भ्रष्ट नेताओं को भी मुख्यमंत्री बनाना नहीं चाहती है। और यह भी चाहती है कि मुख्यमंत्री ऐसे हीं व्यक्ति को बनाया जाये जो झारखंड का मूलवासी हो। और ईमानदारी से सरकार चला सके। इससे भाजपा की छवि मजबूत होगी।


उपरोक्त तथ्यों पर ध्यान दें तो सिर्फ दो हीं नाम सामने आते हैं रामटलह चौधरी और राजकिशोर महतो। इन दोनो में यदि तुलना की जाये तो रामटलह चौधरी जरूर कई बार सांसद रह चुके हैं लोकिन कानूनी और राजनीतिक अनुभव के मामले में राजकिशोर महतो का पलडा भारी दिखता है। राजकिशोर महतो दुनियां के सर्वश्रेष्ट इंजीनियरिंग कॉलेज से पढकर निकलने के बाद वकालत की। प्राईवेट प्रैक्टिस के बाद दो साल तक सरकारी वकील भी रहे। इसके बाद इन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा से अपनी राजनीति के शुरूवात की। गिरिडीह से सांसद बने। अपनी पार्टी बनाई । इसके अलावा रेलवे से लेकर कई महत्वपूर्ण पदों पर रहकर अपनी जिम्मेदारियां निभाई। श्री महतो झारखंड के भीष्मपितामाह बिनोद बिहारी महतो के ज्येष्ठ पुत्र हैं। बिनोद बाबू ने इस दुनियां को छोडने से पहले अपने क्रांति के बल ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि झारखंड राज्य का गठन होना तय हो गया था।
लेकिन अंतत: मुख्यमंत्री पद के लिये राजकिशोर महतो का चयन होता है या अर्जुन मुंडा का या राम टहल चौधरी का या सरयू राय या दिनेश सांरगी का यह तो आने वाले दिनों में हीं मालूम चल पायेगा।

Sunday, November 1, 2009

भ्रष्टाचार के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री कभी भी गिरफ्तार हो सकते हैं

झारखंड को वहां के नेता और अफसर अपना चारागाह बना चुके है। लाखों नहीं हजारों करोड़ के घपले किये जा रहे हैं। इस सिलसिले में आयकर विभाग ने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा और उसके सहयोगी विनोद सिन्हा, अरूण श्रीवास्तव, भीम सिंह, प्रमोद सिंह, एम एन पाल, देवेंद्र सहित दर्जनों लोगों के यहां छापे मारे।

रांची से लेकर मुंबई-दिल्ली, जमशेदपुर, चाईबासा, नाशिक, कोलकाता और लखनऊ स्थित इनके ठिकानों पर छापेमारी की गई। इनलोगों पर आय से ज्यादा धन इकठ्ठा करने का है। यह मामला हजार करोड से उपर के घोटाले का है। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा जिस तरह से आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने तथा सरकारी धन का दुरूपयोग करने एवं विदेश में खदान खरीदने के मामले में कानून के शिकंजे में आ गये हैं उससे यह प्रतीत होता है कि वह पूछताछ के लिए हिरासत में लिए जा सकते हैं। मधुकोडा को कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है। वे सांसद हैं इसलिये संसद इजाजत लेनी होगी जिसकी प्रक्रिया चल रही है।

सिर्फ आयकर विभाग हीं नहीं बल्कि प्रवर्तन निदेशालय ने भी मधु कोड़ा के खिलाफ सरकारी धन का दुरूपयोग करने तथा लाइब्रेरिया में माइंस खरीदने के मामले में उनपर कानूनी शिकंजा कस दिया। मधु कोड़ा के अलावा उनके कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री रहे कमलेश सिंह, भानु प्रताप शाही एवं बंधु तिर्की पर भी धीरे-धीरे कानून का शिकंजा कस रहा है।

आरोप है कि मधु कोड़ा ने लाइब्रेरिया में 1.7 मिलियन डालर की माइंस खरीदा (7.8 करोड़) मधु कोड़ा पर कभी ट्रैक्टर चालक रहे उनके मित्र बिनोद सिन्हा के नाम पर सम्पत्ति खरीदने का भी आरोप है। प्रवर्तन निदेशालय ने अपने आरोप पत्र में कहा है कि विनोद सिन्हा के दो सौ करोड़ रुपए की सम्पत्ति अर्जित की है। इस मैकेनिक की एक आयरन स्पंज मिल भी है जो चांडिल में अवस्थित है। इसकी कीमत 18 करोड़ रुपए है। विनोद सिन्हा की 13 करोड़ की एक रॉलिंग मिल भी है। यह बहुत कम लोगों को जानकारी है कि कोड़ा ने मुख्यमंत्री पद से हटने के एक दिन पहले चिरिया माइंस के संबंध में आदेश पारित किये जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया। कोड़ा के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई होगी यह तो भविष्य ही बतायेगा। परन्तु इतना तय है कि यहां कोई भी राजनीतिक ग्रुप पाक साफ नहीं है। झारखंड कुछ राज्यों में से एक है जहां राज्यपाल की सलाह के लिए नियुक्त राज्य अधिकारी को गिरफ्तार किया गया।

इस मामले में प्रतिदिन नये राज खुलते नजर आ रहे हैं। संभवान है कि इस मामले में राजनीतिज्ञ के अलावा कई अधिकारी और पत्रकार भी लपेटे में आने वाले हैं।

Thursday, October 29, 2009

झारखंड विधान सभा चुनाव से जुड़ी खबरें


झारखंड में पहले चरण का मतदान अब 25 नवंबर को होगा।
झारखंड के पहले चरण का मतादान अब 27 नवंबर की जगह 25 नवंबर को होगा। निर्वाचन आयोग ने यह फैसला विभिन्न राजनीतिक दलों के अनुरोध के बाद लिया है। राजनीतिक दलों ने अनुरोध किया था कि 28 नवंबर को ईद उल अजहा का त्योहार है यानी बकरीद का त्योहार है। इससे पहले 27 नवंबर को जुमा पर विशेष नमाज होगी। इस कारण बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग मतदान करने से वंचित हो सकते हैं। इसके बाद चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार से विचार विमर्श करने के बाद तीथि में परिवर्तन किया।

