Thursday, August 26, 2010

सबसे बड़े नक्सली नेता हैं राहुल गांधी।

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को नक्सली कहते सुन आपको थोड़ा अटपट्टा जरूर लग रहा होगा लेकिन वास्तव में राहुल गांधी गांधीवादी नक्सली है। जो किसी समस्या के समाधान के लिये हिंसा को सही नहीं मानते लेकिन ससमयाओं के निदान के लिये हर संभव कोशिश करते हैं। उडीसा के कालाहांडी में उन्होंने कहा कि वे वहां के लोगों का सिपाही हैं। वे उनकी आवाज को दिल्ली में उठायेंगें। राहुल गांधी देश के ऐसे पहले उंचे कद के नेता है जो सीधे गरीबो से जुड उनकी समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करते हैं। वे जातिवादी भेदभाव को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। देश के दूर-दराज इलाके में जाकर दलित-आदिवासी सुमदाय को यह एहसास दिलाते हैं कि देश में उनका भी उतना हीं अधिकार जितना दूसरे का। राहुल गरीबो से वादा कर रहे हैं कि वे उनकी सुरक्षा के लिये हर संभव कदम उठायेंगे। वे उनकी समस्याओं को उनके बीच जाकर सुनते हैं। सुलझाने की कोशिश करते हैं। यही काम तो नक्सली कर रहे हैं।

गरीबों के प्रति राहुल गांधी की सच्ची लगन को देखते हुए उनके पार्टी के उच्च वर्ण और सामंतवादी मानसिकता में रंगे नेता भी अपने को गरीबों का सेवक बताते हैं। बताया जाता है कि राहुल गांधी के ईद-गिर्द ऐसे लोग भले हों जो उच्च वर्ण और सामंतवादी मानसिकता वाले हों लेकिन राहुल गांधी इस बात का हमेशा ख्याल रखते हैं कि वे उनके भंवर जाल में नही फसेंगे।

राहुल गांधी अब इस बात को समझने लगे हैं कि विकास के नाम पर जो लुट खसोट हुआ। गरीबों के इलाके में विकास का काम नहीं हुआ। इसी कारण लोग नक्सली बने। कांग्रेस पार्टी के सबसे मजबूत स्तंभ राहुल गांधी का कदम गरीबो के हित में उठते देख गरीबों में एक नया सुर्योदय का अहसास होने लगा है। वही अच्छी बात यह है कि सरकारी स्तर पर भी यह मान लिया गया है कि नक्सली अपने हैं पराये नहीं। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि नक्सली अपने हैं पराये नहीं। नहीं तो पहले उन्हें सिर्फ आंतकवादी कहा जाता था सरकार की ओर से।

प्रधानमंत्री जी और राहुल जी आप दोनों हीं ईमानदार हैं और सामंतवादी प्रवृति के नही हैं। इसलिये आपसे उम्मीद की जा सकती है कि गरीबों के लिये विकास की प्रक्रिया तेजी से शुरू होगी। यदि आप चाहतें हैं कि नक्सल समस्या वास्तव में खत्म हो तो व्यवहार में गरीबों को सामतों और पुलिसिया अत्याचार से बचाना होगा और साथ हीं विकास के काम करने होंगे। यदि ऐसा व्यवहार में नहीं होता है तो फोर्स के बल पर नक्सली मूवमेंट को रोका नहीं जा सकेगा। आप एक मारोगे तो इस चार जुड़ जायेंगे।

4 comments:

Ratan Singh Shekhawat said...

कभी ऐसे ही नाटक लालू करते थे अब राहुल कर रहे है !!

राजेश कुमार said...

रतन जी यह दुनिया हीं एक रंगमंच है। हर लोग नाटक करते हैं। अब नाटक में कोई गरीबों की झोपड़ी को जलाता है तो कोई बचाता है। आप खुद तय कर लिजिये कौन बढिया है।

DEEPAK BABA said...

राहुल गांधी.. लालू प्रसाद विश्वविद्यालय से डाक्टर की उपाधि ले कर निकले हैं...........
दूसरे ......... नया नया मुल्ला ऊँची बांग देता है.......

राजेश कुमार said...

दीपक जी, सच्चाई को स्वीकार करना होगा। यदि रूढिवादी परंपरा को चलाने की कोशिश करते रहेंगे तो नुकसान व्यक्ति के साथ साथ देश का होगा। लालू यादव की लड़ाई का हीं नतीजा है कि सभी पार्टियां अपने को राजनीति में ताकतवर बनाये रखने के लिये पिछड़-दलित-आदिवासी की कल्याण की बाते करने लगे हैं।