सुप्रीम कोर्ट ने रमेश चंद्र त्रिपाठी की अर्जी खारिज कर दी। यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट का लखनऊ बेंच अब अयोध्या मसले पर फैसला सुनाने के लिये आजाद है। 30 सितंबर को साढे तीन बजे लखनऊ बेंच अपना फैसला सुनायेगी। 1 अक्टूबर को लखनऊ बेंच के तीन जजों में से एक जज धर्मवीर शर्मा 1 अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं।
अब माहौल गर्म होता जा रहा है। हिन्दू पक्ष और मुस्लिम पक्ष दोनों हीं इस मामले में कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। यदि फैसला किसी एक के पक्ष में जाता है तो दूसरा पक्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। इसलिये देश में धार्मिक उन्माद करने से दोनो ही पक्षों को बचना चाहिये।
ऐसे भी देश में बड़ी बड़ी समस्याएं मौजूद है। भारत को एक साथ दोहरी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अंदरूनी हालात मंहगाई से त्रस्त है। लोगों के पास रोजगार नहीं है। बेमौसम के कारण किसानों की हालात अच्छी नहीं है। फसलें बर्बाद हो रहे हैं। इतना हीं नहीं सीमा पर देश को एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में तबाही मचा रहा है। चीन पाकिस्तान से मिलकर भारत को हर ओर से घेर रहा है। चीन नॉर्थ से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक इलाके में नदियों में बांध बनाकर भारत को पानी से वंचित करने में लगा है। आने वाले दिनों में भारत को पानी के संकट का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में मंदिर-मस्जिद को लेकर धार्मिक उन्माद से बचना चाहिये।
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Tuesday, September 28, 2010
Monday, April 26, 2010
आईपीएल काले धन का प्रतीक है तो नक्सल गरीबी का
इस समय देश मे आईपीएल और नक्सल दोनो हीं काफी चर्चित है। आयकर छापे के बाद जो बाते सामने आ रही है उससे यही लगता है कि आईपीएल काले धन का प्रतीक है और नक्सल समाज के कमजोर वर्गों का प्रतीक है। गरीब लोगो के लिये सरकारे जो बजट बनाती है उसका बहुत बड़ा हिस्सा नेता और मंत्री व्यापारियों और ठेकेदारों से मिलकर खा जातें है या गबन कर लेते है। इसलिये गांवों में बुनियादी सुविधाओ का अभाव है।
आजादी से लेकर अबतक केद्र सरकार और राज्य सरकारों ने जितना बजट पास किया है। यदि ईमानदारी से उसका आधा हिस्सा भी उपयोग में लाया जाता तो देश में खुशहाली आ जाती और आज नक्सल का भी नामोनिशान नहीं रहता। लेकिन जो धन गरीबो के लिये थे उसका एक हिस्सा आईपीएल में देखने को मिल रहा है। यह सिलसिला थमना चाहिये। यदि नहीं थमता है तो आप सिर्फ गोली बारूद के बल पर नक्सल को बढने से रोक नहीं पायेंगे। और यदि यह बढता है तो इसके लिये सरकारें ही दोषी होगी। नक्सल सिर्फ कानून व्यवस्था का सवाल नही है। इसमें उन परिवार के लोग बड़ी संख्या में शामिल हैं जिनके पूर्वज आजादी से पहले अंग्रेजों से लड़ाईयां लड़ी और उनके वंशज आजादी के बाद अंग्रेज रूपी शासक अपनों से।
सरकार के व्यवाहर में अंतर देखिये। आईपीएल से जुडे मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो पायी है। क्योंकि वे सभी बड़े स्वामी हैं। वहीं कानून व्यवस्था के नाम पर जंगलों में गरीबों पर गोलियां बरसायी जा रही है। गरीबों पर गोलियां बरसाना कोई नई बात नहीं है। यही कारण है कि नक्सल तेजी से फैल रहा है। आईपीएल के खेल में अमीर आदमी और अमीर होता जा रहा है वही नक्सल के नाम पर सिर्फ गरीब आदमी हीं मर रहा है। चाहे वह पुलिस वालों की मौत हो या नक्सल से जुडे लोगो की। मर तो रहे हैं गरीब आदमी हीं। पुलिस वाले अपने अधिकारी के आदेश पर गोली चला रहे हैं और नक्सली सेल्फ डिफेंस के नाम पर गोलियां चला रहे हैं।