25 नवंबर को 30 सीटों के लिए पड़ेंगे वोट। ये सीटे हैं – धनबाद, सिंद्री, झरिया, निरसा, टुंडी, बाघमारा, जमशेदपुर पूर्वी, जमशेदपुर पश्चिमी, राजमहल, बोरियो(एसटी), बरहेट (एसटी), लिट्टीपाड़ा(एसटी), पाकुड़, महेशपुर (एसटी), शिकारीपाड़ा (एसटी), दुमका(एसटी), जामा(एसटी), जरमुंडी, पोड़ैयाहाट, नाला, जामताड़ा, मधुपुर, सारठ, देवघर(एससी), गोड्डा, महगामा, रांची, हटिया, कांके(एससी), जुगसलाई (एससी)।
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चुनाव के लिये फॉर्म की बिक्री 30 अक्टूबर से
झारखंड विधान सभा चुनाव में नामांकन के लिये फॉर्म की बिक्री 30 अक्टूबर से शुरू हो जायेगी। चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित शुल्क सामान्य उम्मीदवारों के लिये पांच हजार रूपये और एससी-एसटी उम्मीदवारों के लिये 2500 रूपया है। सुविधा के लिये जिला निर्वाचन कार्यालय द्वारा ठोस उपाय किये जा रहे हैं।
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81 विधान सभा सीटों के लिये 23 हजार कांग्रेसी उम्मीवारों ने चुनाव लडने के लिये आवेदन किया।
कांग्रेस महासचिव कांग्रेस राहुल गांधी का करिश्मा हीं है कि झारखंड के सारे कांग्रेसी को लगता है कि यदि वे भी चुनाव मे खड़े होंगे तो चुनाव जीत जायेगें। इस बात का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि 81 विधान सभा सीटों के लिये कांग्रेस की ओर चुनाव लडने के लिये 23 हजार से अधिक आवेदन आये हैं। इन सभी को चुनाव लडने के लिये टिकट चाहिये।
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भाजपा सामूहिक नेतृत्व के बल पर चुनाव लडेगी।
झारखंड में बीजेपी दो गुटों में बंटी हुई है एक खेमे का अगुवा यशवंत सिन्हा है तो दूसरे का रघुवर दास। दोनो हीं भाजपा दिग्गज हैं। रघुवर दास झारखंड भाजपा अध्यक्ष हैं तो यशवंत सिन्हा भाजपा के वरिष्ठ नेता। वे केद्रीय वित्त मंत्री रह चुके है। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो यशवंत सिन्हां देश के जाने माने हस्ती और चेहरे हैं लेकिन भाजपा के अंदर उनकी स्थिति उतनी अच्छी नहीं है जितनी पहले थी। लेकिन झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद अर्जुन मुंडा ने कहा कि विधान सभा चुनाव किसी एक चेहरे को सामने रख नहीं लड़ा जायेगा बल्कि सामूहिक नेतृत्व हीं चुनाव लडेगा।
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भाजपा डरी हुई है जनता दल यूनाईटेड से।
भाजपा और जेडीयू के बीच अभी तक तालमेल को लेकर कोई ठोस बातचीत नहीं हो पाई है। वहीं दूसरी ओर जेडीयू झारखंड में अपनी ताकत लगातार बढाती जा रही है। यदि दोनो पार्टियों के बीच तालमेल होता है तो इस बार जेडीयू को अधिक सीटें देने पडेगी जिसके लिये भाजपा अभी तक मानसिक रूप से तैया नहीं है। झारखंडे के दो दिग्गज नेता जेडीयू में शामिल हो चुके हैं शैलेंद्र महतो और राजा पीटर। शैलेद्र महतो का चुनाव लडना तय है और राजा पीटर का भी। राजा पीटर झारखंड के धाकड नेता शिबू सोरेन को एक उपचुनाव में हरा कर चर्चित हुए थे। ऐसे और भी नेता है जेडीयू में शामिल हुए है औ चुनाव लडेगें। ऐसे में बीजेपी क्या करेगी। क्योंकि जेडीयू उन सीटों से चुनाव लडने की तैयारी कर रहा है जहां पहले बीजेपी उम्मीदवार था।

Wednesday, October 28, 2009

गरीब हथियार न उठाये इसके लिये जरूरी है कि शोषक और कालेधन पर रोक लगाये। सिस्टम को ईमानदार बनाये।



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्षा सोनियां गांधी और कांग्रेस महासचिव और इससे भी बढकर गरीबों के हमदर्द राहुल गांधी के नेतृत्व में एक स्वस्थ्य सिस्टम नहीं बना पाया तो आने वाले कई वर्षों तक बनना मुश्किल होगा। राहुल गांधी ने जिस प्रकार से अपने आपको गरीबों के साथ जोड़ा उससे यह उम्मीद बढी है कि मुश्किल समस्याओं का समाधान निकल जायेगा।
देश का पूरा महकमा परेशान है कि गरीब लोगों ने हथियार क्यों उठा लिये। उन्हें हर कीमत पर रोका जायेगा। और इसका अंतिम विकल्प सेना है। पीसीपीए ने अपने नेता छत्रधर महतो को छुड़ाने के लिये भुवनेश्वर से दिल्ली जा रही राजधानी एक्सप्रेस को अगवा कर लिया तो हा हा कार मच गया। मचना स्वाभाविक था। मैं भी इस तरह के काम को या किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं करता हूं। और न हीं किसी प्रकार की हिंसा होनी चाहिये। लेकिन जिस प्रकार से नक्सल का प्रभाव बढता जा रहा है उसके लिये कोई और नहीं हम और आप दोषी हैं। देश के सिस्टम को चलाने वाले दोषी है।

जिसके साथ अन्याय होगा और प्रशासन उसका साथ न दे तो एक शोषित व्यक्ति आत्महत्या कर लेगा।
लेकिन दस शोषित व्यक्ति यह तय कर ले कि आत्महत्या से अच्छा देश के उन दुश्मनों पर राजनीतिक हमला किया जाये, जो सिस्टम सिर्फ अपने स्वार्थ के लिये चला रहे हैं तो आप उनका कुछ नहीं बिगाड सकते। क्योंकि वह वयक्ति भ्रष्ट सिस्टम का इतना शिकार हो चुका है कि वह परिवार सहित आत्महत्या करने के लिये तैयार हैं।
ट्रेन को पांच घंटे तक अगवा कर रखा गया लेकिन पीसीपीए के लोगों ने एक भी यात्री की हत्या नहीं की। क्योंकि उनलोगों की दुश्मनी किसी व्यक्ति या समाज से नहीं है। बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ है जो गरीबों के साथ न्याय नहीं करता। सिस्टम को चलाने वालों में से कई ऐसे लोग हैं जो अत्याचारियो का साथ देते हैं। ऐसे मामले भरे पड़े है कि शोषको ने पहले गरीबों की जमीन को कब्जा किया। उस जमीन पर उसी से मजदूरी कराई। मजदूरी के नाम पर दो-चार रुपये और थपड दिये गये। विरोध करने पर मारपीटाई के साथ उनके घर की महिलाओं की इज्जत तार तार कर दी गई। पुलिस मे शिकायत करने पर उल्टे कुछ पुलिस वालों ने शोषको का साथ दिया। पुलिस वाले गरीबो की रक्षा करने की वजाय वही दुष्कर्म किया जो शोषकों ने किया। न्यायलय की प्रक्रिया इतनी लंबी और महंगा है कि वे वहां तक पहुंच हीं नहीं पाते और जो पहुंचते हैं उसे उसी चक्कर में वर्षों बीता देते लेकिन न्याय नहीं मिलता।

सरकार, प्रशासन, न्यायलय और मीडिया में बैठे लोगों को समझना होगा कि देश की एक बड़ी आबादी हथियार क्यों उठा रही है। इस बात को मीडिय से जुडे लोग उठाते रहे हैं। न्यायलय से जुडे लोग इसका सिर्फ एहसास कर सकते है लेकिन मुख्य काम तो सरकार और प्रशासन को हीं करना है तो वे क्यों नहीं करते। किसी की जमीन लुट जाये, किसी की बहन बेटी की इज्जत लुट जाये। कोई न्याय न मिले तो ऐसे में स्वाभाविक इंसान मरने-मारने पर उतारू हो जाता है।

बहरहाल सरकार नक्सल से निपटने के लिये कड़ाई से निपटने की बात दोहराती है लेकिन उनकी समस्याओं को हल करने के लिये कुछ ठोस कदम नहीं उठाती। लेकिन हमारा सिस्टम उन सभी लोगों को बचाना चाहती है जो देश का कालाधन स्विस बैंकों में जमा रखे हैं।

(बीबीसी के अनुसार) हम सभी जानते हैं कि चीन और जापान के बाद भारत एशिया की तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था है। लेकिन राजस्व रिकॉर्ड देखा जाए तो भारत की लगभग एक अरब 28 करोड़ की आबादी में से केवल तीन करोड़ 15 लाख लोग टैक्स देते हैं। और उनमें से 80 हज़ार लोग ऐसे हैं जिन की घोषित वार्षिक आय साढ़े दस लाख रुपये (22,600 अमरीकी डॉलर) है. मगर स्विस बैंकों सहित दुनिया की साठ से अधिक टैक्स बचाव/ छिपाओ संस्थाओं के ख़ुफिया खातों में चीनियों के केवल 9600 करोड़ डॉलर जमा हैं. जबकि इन ख़ुफिया खातों में भारतीयों के 15 हज़ार करोड़ डॉलर के लगभग जमा हैं।
आसान हिंदी में इस का अर्थ यह है कि दुनिया में काले धन का हर 11वाँ डॉलर किसी न किसी भारतीय के ख़ुफिया खाते में जमा है. अगर इस रक़म को भारत के 45 करोड़ इंतिहाई ग़रीब लोगों को बांट दिया जाए तो हर एक को लाख लाख रुपए मिल सकते हैं।

अब से तीन साल पहले स्विस बैंकर्स एसोसिएशन ने प्रस्ताव दिया था कि अगर भारत सरकार अनुरोध करे तो वह स्विस बैंकों के खातों की जानकारी दे सकती है. लेकिन आज तीन साल बाद भी सरकार "करते हैं, देखते हैं, सोचते हैं, बताते हैं," कर रही है.

केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम हों या वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी या विदेश मंत्री एस एम कृष्णा. सब हैरान हैं कि नक्सली इतने आपे से बाहर क्यों हो रहे हैं. कोई इस पर हैरान नहीं है कि दुनिया में मौजूद साढ़े गयारह खरब डॉलर में से डेढ़ खरब डॉलर के मालिक कुछ हज़ार भारतीय कैसे हैं और इतना बड़ा ख़ुफिया धन भारत से बाहर रखने में कैसे कामयाब हैं.
वर्तमान में देश का नेतृत्व ईमानदार लोगों के हाथ में हैं, चाहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हों या सत्तारूढ पार्टी की अध्यक्षा सोनियां गांधी या गरीबों को हमदर्द बनाने वाले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी । इसलिये उम्मीद की जानी चाहिये कि नक्सल समस्याएं और काले धन का मामला सुलझ जायेगा। अंत में दोनो हीं पक्षों को यह समझना होगा कि हथियार के बल पर समस्याओं का समाधान नहीं होगा। सुरक्षा बल और नक्सली संगठन दोनो को हीं गोलीबारी से बचना चाहिये। और बातचीत के मार्फत एक नये रास्ते निकाले जाने चाहिये।

झारखंड विधान सभा चुनाव से जुड़ी सुर्खियां

झारखंड में विधान सभा चुनाव ऐलान के बाद सभी राजनीतिक दलों की गतिविधियां तेज हो गई है। कौन किस पाले में जायेगा और इसके क्या लाभ होंगे इसको लेकर गुणा भाग किया जा रहा है।

भाजपा नेता राजकिशोर को उम्मीद है कि झारखंड में एनडीए की सरकार बनेगी।
भाजपा विधान सभा चुनाव तैयारियों में जुड गई है। भाजपा नेता राजकिशोर महतो को विश्वास है कि इस बार झारखंड में एनडीए की सरकार बनेगी। सिंद्री विधान सभा इलाके में अपना छाप छोड चुके श्री महतो इस बार भी सिंद्री विधान सभा से चुनाव लडेगें। पिछली बार उन्होंने मासस के ताकतवर नेता आंनद महतो को हराया था। राजकिशोर महतो का प्रभाव सिर्फ अपने विधान सभा क्षेत्र तक हीं सीमित नहीं है। बल्कि पूरे झारखंड में है। श्री महतो के बारे में कहा जाता है कि आज यदि वे राजनीति में नहीं होते तो किसी हाई कोर्ट में जज होते। श्री महतो झारखंड के सर्वाधिक क्रांतिकारी नेता और विचारक विनोद बिहारी महतो के ज्येष्ठ पुत्र हैं। श्री महतो गिरिडीह से सांसद भी रह चुके है।

मासस 13 सीटों पर चुनाव लडेगी -
धनबाद- माक्र्सवादी समन्वय समिति (मासस) ने ऐलान किया है कि आगामी झारखंड विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी 13 सीटों पर अपने उम्मीदावर खड़ा करेगी। इनमें से 9 सीटों पर मासस अपने उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला कर चुकी है। ये सीटें हैं – निरसा, सिंद्री, चंदनकियारी, गिरिडीह, बडकागांव, डूमकी, मांडू, ,सिल्ली और रांची। बाकी चार सीटों (धनाबद, बोकारो, झरिया और टुंडी) पर विचार मंथन जारी है। मासस नेता अरूप चटर्जी ने कहा कि उनकी पार्टी कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाये रखेगी।

राजद और लोजपा मिलकर चुनाव लडेगें झारखंड में
लोक जनतांत्रिक पार्टी(लोजपा) के नेता राजकुमार राज ने कहा कि आगामी विधान सभा चुनाव में यूपीए का रूख क्या होगा अभी तक तय नहीं हो पाया है लेकिन इतना तय है कि लोजपा और राजद( राष्ट्रीय जनता दल) एक साथ मिलकर चुनाव लडेगें। लोजपा ने इसका ऐलान कर दिया है। लोकसभा में राजद-लोजपा को निराशा हाथ लगी थी लेकिन बिहार के उपचुनाव में राजद-लोजपा को बडी सफलता मिली। इससे राजद-लोजपा के कार्यकर्ताओं में एक नया उत्साह है।

जदयू की राजनीतिक शक्ति में इजाफा
जनता दल यूनाटेड(जदयू) झारखंड में अपनी शक्तियो में लगातार इजाफा करता जा रहा है। झारखंड के कई महत्वपूर्ण हस्तियां जदयू मे शामिल हो रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं शैलेंद्र महतो और पीटर राजा। पीटर राजा उस समय सुर्खियों में आये उन्होंने विधान सभा के उपचुनाव में झारखंड के सबसे ताकतवर नेता शिबू सोरेन को हरा दिया था। शैलेंद्र महतो कई बार सांसद रह चुके हैं। श्री महतो झामुमो से अपनी राजनीति की शुरूवात किये थे लेकिन बाद में बीजेपी में चले गये लेकिन बीजेपी ने इनके साथ न्याय नहीं किया।

Tuesday, October 27, 2009

छत्रधर महतो को छुड़ाने के लिये राजधानी एक्सप्रेस हाईजेक

पीसीपीए(People's committee against police atrocities ) के नेता छत्रधर महतो को जेल से छोडने की मांग को लेकर माओवादियों ने भूवनेश्लर से दिल्ली आ रही राजधानी एक्सप्रेस को अगवा कर लिया था जिसे चार-पांच घंटे बाद सीआरपीएफ के जवानो ने छुडवाया। इस दौरान किसी भी यात्री को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया।

दिन में साढ़े तीन बजे पश्चिम बंगाल के झारग्राम इलाके के बांसतला में माओवादियों ने लाल झंडा दिखा कर राजधानी एक्सप्रेस को रुकवा दिया था। ड्राइवर ने लाल झंडा देख गाड़ी रोक दी। इसके बाद माओवादियों ने ट्रेन के ड्राइवर तथा असिस्टेंट ड्राइवर को अपने कब्जे में कर लिया था। उन्हें छुड़ाने गए सीआरपीएफ के जवानों के साथ माओवादियों की झड़प भी हुई। सीआरपीएफ के जवानों ने माओवादियों को मौके वारदात से छुडाकर ट्रेन और ट्रेन के ड्राईवर को अपने संरक्षण में ले लिया।

देश के गृहमंत्री ने कहा है कि ट्रेन को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। सभी यात्री सुरक्षित है। लेकिन सवाल उठता है कि इस नक्सल समस्याओं से कैसे निपटा जाये। यदि सरकार सिर्फ कंमाडो के बल पर नक्सलियों को खत्म करना चाहती है तो यह संभव नहीं दिखता। केंद्र और राज्य सरकारों को आम जनता की समस्याओं को समझना होगा। उनके लिये सरकारें जो बजट पास करती है उन्हें विकास के काम लगना होगा नहीं तो आने वाले दिनों में हालात और भी खराब होते जायेगें। पुलिस-प्रशासन को समझना होगा कि आम आदमी को न्याय कैसे दिलायें।

गरीबों के खिलाफ की जा रही षडयंत्रो का जोरदार विरोध करेगी झामुमो – हेमंत सोरेन

विजय रवानी की रिपोर्ट -
झामुमो के नेता और राज्यसभा सांसद हेमंत सोरेन ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी किसी अन्य पार्टी से चुनावी समझौता करने की पहल नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि झामुमो अकेले विधानसभा का चुनाव लड़ने के पक्ष में है। श्री सोरेन ने कहा कि झामुमो जब कभी भी अकेले चुनाव लड़ा है तब उनकी पार्टी फायदे में रही है। और समझौते के तहत लड़ने में उन्हें नुकसान उठाना पड़ा है।

