Tuesday, September 15, 2009

न्याय के लिये पढना और लडना जरूरी है।


राजकिशोर महतो, स्वर्गीय विनोद बिहारी महतो के ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनके पिता विनोद बाबू झारखंड मुक्ति मोर्चा(झामुमो) के संस्थापक अध्यक्ष रहे। राजकिशोर महतो भी अपनी राजनीति की शुरूवात झामुमो से की। लेकिन वर्तमान में वे भाजप में हैं और धनबाद जिले के सिंद्री विधान सभा से विधायक हैं। इनका जन्म 23 सितंबर 1946 को हुआ। शुरू से मेधावी छात्र रहे श्री महतो ने धनबाद जिले स्थित विश्व प्रसिद्ध माइनिंग इंजीनियरिंग कालेज से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। इसके बाद कानून की पढाई कर कानून की डिग्री हासिल की। पटना उच्च न्यायलय के रांची पीठ में 1990-91 के दौरान दो वर्षों तक सरकारी वकील भी रहे। 18 दिंसबर 1991 को अपने पिताजी के निधन के बाद उनके स्थान पर गिरिडीह संसदीय सीट से उपचुनाव जीतकर लोक सभा पहुंचे। इनके पिताजी गिरिडीह से सांसद थे। वे सांसद से बढकर एक क्रांतिकारी थे। उन्होंने झारखंड दब-कुचले में चेतना जगायी – पढो और लड़ो के नारे साथ। बहरहाल भाजपा विधायक राजकिशोर महतो से बातचीत का विवरण -

प्र. आपके पिताजी विनोद बाबू हमेशा कांग्रेस और भाजपा को पूंजीपतियों और उच्च वर्ग की पार्टी मानते रहे। इन पार्टियों से उन्होंने कभी हाथ नहीं मिलाया लेकिन आप भाजपा में शामिल हो गये क्यों ?
उ.
आप सही कह रहे हैं कि मेरे पिताजी विनोद बाबू ने कभी भी कांग्रेस और भाजपा से हाथ नहीं मिलाये। बीजेपी की स्थापना 1980 में हुई। इसलिये बीजेपी का सवाल नहीं उठता है। बीजपी कई नेताओं कैलाशपति मिश्र, सत्येद्र दुदानी से उनके अच्छे संबंध रहे। उनकी लडाई कांग्रेस पार्टी से थी। इमरजेंसी के दौरान उन्हें जेल जाना मंजूर था और जेल भी गये लेकिन कांग्रेस से हाथ नहीं मिलाये। हालांकि कांग्रेस की ओर से भारी दबाव था कि वे कांग्रेस का साथ दें। जहां तक मेरा भाजपा में शामिल होने का सवाल है तो इसके पीछे का मूल मकसद सिर्फ अलग राज्य का गठन हीं था। मैं भाजपा में जरूर हूं लेकिन अपनी नीतियां कभी नहीं बदली। कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने पार्टियां नहीं बदली लेकिन नीतियां बदल दी। राजनीतिक उठापटक और ऊहापोह के दौर में, मैं भाजपा में इसी शर्त पर शामिल हुआ कि अलग झारखंड राज्य का गठन जरूर किया जायेगा। और इस अलग झारखंड राज्य गठन हुआ।

प्र. आपने राजनीति की शुरूवात झामुमो से की। भाजपा में शामिल होने से पहले आप समता पार्टी में थे। आखिर पार्टी बदलते रहने का मूल कारण ?

उ. 9 अगस्त 1992 को झामुमो दो भागों में बंट गया। पहला, झमुमो(सोरेन) और दूसरा झामुमो(मार्डी)। सोरेन खेमे में चार सांसद(शिबू सोरेन, सूरज मंडल, साइमन मरांडी और शैलेन्द्र महतो) और नौ विधायक थे। मार्डी ग्रुप में दो सांसद(कृष्णा मार्डी, राजकिशोर महतो) और नौ विधायक थे। धीरे धीरे झामुमो मार्डि के कुछ नेता झमुमो सोरेन में शामिल हो गये। मैं भी 31 अक्टूबर 1998 को समता पार्टी में शामिल हो गया। इससे मार्डी ग्रुप का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। जहां तक समता पार्टी में शामिल होने सवाल है तो इसका मुख्य कारण था कि समता पार्टी के नेता जार्ज फर्नाडीस अलग राज्य गठन से संबंधित समिति के अध्यक्ष भी थे। नीतीश कुमार भी झारखंड अलग राज्य का जोरदार समर्थन कर रहे थे। अलग झारखंड राज्य के मामले में अन्य दलों का रुख साफ नहीं था। कई दल अलग राज्य का विरोध भी कर रहे थे। और मैं हमेशा हर हाल में और किसी भी कीमत पर अलग झारखंड राज्य के पक्ष में रहा। समता पार्टी में इसलिए शामिल हुआ कि समता पार्टी अलग झारखंड राज्य का समर्थन कर रही थी।