सरकारों के इस फासले को कम करना होगा यानी नक्सल से जुड़े लोगों की वास्तविक समस्याओ को हल करना होगा। उनके लिये विकास के काम तेजी से करने होंगे। आश्वासन से काम नहीं चलेगा। और वहीं काले धन के स्वामियों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। सरकार से एक आग्रह और भी है कि वह सिपाहियों के लिये सुरक्षा का इंतजाम करें। उनके लिये जीवन बींमा का इंतजाम करें। क्योंकि जीवन बीमा वाले हाई रिस्क जॉब के नाम पर उनका बीमा करने से बचते हैं। लड़ाई में यदि किसी सिपाही की मौत होती है तो ये जीवन बीमा उनके परिवार के लिये बड़ा सहारा होगा।
बहरहाल, अभी तक के हालात को देख यही लगता है कि सिर्फ सरकार के कहने पर नक्सली सरेंडर नही करेंगे। उन्हें यह लगता है कि सरकार छल भी कर सकती है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार को अगले तीन-चार सालों तक यह दिखाना होगा कि उन्होंने गरीब इलाकों के लिये बजट पास की है और खर्च भी किये जा रहे हैं। यदि भरोसा नहीं जीत पाये तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है।
आजादी से लेकर अबतक केद्र सरकार और राज्य सरकारों ने जितना बजट पास किया है। यदि ईमानदारी से उसका आधा हिस्सा भी उपयोग में लाया जाता तो देश में खुशहाली आ जाती और आज नक्सल का भी नामोनिशान नहीं रहता। लेकिन जो धन गरीबो के लिये थे उसका एक हिस्सा आईपीएल में देखने को मिल रहा है। यह सिलसिला थमना चाहिये। यदि नहीं थमता है तो आप सिर्फ गोली बारूद के बल पर नक्सल को बढने से रोक नहीं पायेंगे। और यदि यह बढता है तो इसके लिये सरकारें ही दोषी होगी। नक्सल सिर्फ कानून व्यवस्था का सवाल नही है। इसमें उन परिवार के लोग बड़ी संख्या में शामिल हैं जिनके पूर्वज आजादी से पहले अंग्रेजों से लड़ाईयां लड़ी और उनके वंशज आजादी के बाद अंग्रेज रूपी शासक अपनों से।
सरकार के व्यवाहर में अंतर देखिये। आईपीएल से जुडे मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो पायी है। क्योंकि वे सभी बड़े स्वामी हैं। वहीं कानून व्यवस्था के नाम पर जंगलों में गरीबों पर गोलियां बरसायी जा रही है। गरीबों पर गोलियां बरसाना कोई नई बात नहीं है। यही कारण है कि नक्सल तेजी से फैल रहा है। आईपीएल के खेल में अमीर आदमी और अमीर होता जा रहा है वही नक्सल के नाम पर सिर्फ गरीब आदमी हीं मर रहा है। चाहे वह पुलिस वालों की मौत हो या नक्सल से जुडे लोगो की। मर तो रहे हैं गरीब आदमी हीं। पुलिस वाले अपने अधिकारी के आदेश पर गोली चला रहे हैं और नक्सली सेल्फ डिफेंस के नाम पर गोलियां चला रहे हैं।
सरकारों के इस फासले को कम करना होगा यानी नक्सल से जुड़े लोगों की वास्तविक समस्याओ को हल करना होगा। उनके लिये विकास के काम तेजी से करने होंगे। आश्वासन से काम नहीं चलेगा। और वहीं काले धन के स्वामियों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। सरकार से एक आग्रह और भी है कि वह सिपाहियों के लिये सुरक्षा का इंतजाम करें। उनके लिये जीवन बींमा का इंतजाम करें। क्योंकि जीवन बीमा वाले हाई रिस्क जॉब के नाम पर उनका बीमा करने से बचते हैं। लड़ाई में यदि किसी सिपाही की मौत होती है तो ये जीवन बीमा उनके परिवार के लिये बड़ा सहारा होगा।