झामुमो नेता हेमंत सोरेन ने आक्रमक रूख अपना लिया है। उन्होंने कहा कि यदि केंद्र सरकार कोई गलत फैसला लेती है तो झामुमो उसका जोरदार विरोध करेगी। यूपीए से झामुमो का संबंध सिर्फ केद्रीय सरकार को समर्थन देने तक सीमित है।

हेमत सोरेन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल के उस सुझाव का भी जोरदार विरोध किया कि आईआईटी में प्रवेश के लिये 80 प्रतिशत अंक अनिवार्य होंगें। उन्होंने कहा कि कपिल सिब्बल के इस सुझाव का सीधा असर गरीबों, पिछड़ों, आदिवासियों और दलितों पर पड़ेगा। श्री सोरेन ने कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री सिब्बल कह रहे हैं कि इस बारे में आइआइटी काउंसिल निर्णय लेगा। सिब्बल के इस प्रयास से यह साबित होता है कि कांग्रेस का हाथ आम लोगों के साथ नहीं है।

श्री सोरेन ने कहा कि कांग्रेस पार्टी समाज के कमजोर वर्गों के बीच चालाकी से फूट डालने की कोशिश कर रही है लेकिन झामुमो ऐसा होने नहीं देगा।

यूपीए के बिखरने का लाभ होगा एनडीए को झारखंड में ।

झारखंड में विधान सभा चुनाव के लिये सभी राजनीतिक दलों ने जोर लगाना शुरू कर दिया है। एक ओर यूपीए जहां झारखंड में बिखरा हुआ है वही दूसरी ओर एनडीए यूपीए के आपसी एकता बिखरने से खुश है। एनडीए को लगता है कि यदि यूपीए लोकसभा चुनाव की तरह विधान सभा चुनाव में भी बिखरा रहता है तो एनडीए लोकसभा चुनाव की तरह विधान सभा चुनाव में भी यूपीए का सफाया कर देगा।

झारखंड में भाजपा के दिग्गज नेता राजकिशोर महतो ने कहा कि झारखंड में एनडीए की सरकार बनेगी यह तय है। उन्होंने कहा कि यूपीए से जुडे राजनीतिक दल झारखंड में विकास का काम नहीं कर सकते। श्री महतो ने कहा कि झारखंड की जनता इस बार पूर्ण बहुमत देगी एनडीए की सरकार को ताकि झारखंड की अर्थव्यस्था पटरी पर आ सके। श्री महतो ने कहा कि यूपीए के बिखरने और न बिखरने का सवाल नहीं है। झारखंड में भाजपा काफी मजबूत स्थिति में है इस लिये एनडीए की जीत तय है।

झारखंड में जिन राजनीतिक दलों का दखल है उनमें महत्वपूर्ण पार्टियां हैं – कांग्रेस, भाजपा, झामुमो, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाईटेड, आजसू और वामपंथी पार्टियां हैं। इनमें से भाजपा और जदयू के बीच तालमेल लगभग तय माना जा रहा है लेकिन आजसू का रूख अभी तक साफ नहीं है। एक समय यूपीए से जुड़े रहे कांग्रेस, झामुमो और राजद मिलकर चुनाव लड़ते हैं या नहीं इसको लेकर अभी कुछ भी साफ नहीं है। लेकिन इतना तय है कि राजद और रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी मिल कर चुनाव लडेगी।

बहरहाल, राजनीतिक अस्थिरता के चलते लगभग झारखंड में राष्ट्रपति शासन लागू रहा। इस साल 19 जनवरी को राष्ट्रपति शासन लागू हुआ था। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा झारखंड में राष्ट्रपति शासन का अंत कर राज्य विधानसभा को भंग करने के फैसले के एक दिन बाद मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने 23 अक्टूबर को चुनाव तिथि का ऐलान किया। मुख्य चुनाव आयु्क्त ने कहा कि राज्य में 27 नवंबर और 2, 8, 12 और 18 दिसंबर को 5 चरणों में वोट डाले जाएंगे। वोटों की गिनती का काम 23 दिसंबर को होगा।

नवीन चावला ने कहा कि राज्य में कुल मिलाकर 1 करोड़ 80 लाख 27 हजार 476 वोटर मतदान के योग्य हैं। राज्य की कुल 81 विधानसभा सीटों में से 28 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए और नौ सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं।

Friday, October 16, 2009

नक्सली हमले में मारे गये इंस्पेक्टर फ्रांसिस के परिवार से मिले राहुल गांधी

नक्सलियों के हमले में मारे गये इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदवार की पत्नी सुनीता ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को बताया कि नक्सवाद पर रोक लगाने के लिये ग्रामीण इलाकों में मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था करनी होगी - जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क आदि। सुनिता और उनके तीनों बच्चों से मिलने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी खुद गये थे। क्योंकि कुछ दिनों पहले नक्सलियों ने इंस्पेक्टर फ्रांसिस की बेरहमी से हत्या कर दी थी। राहुल गांधी ने खुद पूछा कि नक्सवाद को मुख्यधारा में लाया जा सकता है।

इंस्पेक्टर के परिवार वालों से राहुल गांधी ने कहा कि आत्मघाती हमले में पिता को खोने का दर्द वे समझते हैं। उन्होंने इंदवार की पत्नी सुनीता और तीनों बच्चो को हिम्मत देते हुए कहा कि तमिलनाडु के श्रीपेरूम्बुदूर में उन्होंने भी अपने पिता को खो दिया था।
1991 में आत्मघाती हमले में उनके पिता की हत्या कर दी गई थी। उन्होंने बच्चो से कहा कि आप अच्छे से पढाई करना।

अपने दो दिवसीय झारखंड दौरे के दौरान राहुल गांधी ने इंदवार के परिवार के यहां लगभग 20 मिनट बताय़े। राहुल गांधी ने इस बात पर भी विचार करना शुरू कर दिया है कि नक्सलियों को मुख्यधारा में कैसे लाया जाये। उनकी बुनियादी समस्याओं को समझ उसे कैसे दूर किया जाये।

Thursday, October 15, 2009

अपने वेतन में कटौती का फैसला किया मुकेश अंबानी ने

देश के जानेमाने उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के प्रमुख मुकेश अंबानी ने अपने वेतन में दो तिहाई कटौती करने का फैसला किया है। जीवन में सादगी को प्राथमिकता देने वाले मुकेश अंबानी ने मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के वेतन में कमी लाने के लिए चल रही बहस के बीच एक उदाहरण पेश करने का फैसला किया है।

मुकेश अंबानी ने इस ओर इसलिये पहल की है क्योंकि देश के कंपनी मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा था कि सीईओ स्तर के अधिकारियों को अपने वेतन के बारे में सोचना चाहिये। मुकेश अंबानी के इस फैसले के बाद अब उन्हें एक साल में सिर्फ 15 करोड़ रुपये का पैकेज मिलेगा जबकि उनका पैकेज 44 करोड़ का था।

आरआईएल के सीईओ मुकेश अंबानी के इस फैसले के बाद उनका वेतन अन्य कंपनयों के सीईओ के वेतन से भले हीं कम हो जायेगा लेकिन उन्होंने जो यह कदम उठाया है वह आने वाले दिनों में एक मिसाल कायम करेगा।

कांग्रेस बना सकती है डॉ उरांव को झारखंड का मुख्यमंत्री उम्मीदवार

कांग्रेस पार्टी को झारखंड में एक ऐसे चेहरे की तलाश है जिसकी छवि साफ सुथरी हो और राज्य की बागडोर संभाल सके। यानी मुख्यमंत्री का दायित्व निभा सके। कांग्रेस की ओर से कई दावेदार हैं। लेकिन जानकार बताते हैं कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की पंसद डॉ रामेश्वर उरांव हैं। रामेश्वर उरांव इस बार संसद का चुनाव हार गये लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं को उनपर अभी भी विश्वास है।