प्र. एक व्यक्तिगत सवाल। कहा जाता है कि आपका अपने पिताजी से कभी नहीं बना ?
उ. नहीं इस तथ्य में कोई सच्चाई नहीं है। किसी बात को लेकर पिताजी थोड़े नाराज हो गये थे वो भी थोड़े समय के लिये। यह सब कुछ हर घर में होता है। पिताजी के क्रांतिकारी आंदोलन में, मैं हमेशा उनका सहयोगी बना रहा। पिताजी अपने परिवार से ज्यादा झारखंडवासियों के हो चुके थे। परिवार के लिए समय निकालना उनके लिए बडा कठिन होता था। आदिवासी, दलित, पिछड़े या अन्य गरीब लोगों के साथ वे काफी घुल मिल जाते थे। उनकी समास्याओं को सुनते और हर संभव हल करने की कोशिश करते थे। लोग रात के बारह बजे भी अपनी समस्या लेकर चले आते थे। पर पिताजी कभी किसी को निराश नहीं किये। उनकी बातें सुनते और सुबह होने पर यथा संभव हल करने की कोशिश करते।

प्र. कहा जाता है कि विनोद बाबू को वर्तमान न्याय प्रणाली पर कभी भरोसा नहीं था ?
. जी हां, आपने सही सुना है। उन्हें उस समय की न्याय प्रक्रिया पर भरोसा नहीं था। अदालत से न्याय पाने में वर्षो लग जाते थे। उन्होंने नजदीक से देखा कि कोर्ट कचहरी गरीबों के लिए नहीं है। इसलिये वे गांवों में पंचायत कर सीधे फैसला करते थे। लोगों को न्याय जल्द मिल जाता था। प्रशासन ने यह कहना शुरू कर दिया था कि विनोद बाबू गांवों में समानांतर सरकार चला रहे हैं। लेकिन उनकी सोच दूर की थी। आज चालीस साल बाद सरकार भी वही करने लगी है। गांवों में लोक अदालत लगाई जाने लगी है। संगीन मामलों की सुनवाई के लिये फास्ट ट्रैक कोर्ट और विशेष अदालतें बनायी जाने लगी हैं।

प्र. क्या यह सही है कि विनोद बाबू हिंसा में विश्वास करते थे ?
उ.
पिताजी सीधे कार्रवाई में विश्वास करते थे। उन्होंने झारखंडवासियों के आत्मा को जगया। सिर उठाकर चलना सिखाया। शोषण के खिलाफ मरने मारने को तैयार किया। सरकारी हिंसा का जबाव उन्होंने हथियारबंद जुलूसों से दिया। गुंडो और महाजनो से सीधे लड़ने के लिये लोगो को प्रोत्साहित किया। क्योंकि उस समय कचहरी और प्रशासन झारखंड झारखंड के शोषितों, दलित-आदिवासी और पिछड़ो के हक में नहीं थी। पिताजी का कहना था कि तिल तिल कर मरने से अच्छा है एक ही बार मरो और मरने से पहले मार कर मरो।

प्र.‘पढो और लड़ो’ यह नारा विनोद बाबू ने दिया था। आखिर इसका वास्तविक तात्पर्य क्या है?
. इस नारे को पिताजी ने दिया था। ‘पढो और लड़ो’ का जो नारा दिया गया उसका अर्थ यही है कि अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए पढना भी जरुरी है ताकि आप समझ सके कि संविधान में नागरिक को क्या क्या अधिकार दिये गये हैं। पढ कर लोग इतनी समझ जरूर बना ले कि आपको कोई ठग न सके। उन्होने सिर्फ नारा हीं नहीं दिया बल्कि लोगों के लिए बुनियादी सुविधा की व्यवस्था भी करवाई। अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा उन्होने स्कूल-कालेज बनवाने में दान दे दिया। उन्होंने स्कूल – कालेज के अलावा जो भी प्राथमिक शिक्षा संस्थान खोले वे दूर दराज गांवो में खोले, पिछड़े इलाके में खोले, जहां शिक्षा के साधन नहीं थे। ये सारे संस्थान व्यवसायिक नहीं था फीस इतनी कम रखी गई थी कि संस्थान को चलाने के लिये उन्हें अपनी जेब से भी पैसे खर्च करने पड़ते थे। गांव गांव में शिक्षा का प्रसार करना उनका मूल मकसद था फिर हक के लए संघर्ष करना।

प्र. विनोद बाबू अपनी राजनीतिक जीवन की शुरूवात वामपंथ से की। आखिर क्या वजह रही झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन का?
उ.
पिताजी का मानना था कि जो राष्ट्रीय पार्टियां हैं। ये पार्टियां समाज में परिवर्तन के खिलाफ है। इन पार्टियों में रह कर कमजोर वर्ग के लिए कुछ नहीं किया जा सकता। वे छात्र जीवन से हीं वामपंथ से प्रभावित थे। कार्ल मार्क्स, लेनिन और माओत्से तुंग की नीतियों एवं कार्यशैली ने उन्हें काफी प्रभावित किया। इनके सिद्धांतो में विनोद बाबू को सामाजिक एवं क्रांति का रास्ता दिखाई दिया। लाल झंडे के बैनर तले वे झारखंड के शोषित जनता को जगाना चाहा। 1972 तक आते आते उन्होंने देखा कि लोग लाल झंडे के साथ अपने को जोड़ नहीं पा रहे हैं। इलाके में लगातार आदिवासी, हरिजन और पिछड़े वर्ग पर अत्याचार हो रहें हैं। कुछ ऐसी घटनाएं घटी कि विनोद बाबू ने एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला किया और झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ।

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