बहरहाल, अभी तक के हालात को देख यही लगता है कि सिर्फ सरकार के कहने पर नक्सली सरेंडर नही करेंगे। उन्हें यह लगता है कि सरकार छल भी कर सकती है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार को अगले तीन-चार सालों तक यह दिखाना होगा कि उन्होंने गरीब इलाकों के लिये बजट पास की है और खर्च भी किये जा रहे हैं। यदि भरोसा नहीं जीत पाये तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है।
Sunday, April 25, 2010
सबसे अधिक कमीना जानवर है इंसान
दुनिया भर
के लोग गर्मी से परेशान है। कई इलाकों में तापमान 43 डिग्री से नीचे उतरने का नाम हीं नहीं ले रहा है। कई ऐसे इलाके हैं जहां तापमान 46 डिग्री को भी पार कर चुका है। तालाब और नदियों का एक बड़ा हिस्सा प्रदूषित हो चुका हैं। आगे लिखने से पहले कालीदास जी से जुड़े एक प्रचलित वाक्य को याद दिलाउं। हम इंसान कालीदास जी का यह कह कर मजाक उड़ाते हैं कि वे इतना मूर्ख थे कि वे पेड़ के जिस डाल पर बैठे थे उसी डाल को काट रहे थे। अब मुझे लगता है कि उनका अपने प्रति इस तरह का किया गया व्यवहार पूरे तथाकथित मानव समाज के लिये उदाहरण था।
हम सभी जानते हैं कि जल और पेड-पौधों के बिना इंसान का कोई भविष्य नहीं है। और हम
उन्हीं जल को प्रदूषित कर रहे हैं और उन्हीं पेड़ो को काट रहे हैं। कल-कारखानों के कारण किस तरह जल प्रदूषित हो रहा है हम सभी जानते हैं। जंगलों से पेड़ो की कटाई कैसे हो रही है हम आपको बताते हैं –
1. पेड़ो के आस पास के मिट्टी को काटकर इतना कमजोर कर दिया जाता है कि कुछ समय बाद बडे से बड़े पेड भी गिर जाते हैं।
2. चोरी चुपके पेड़ों के जड़ में कुछ दिनों तक लगातार एसिड डाला जाता है। परिणाम स्वरूप कुछ समय बाद पेड सुख जाते हैं। और उसे काटकर गिरा दिया जाता है।
3. सरकार द्वारा वृक्षारोपण के लिये यदि दो लाख पौधे लगाये जाने की बात की जाती है तो लगते हैं सिर्फ 20-25 फीसदी हिस्सा। बाकी हिस्से के पैसे अपने खजाने में। यही हाल एनजीओ का भी है।
यह सब तो उदाहरण मात्र है। आप सोचिये जिस पेड पौधे पर इंसान की जिंदगी निर्भर है हम उसी को
नष्ट कर रहे हैं। कालीदास जी ने तो अपनी गलती को समझते हुए इतना सुधार किया और इतनी शिक्षा प्राप्त की कि उनकी गिनती दुनिया के विद्वानों में होने लगी है लेकिन हम और आप सब कुछ जानते हुए हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जो पेडों को भेल हीं नहीं कारट रहे हों लेकिन इस तरह के हरकतों पर मौन रह कर भी एक छोटा सा अपराध तो जरूर कर रहें हैं।
के लोग गर्मी से परेशान है। कई इलाकों में तापमान 43 डिग्री से नीचे उतरने का नाम हीं नहीं ले रहा है। कई ऐसे इलाके हैं जहां तापमान 46 डिग्री को भी पार कर चुका है। तालाब और नदियों का एक बड़ा हिस्सा प्रदूषित हो चुका हैं। आगे लिखने से पहले कालीदास जी से जुड़े एक प्रचलित वाक्य को याद दिलाउं। हम इंसान कालीदास जी का यह कह कर मजाक उड़ाते हैं कि वे इतना मूर्ख थे कि वे पेड़ के जिस डाल पर बैठे थे उसी डाल को काट रहे थे। अब मुझे लगता है कि उनका अपने प्रति इस तरह का किया गया व्यवहार पूरे तथाकथित मानव समाज के लिये उदाहरण था।हम सभी जानते हैं कि जल और पेड-पौधों के बिना इंसान का कोई भविष्य नहीं है। और हम