रामेश्वर उरांव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पिछली सरकार में आदिवासी कल्याण राज्य मंत्री थे। राजनीति में आने से पहले वे झारखंड में अतिरिक्त पुलिस महानिदेश थे। अर्थशास्त्र के अच्छे जानकार हैं। अर्थशास्त्र में वे पीएचडी हैं। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन जी को भी लग सकता है रामेश्वर उरांव बढिया उम्मीदवार होंगे झारखंड मुख्यमंत्री पद के लिये।

डॉ उरांव के बारे में कहा जाता है कि उनकी छवि ईमानदार है। अर्थशास्त्र के अच्छे जानकार होने के साथ साथ प्रशासन का अच्छा खासा अनुभव है। इसलिये वे झारखंड के विकास के साथ साथ वहां के नक्सल समस्याओं के समाधान के रास्ते भी निकाल सकते हैं।

हर जगह चर्चा में हैं राहुल गांधी

झारखंड में इनदिनों चर्चा है तो सिर्फ कांग्रेस नेता राहुल गांधी की। खनिज संपदा से भरपूर झारखंड के विकास के प्रति राहुल गांधी काफी संवेदनशील हैं। वे कांग्रेस को मजबूत बनाने के साथ साथ भविष्य के लिये अच्छे युवा नेता भी तैयार करना चाहते हैं। उन्होंने साहेबगंज और दुमका में आयोजित एक कार्यकर्ता सम्मलेन में युवाओं को आगे आने का आह्ववान किया। उन्होंने कहा कि सलेक्शन के बदले इलेक्शन पद्वति पर जोर दिया जा रहा है ताकि सही नेतृत्व उपर आ सके। उन्होंने रांची के अलावा धनबाद जिले में भी कार्यकर्ताओं से मिले और पार्टी को मजबूत बनाने का आह्वान किया।

आज पूरे झारखंड में सिर्फ राहुल गांधी की हीं चर्चा है। विरोधी दल के नेता भी दबे जुबान हीं लेकिन राहुल गांधी की तारीफ करने से नहीं हिचकते। राहुल गांधी ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया है। राहुल गांधी जहां भी गये वहां वे बहुत अधिक शब्दों को प्रयोग नहीं किये। लेकिन जितना हीं उन्होंने कहा वह इतना प्रभावी रहा कि सभी उनके कायल हो रहे हैं।

दुमका के एक रवानी परिवार ने कहा कि राहुल गांधी में वह दमखम और जोश दिखता है जो सही मायने में वे अपने देश के लिये कुछ करना चाहते हैं। उन्हें सलाम है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी जब झारखंड पहुंचे तो उनके साथ झारखंड कांग्रेस के अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू, केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय और विधायक दल के नेता के अलाव और भी कई लोग मौजूद थे।

Tuesday, September 15, 2009

ट्रेन यात्रा के दौरान राहूल गांधी पर पथराव

कांग्रेस पार्टी के महासचिव राहुल गांधी जिस शताब्दी ट्रेन से यात्रा कर रहे थे उसी ट्रेन पर जमकर पथराव किया गया। यह पथराव अंबाला के पास किया गया। राहुल गांधी लुधियाना की यात्रा पर थे। लुधियाना से वापस आने के दौरान अंबाला के पास पथराव हुआ। शताब्दी को निशाना बना कर किये गये पथराव में ट्रेन के तीन डिब्बों सी-2, सी-4 और सी-7 डिब्बो पर पथराव हुआ। राहुल गांधी सी-3 में यात्रा कर रहे थे। खबर है कि इस पथराव में कुछ लोगों को चोटें भी आई है। खर्च में कमी कटौती करने के तहत वे रेल से यात्रा कर रहे थे।

जिस ट्रेन से राहुल गांधी यात्रा कर रहे थे उस पर हमला किसने किया इसकी जानकारी अभी तक तो नहीं हो पाई है लेकिन इतना जरूर है कि इसके पीछे राजनीतिक विरोधियों का हाथ हो सकता है। जिन लोगों ने पथराव कराये हैं वे लोग भले हीं अभी सामने नहीं है लेकिन इतना तय है कि वे लोग घटिया किस्म के लोग होंगे। जो सकारात्मक राजनीति नहीं कर सकते। और सकारात्मक राजनीति करने वालों को परेशान करते रहते हैं।
बीजेपी राहुल गांधी की यात्रा को नौटंकी बता रहे हैं और उनका दावा है कि इससे मंदी खत्म नहीं होगा। सवाल मंदी खत्म करने का नहीं है बल्कि एक मानसिकता का है कि आप देश के बारे में छोटी छोटी बातों की ओर ध्यान देते हैं या नहीं। बूंद-बूंद से हीं घड़ा भरता है। खैर यह बहस का अलग विषय है। जिन लोगों ने ट्रेन पर हमला किया है वो लोग एक योजना के तहत हीं हमला किया। यह तय लगता है। ऐसी गंदी राजनीति से बचनी चाहिये।

न्याय के लिये पढना और लडना जरूरी है।


राजकिशोर महतो, स्वर्गीय विनोद बिहारी महतो के ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनके पिता विनोद बाबू झारखंड मुक्ति मोर्चा(झामुमो) के संस्थापक अध्यक्ष रहे। राजकिशोर महतो भी अपनी राजनीति की शुरूवात झामुमो से की। लेकिन वर्तमान में वे भाजप में हैं और धनबाद जिले के सिंद्री विधान सभा से विधायक हैं। इनका जन्म 23 सितंबर 1946 को हुआ। शुरू से मेधावी छात्र रहे श्री महतो ने धनबाद जिले स्थित विश्व प्रसिद्ध माइनिंग इंजीनियरिंग कालेज से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। इसके बाद कानून की पढाई कर कानून की डिग्री हासिल की। पटना उच्च न्यायलय के रांची पीठ में 1990-91 के दौरान दो वर्षों तक सरकारी वकील भी रहे। 18 दिंसबर 1991 को अपने पिताजी के निधन के बाद उनके स्थान पर गिरिडीह संसदीय सीट से उपचुनाव जीतकर लोक सभा पहुंचे। इनके पिताजी गिरिडीह से सांसद थे। वे सांसद से बढकर एक क्रांतिकारी थे। उन्होंने झारखंड दब-कुचले में चेतना जगायी – पढो और लड़ो के नारे साथ। बहरहाल भाजपा विधायक राजकिशोर महतो से बातचीत का विवरण -

प्र. आपके पिताजी विनोद बाबू हमेशा कांग्रेस और भाजपा को पूंजीपतियों और उच्च वर्ग की पार्टी मानते रहे। इन पार्टियों से उन्होंने कभी हाथ नहीं मिलाया लेकिन आप भाजपा में शामिल हो गये क्यों ?
उ.
आप सही कह रहे हैं कि मेरे पिताजी विनोद बाबू ने कभी भी कांग्रेस और भाजपा से हाथ नहीं मिलाये। बीजेपी की स्थापना 1980 में हुई। इसलिये बीजेपी का सवाल नहीं उठता है। बीजपी कई नेताओं कैलाशपति मिश्र, सत्येद्र दुदानी से उनके अच्छे संबंध रहे। उनकी लडाई कांग्रेस पार्टी से थी। इमरजेंसी के दौरान उन्हें जेल जाना मंजूर था और जेल भी गये लेकिन कांग्रेस से हाथ नहीं मिलाये। हालांकि कांग्रेस की ओर से भारी दबाव था कि वे कांग्रेस का साथ दें। जहां तक मेरा भाजपा में शामिल होने का सवाल है तो इसके पीछे का मूल मकसद सिर्फ अलग राज्य का गठन हीं था। मैं भाजपा में जरूर हूं लेकिन अपनी नीतियां कभी नहीं बदली। कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने पार्टियां नहीं बदली लेकिन नीतियां बदल दी। राजनीतिक उठापटक और ऊहापोह के दौर में, मैं भाजपा में इसी शर्त पर शामिल हुआ कि अलग झारखंड राज्य का गठन जरूर किया जायेगा। और इस अलग झारखंड राज्य गठन हुआ।

प्र. आपने राजनीति की शुरूवात झामुमो से की। भाजपा में शामिल होने से पहले आप समता पार्टी में थे। आखिर पार्टी बदलते रहने का मूल कारण ?

उ. 9 अगस्त 1992 को झामुमो दो भागों में बंट गया। पहला, झमुमो(सोरेन) और दूसरा झामुमो(मार्डी)। सोरेन खेमे में चार सांसद(शिबू सोरेन, सूरज मंडल, साइमन मरांडी और शैलेन्द्र महतो) और नौ विधायक थे। मार्डी ग्रुप में दो सांसद(कृष्णा मार्डी, राजकिशोर महतो) और नौ विधायक थे। धीरे धीरे झामुमो मार्डि के कुछ नेता झमुमो सोरेन में शामिल हो गये। मैं भी 31 अक्टूबर 1998 को समता पार्टी में शामिल हो गया। इससे मार्डी ग्रुप का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। जहां तक समता पार्टी में शामिल होने सवाल है तो इसका मुख्य कारण था कि समता पार्टी के नेता जार्ज फर्नाडीस अलग राज्य गठन से संबंधित समिति के अध्यक्ष भी थे। नीतीश कुमार भी झारखंड अलग राज्य का जोरदार समर्थन कर रहे थे। अलग झारखंड राज्य के मामले में अन्य दलों का रुख साफ नहीं था। कई दल अलग राज्य का विरोध भी कर रहे थे। और मैं हमेशा हर हाल में और किसी भी कीमत पर अलग झारखंड राज्य के पक्ष में रहा। समता पार्टी में इसलिए शामिल हुआ कि समता पार्टी अलग झारखंड राज्य का समर्थन कर रही थी।

प्र. एक व्यक्तिगत सवाल। कहा जाता है कि आपका अपने पिताजी से कभी नहीं बना ?
उ. नहीं इस तथ्य में कोई सच्चाई नहीं है। किसी बात को लेकर पिताजी थोड़े नाराज हो गये थे वो भी थोड़े समय के लिये। यह सब कुछ हर घर में होता है। पिताजी के क्रांतिकारी आंदोलन में, मैं हमेशा उनका सहयोगी बना रहा। पिताजी अपने परिवार से ज्यादा झारखंडवासियों के हो चुके थे। परिवार के लिए समय निकालना उनके लिए बडा कठिन होता था। आदिवासी, दलित, पिछड़े या अन्य गरीब लोगों के साथ वे काफी घुल मिल जाते थे। उनकी समास्याओं को सुनते और हर संभव हल करने की कोशिश करते थे। लोग रात के बारह बजे भी अपनी समस्या लेकर चले आते थे। पर पिताजी कभी किसी को निराश नहीं किये। उनकी बातें सुनते और सुबह होने पर यथा संभव हल करने की कोशिश करते।

प्र. कहा जाता है कि विनोद बाबू को वर्तमान न्याय प्रणाली पर कभी भरोसा नहीं था ?
. जी हां, आपने सही सुना है। उन्हें उस समय की न्याय प्रक्रिया पर भरोसा नहीं था। अदालत से न्याय पाने में वर्षो लग जाते थे। उन्होंने नजदीक से देखा कि कोर्ट कचहरी गरीबों के लिए नहीं है। इसलिये वे गांवों में पंचायत कर सीधे फैसला करते थे। लोगों को न्याय जल्द मिल जाता था। प्रशासन ने यह कहना शुरू कर दिया था कि विनोद बाबू गांवों में समानांतर सरकार चला रहे हैं। लेकिन उनकी सोच दूर की थी। आज चालीस साल बाद सरकार भी वही करने लगी है। गांवों में लोक अदालत लगाई जाने लगी है। संगीन मामलों की सुनवाई के लिये फास्ट ट्रैक कोर्ट और विशेष अदालतें बनायी जाने लगी हैं।

प्र. क्या यह सही है कि विनोद बाबू हिंसा में विश्वास करते थे ?
उ.
पिताजी सीधे कार्रवाई में विश्वास करते थे। उन्होंने झारखंडवासियों के आत्मा को जगया। सिर उठाकर चलना सिखाया। शोषण के खिलाफ मरने मारने को तैयार किया। सरकारी हिंसा का जबाव उन्होंने हथियारबंद जुलूसों से दिया। गुंडो और महाजनो से सीधे लड़ने के लिये लोगो को प्रोत्साहित किया। क्योंकि उस समय कचहरी और प्रशासन झारखंड झारखंड के शोषितों, दलित-आदिवासी और पिछड़ो के हक में नहीं थी। पिताजी का कहना था कि तिल तिल कर मरने से अच्छा है एक ही बार मरो और मरने से पहले मार कर मरो।

प्र.‘पढो और लड़ो’ यह नारा विनोद बाबू ने दिया था। आखिर इसका वास्तविक तात्पर्य क्या है?
. इस नारे को पिताजी ने दिया था। ‘पढो और लड़ो’ का जो नारा दिया गया उसका अर्थ यही है कि अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए पढना भी जरुरी है ताकि आप समझ सके कि संविधान में नागरिक को क्या क्या अधिकार दिये गये हैं। पढ कर लोग इतनी समझ जरूर बना ले कि आपको कोई ठग न सके। उन्होने सिर्फ नारा हीं नहीं दिया बल्कि लोगों के लिए बुनियादी सुविधा की व्यवस्था भी करवाई। अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा उन्होने स्कूल-कालेज बनवाने में दान दे दिया। उन्होंने स्कूल – कालेज के अलावा जो भी प्राथमिक शिक्षा संस्थान खोले वे दूर दराज गांवो में खोले, पिछड़े इलाके में खोले, जहां शिक्षा के साधन नहीं थे। ये सारे संस्थान व्यवसायिक नहीं था फीस इतनी कम रखी गई थी कि संस्थान को चलाने के लिये उन्हें अपनी जेब से भी पैसे खर्च करने पड़ते थे। गांव गांव में शिक्षा का प्रसार करना उनका मूल मकसद था फिर हक के लए संघर्ष करना।

प्र. विनोद बाबू अपनी राजनीतिक जीवन की शुरूवात वामपंथ से की। आखिर क्या वजह रही झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन का?
उ.
पिताजी का मानना था कि जो राष्ट्रीय पार्टियां हैं। ये पार्टियां समाज में परिवर्तन के खिलाफ है। इन पार्टियों में रह कर कमजोर वर्ग के लिए कुछ नहीं किया जा सकता। वे छात्र जीवन से हीं वामपंथ से प्रभावित थे। कार्ल मार्क्स, लेनिन और माओत्से तुंग की नीतियों एवं कार्यशैली ने उन्हें काफी प्रभावित किया। इनके सिद्धांतो में विनोद बाबू को सामाजिक एवं क्रांति का रास्ता दिखाई दिया। लाल झंडे के बैनर तले वे झारखंड के शोषित जनता को जगाना चाहा। 1972 तक आते आते उन्होंने देखा कि लोग लाल झंडे के साथ अपने को जोड़ नहीं पा रहे हैं। इलाके में लगातार आदिवासी, हरिजन और पिछड़े वर्ग पर अत्याचार हो रहें हैं। कुछ ऐसी घटनाएं घटी कि विनोद बाबू ने एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला किया और झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ।

Monday, September 14, 2009

राष्ट्रपति शासन हटाओ झारखंड बचाओ – राजकिशोर

झारखंड में राष्ट्रपति शासन लागू है। वहां विधान सभा चुनाव कब होंगे ? इसका जवाब कांग्रेस पार्टी को छोड़ कोई नहीं जानता। चुनाव नहीं कराये जाने के विरोध में बीजेपी के सारे विधायक विरोध स्वरूप त्यागपत्र भी दे चुके हैं। देश भर में ब्लैक डायमंड कैपिटल के नाम से मशहूर धनबाद जिले के सिंद्री विधान सभा से बीजेपी विधायक राजकिशोर महतो ने झारखंड में जल्द से जल्द चुनाव कराने की मांग की है। श्री महतो ने कहा कि राष्ट्रपति शासन के बहाने कांग्रेस पार्टी भ्रष्टाचार को बढावा दे रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शासन के दौरान किस प्रकार की लूट मची है यह किसी से छिपा नही है।

राजकिशोर महतो ने यह भी कहा कि चुनाव नहीं कराने के पीछे कांग्रेस का डर है। क्योकिं राष्ट्रपति शासन पूरी तरह कांग्रेस के कमान में है। और राज्य के राज्यपाल रह चुके सिब्ते रजी के कार्यकाल में किस प्रकार की लूट खसोट हुई इससे कांग्रेस की बड़ी फजीहत हुई है। इतना हीं नहीं नरेगा के तहत झारखंड को मिलने वाली एक हजार करोड़ रूपये भी वापस कर दिय गये।

श्री महतो ने आरोप लगाया कि झारखंड में सब कुछ है लेकिन यहां एक साजिश के तहत झारखंड को पनपने नहीं दिया जा रहा है। ये सब कुछ बहुत दिनों तक चलने वाला नहीं है। कबतक झारखंड की जनता को लुटा जाता रहेगा। यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में जोरदार आंदोलन होगा। यह आंदोलन इतना जोरदार होगा जिसकी कल्पना केंद्र सरकार ने नहीं की होगी।

झारखंड के ताकतवर नेता माने जाने वाले श्री महतो ने कहा कि यदि झारखंड और यहां के लोगों के साथ न्याय नहीं किया गया और विकास के काम अडेंगे लगाये गये तो आर्थिक नाकेबंदी जैसी हालात पैदा कर दी जायेगी।

उन्होंने कहा कि राज्य में बाबूओं की सरकार हो गई है। कोई किसी की सुनता हीं नहीं है। इस तरह कब तक चलेगा। लोकतंत्र को दबाना किसी केंद्रीय सरकार की सेहत के लिये अच्छा नहीं होगा।

विधायक महतो ने कहा कि कांग्रेस यह हीं नहीं समझ पा रही है कि झारखंड में वह अकेले चुनाव लड़े या सहयोगी दलों के साथ। यदि वह झामुमो से तालमेल करती है तो मुख्यमंत्री का पद झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन को देना होगा या उनके बेटे हेमंत सोरेन को। अकेले लडती है तो कितने सीटें मिलेंगी कहना मुश्किल है। राजद के साथ उनका छतीस का आंकड़ा हो चुका है। यदि झारखंड में राजद को साथ रखती है तो केंद्र में जगह देनी होगी। श्री महतो ने कहा कि उन्हें लगता है कि कांग्रेस गठबंधन के निष्कर्ष निकालने पर लगी हुई है और राष्ट्रपति शासन के दौरान हो रहे भ्रष्टाचार से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश के तहत हीं जानबूझ कर झारखंड में चुनाव कराने से बच रही है। लेकिन कब तक।

Thursday, September 3, 2009

जीने की लड़ाई का मंच है पीपुल्स वार ग्रूप। नक्सल समस्याएं और इसके समाधान के रास्ते

राजेश कुमार

देश की केंद्रीय सरकार और राज्य की सरकारों को युद्व स्तर पर विकास का काम करने होंगे। नहीं तो नक्सली गतिविधियां तेजी से पैर पसारता जायेगा। सिर्फ नक्सलियों को अपराध की श्रेणी में खड़ा कर और बडे पैमाने पर कमांडो कार्रवाई के बल पर आप उसपर काबू नहीं पा सकते। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि नक्सली हिंसा क्यों होती है और इसे अपराध की किस श्रेणी में रखा जाये।

नक्सल गतिविधियों से जुडे लोगों को आप जम्मू-कश्मीर के आंतकवादियों से नहीं जोड़ सकते। क्योंकि वे कोई अलग देश की मांग नहीं कर रहें हैं। और न हीं वे पंजाब के आंतकवादियों की तरह कोई अलग खलिस्तान की मांग कर रहे हैं। और न हीं वे कोई माफिया गिरोह चला रहे हैं और न अन्य कोई अपराध का सींडीकेट। इनकी लड़ाई न तो धर्म के आधार पर और न हीं जात के आधार पर और न हीं भाषा के आधार पर। नक्सल से सभी धर्म, जात और भाषा के लोग जुडे़ हैं। इसलिये इसका प्रसार पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, यूपी, छतिसगढ, आंध्र प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक है।

यह पीपुल्स वार का हिस्सा है। हो सकता है कि नक्सल के नाम पर कुछ लोग गलत काम कर रहें हों इससे इंकार नहीं किया जा सकता। सबसे पहले यह साफ कर दूं की कि मैं किसी हिंसा को समर्थन नहीं कर रहा हूं बल्कि एक समस्या जो धीरे धीरे विकराल रूप ले जाता रहा है उस ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं ताकि आप संक्षेप में वास्तिवक समस्याओं को समझ सके और उसका समाधान निकाल सकें। क्योंकि इससे एक ओर जहां कई लोग मारे जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर विकास की गतिविधियां अवरूद्व हो रही है।

समस्याएं –
1.जमीन की समस्याएं
– गरीब लोगों की जमीन पर जबरदस्ती कब्जा करने का सिलसिला जारी है। इस काम में स्थानीय पुलिस के कुछ लोग पैसे लेकर गरीब आदमी को उसी की जमीन से बेदखल कर रहें हैं। और ताकतवर लोग जाली कागजात के बल पर गरीब की जमीन को अपने नाम पर करवा रहें हैं। इस पर रोक लगाने की सख्त जरूरत है। इस तरह की घटनाएं हिंसा को जन्म देती है।

2.मजदूरी और इज्जत की समस्याएं – जमींदार और महाजन गरीबों से काम तो करवा लेतें हैं लेकिन मजदूरी के नाम पर उन्हें सिर्फ पांच से दस रुपये थाम दिया जाता है। अपनी वास्तविक मजदूरी की मांग करने पर उसकी मार-पिटाई करते हैं। और उसके परिवार के इज्जत के साथ खिलवाड भी करते हैं। जब लोग जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करते हैं ऐसे में हिंसा का जन्म होता है।

3.जमीन पर उद्योपतियों के लिये सरकारी कब्जा – विकास के नाम पर सरकार द्वारा जमीन हडप लेना। यदि सरकार वह जमीन अपने पास रखती है तो एक बात समझ में आती है। लेकिन यहां तो खेल पूरी तरह गलत तरीकों से होता है। सरकार गरीब ग्रामीणों का जमीन लेकर कल-कारखाने बसाने के नाम पर सारी जमीनें सस्ते दर में उद्योपतियों को दे देती है। यहां एक बात समझनी होगी कि यदि रूपये के बिना कल-कारखाने नहीं लग सकते हैं तो जमीन के बिना कल-कारखाने कैसे लग सकते हैं। इसलिये विकास के नाम पर आपको जमीन चाहिये तो जो जमीन के वास्तिवक मालिक हैं उन्हें भी कंपनी के लाभांश में हिस्सा मिलना चाहिये। ऐसा प्रस्ताव न देकर जबरदस्ती जमीन हडपने की कोशिश भी हिंसा को जन्म देती है।

4.गांवों की ओर ध्यान न देना – केंद्र और राज्य सरकारें ग्रामीण शिक्षा, स्वास्थ्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिये जितना बजट पास करती है उसका 70 प्रतिशत हिस्सा नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों के पॉकेट में चला जाता है। ऐसा आजादी के कुछ साल बाद से हीं होता आ रहा है। ऐसे में ग्रामीण युवा क्या करें। अशिक्षा, बेरोजगारी और सरकारी बाबूओ की भेदभाव के कारण भी हिंसा का जन्म होता है। जितना धन स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क के नाम पर निकाला गया है उसका आधे प्रतिशत भी इस्तेमाल होता तो गांवों में खुशयाली आ जाती।

5.जातीय हिंसा – गांवों में समाज के नीचले तबके के लोगों को बद से बदतर जिंदगी गुजारनी पड़ती है। उन्हें हर स्तर पर अपमान सहना पडता है। उन्हें घृणा की दृष्टि से देखा जाता रहा। स्कूल जाने से रोका गया। जो स्कूल गया उसे मारा पीटा गया। इस ओर किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया। परिणाम स्वरूप समाज नीचले पायदान पर जी रहे लोगों ने अपनी रक्षा के लिये हिंसा का सहारा लिया।

6.ऊंची जाती के लोगों की स्थिति बिगड़ी – मंडल-कंमडल के दौर में उठे बंवडर ने देश की राजनीति की दिशा हीं बदल दी। पिछडों का उभार तेजी से हुआ। मंडल आयोग के सिफारिश का जितना विरोध हुआ उतने हीं पिछडे वर्ग के लोग गोलबंद हुए। परिणाम स्वरूप जहां राज्य स्तर की राजनीति में पहले ऊंची जातियों का दबदबा रहता था वह स्थान अब पिछडे और दलित-आदिवासी समाज ने लिया है। सत्ता से जुडे ऊंची जाति के लोग अपने को मंडल-कमंडल की राजनीति में एडजस्ट कर लिया लेकिन आम ग्रामीण ऊंची जाति के लोंगो की स्थिति खराब हो गई। वे लोग जिन कामों के खराब समझते थे वे खूद करने लगे। उन्हें भी अपनी परिवार की इज्जत बचाने के लिये मशक्कत करनी पड़ी। ऐसी स्थिति ने भी हिंसा को जन्म दिया।

7.पुलिस और न्यायलय के खिलाफ आक्रोश – गरीब आदमियों में यह धारणा घर कर चुकी है कि थाने और न्यायलय में उन्हें कभी न्याय नहीं मिलेगा। क्योंकि इन जगहों पर पैसे का बोलबाला होता है। न्याय प्रकिया इतना लंबा और खर्चिला है वहां गरीबों को न्याय नहीं मिल सकता। न्यायधीश भी क्या करेंगे। उनकी संख्या कम है। कुछ पुलिस वाले ऐसे हैं जो सिर्फ लुटना हीं जानते हैं। उनके कारण पुलिस बदनाम हो चुकी है। इस क्षेत्र में भी सुधार की जरूरत है नहीं तो पीपुल्स वार पर काबू नहीं पाया जा सकेगा।

उपरोक्त कारणों से हिंसा बढती गई। सभी लोग तथकथित सिस्टम के सताये हुए लोग थे। ऐसा देश के अधिकांश राज्यों में हो रहा है। नक्सल का उदय पश्चिम बंगाल के नक्सल बाडी में हुआ। और आज आठ राज्यों तक फैल चुका है। जुल्म के खिलाफ सताये हुए लोगों को एक प्लैटफॉर्म मिलने लगा। और जो लोग जुल्म के खिलाफ लड़ने लगे उन्हें नक्सली कहा जाने लगा। धीरे धीरे सताये हुए लोगों की ताकत इतनी बढ चुकी है कि वे तथकथित सिस्टम को चुनौती देने लगे हैं। जिसमें निर्दोष पुलिस वाले भी मारे जा रहे हैं।

अब सवाल है कि इसका समधान क्या है?
मुझे लगता है कि इसका समधान है। इसके लिये निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिये।
1.संघर्ष विराम समझौता - नक्सली नेताओं से बातचीत कर संघर्ष विराम का समझौता होना चाहिये एक समय सीमा के अंदर। यदि वे नहीं मानते हैं तो फिर सरकार को अपनी कार्रवाई शुरू करनी चाहिये। लेकिन इसमें ध्यान रखना होगा कि निर्दोष लोगों के खिलाफ कार्रवाई न हो।
2.विकास युद्व स्तर पर हो – सरकार को एक साथ दो काम करने होंगे। पुलिस कार्रवाई के साथ विकास का काम भी युद्व स्तर पर होना चाहिये। जैसे सड़क, बिजली, पीने का पानी, हॉस्पिटल, स्कूल और रोजगार के व्यवस्था करने होंगे। यदि यह काम एक साल के अंदर नहीं हो पातें हैं। और सिर्फ कमांडो कार्रवाई होती है तो नक्सल आंदोलन यानी पीपुल्स आंदोलन और तेजी से बढेगा। कंमाडो कार्रवाई के दौरान हो सकता है नक्सली गतिविधियां थोडे समय के लिये रूक जाये लेकिन विकास के काम के अभाव में पीपुल्स आंदोलन और तेजी से बढेगा। क्योंकि नक्सल प्लैटफॉर्म के सहारे लड़ रहे लोगों को अपराधी की श्रेणी में नहीं रख सकते।

3. पुलिस - प्रशासन को ईमानदार होना होगा – अन्याय करने वालों के खिलाफ पुलिस को सख्त कार्रवाई करनी होगी व्यवहार में। ऐसा नहीं करने पर आप पीपुल्स वार पर नियंत्रण नहीं कर सकेंगे। आम पुलिस ईमानदार है लेकिन कुछ टॉप के लोग हैं जो अपने काम के प्रति ईमानदार नहीं हैं, उन्हें भी अपने काम के प्रति ईमानदार होना होगा। यदि टॉप पद बैठे पुलिस अधिकारी ईमानदार नहीं होंगे तो नीचे के अधिकारी से उम्मीद करना मुश्किल होगा। पुलिस आम जनता की रक्षा के लिये है।
सरकार क्या सोचती है पीपुल्स आंदोलन से जुडे लोगों के बारे में। यह तो वही जाने लेकिन जिस तेजी से नक्सल प्रभाव बढ रहा है उससे यही लगता है कि गरीब आम ग्रामिण जनता का उन्हें जबरदस्त समर्थन है। इसमें सभी धर्म, जाति, क्षेत्र के लोग शामिल हैं।


इस समय देश का नेतृत्व ईमानदार लोगों के हाथों में हैं। चाहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हों, कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनियां गांधी या विरोधी पार्टियों के नेता वामपंथ के प्रकाश कारत एंव ए. वी. वर्धन और जेडीयू के शरद यादव । ये देश के ईमानदार नेताओं में से हैं। बस जरूरत है कि राज्य सरकारों से तालमेल कर ग्रामिण इलाकों में तेजी से विकास का काम करने की। तभी जाकर नक्सल के हिंसक गतिविधियों पर काबू पाया जा सकता है। नहीं तो नहीं।

राजनेताओं के सिर्फ ईमानदार होने से काम नहीं चलेगा। इच्छा शक्ति भी दिखानी होगी विकास के मामले में। गरीबों के बीच जाकर काम करना होगा। इस मामले में युवा कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अच्छी पहल की है। गरीबों से सीधे संवाद कर उनके मानसिक गुलामी को तोड़ने की कोशिश की। जो सदियों से चली आ रही थी। जेडीयू के शरद यादव इस लडाई को पहले से हीं लडते आ रहे हैं।

जिस प्रकार राजनीति, प्रशासन और न्यायलय के क्षेत्र में कुछ लोगों के भ्रष्ट होने के कारण सरकारी तंत्र तार तार हो रहा है उसी प्रकार पीपुल्स वार को कुछ लोग गलत रूप देने की कोशिश कर रहे हों लेकिन आखिर में देश का विकास हीं अवरूद्व हो रहा है। ऐसे में ईमानदार कोशिश की जरूरत है। विकास का मुहिम ईमानदार ब्यूरोक्रेट्स के बिना संभव नहीं होगा। उन्हें साथ लेने की जरूरत है।


नक्सल से अधिकांश वही लोग जुडे हैं जिनके साथ हमारे सिस्टम ने न्याय नहीं किया। वे लोग नक्सल की राह को जीने की लडाई लडने का मंच मानते हैं। इस संघर्ष को राजनीति के ईमानदार नेतृत्व हीं रोक सकता है।