उन्हीं जल को प्रदूषित कर रहे हैं और उन्हीं पेड़ो को काट रहे हैं। कल-कारखानों के कारण किस तरह जल प्रदूषित हो रहा है हम सभी जानते हैं। जंगलों से पेड़ो की कटाई कैसे हो रही है हम आपको बताते हैं –1. पेड़ो के आस पास के मिट्टी को काटकर इतना कमजोर कर दिया जाता है कि कुछ समय बाद बडे से बड़े पेड भी गिर जाते हैं।
2. चोरी चुपके पेड़ों के जड़ में कुछ दिनों तक लगातार एसिड डाला जाता है। परिणाम स्वरूप कुछ समय बाद पेड सुख जाते हैं। और उसे काटकर गिरा दिया जाता है।
3. सरकार द्वारा वृक्षारोपण के लिये यदि दो लाख पौधे लगाये जाने की बात की जाती है तो लगते हैं सिर्फ 20-25 फीसदी हिस्सा। बाकी हिस्से के पैसे अपने खजाने में। यही हाल एनजीओ का भी है।
यह सब तो उदाहरण मात्र है। आप सोचिये जिस पेड पौधे पर इंसान की जिंदगी निर्भर है हम उसी को
नष्ट कर रहे हैं। कालीदास जी ने तो अपनी गलती को समझते हुए इतना सुधार किया और इतनी शिक्षा प्राप्त की कि उनकी गिनती दुनिया के विद्वानों में होने लगी है लेकिन हम और आप सब कुछ जानते हुए हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जो पेडों को भेल हीं नहीं कारट रहे हों लेकिन इस तरह के हरकतों पर मौन रह कर भी एक छोटा सा अपराध तो जरूर कर रहें हैं।
Monday, January 4, 2010
अन्नाज बर्बाद न करे, संभव हो तो मदद के लिये खुद आगे बढे। एक नजर चित्रों पर
हम कितना भी नेस्डेक और बीएसई की बात कर ले लेकिन सच्चाई यह है कि दुनिया एक बड़ी आबादी आज भी एक समय की रोटी के लिये तरसती है। बहुत से ऐसे देश हैं जहां अन्नाज को समुद्र में फिकवा दिया जाता है। क्योंकि उनके गोदामों में अन्नाज रखे रखे सड़ गया। हम आपलोगों से अनुरोध करते हैं कि अन्नाज को बर्बाद न करें। उतना हीं भोजन लें जितना आप उपयोग कर सकते हैं। संभव हो तो आप अपने पान-सिगरेट-दारू या अन्य मनोरंजन के क्षेत्र में जो खर्च करते हैं उसमें कमी कर किसी ऐसे गरीब की मदद कर दे जो वास्तव में भूखा है। एक व्यक्ति यदि सप्ताह में एक गरीब को एक समय का भोजन करा दे तो दुनियां की एक बड़ी आबादी को राहत मिलेगी। आप खुद देख लें कि क्या हालत हो गई है इंसान है की -


Wednesday, December 30, 2009
सुरक्षा बल के जवानों से माओवादियों की अपील
नक्सल प्रभावित
राज्यों में सुरक्षा बलों के जवान और नक्सल कैडेट्स के बीच संघर्ष जारी है। इसमें दोनो ही तरफ के लोग मारे जा रहे हैं। इससे देश की शांति और विकास की प्रक्रिया बाधित हो रही है। सरकार नक्सल को एक समस्या मान कर इससे से जुड़े लोगों की सफाया करना चाहती है। वहीं नक्सल से जुडे लोगों का कहना है कि गरीबो के प्रति सरकार और जमीदारों की नकारात्मक रवैये के कारण हीं हथियार उठाना पड़ा। इस बीच महाराष्ट्र ईकाई के माओवादी संगठन ने मीडिया के लिये जो पर्चे जारी किये वह निम्नलिखित प्रकार से है -
राज्यों में सुरक्षा बलों के जवान और नक्सल कैडेट्स के बीच संघर्ष जारी है। इसमें दोनो ही तरफ के लोग मारे जा रहे हैं। इससे देश की शांति और विकास की प्रक्रिया बाधित हो रही है। सरकार नक्सल को एक समस्या मान कर इससे से जुड़े लोगों की सफाया करना चाहती है। वहीं नक्सल से जुडे लोगों का कहना है कि गरीबो के प्रति सरकार और जमीदारों की नकारात्मक रवैये के कारण हीं हथियार उठाना पड़ा। इस बीच महाराष्ट्र ईकाई के माओवादी संगठन ने मीडिया के लिये जो पर्चे जारी किये वह निम्नलिखित प्रकार से है - “ तुम हमारे हो, हमारे बीच के हो ... हालांकि यह जो पुलिस की वर्दी तुमने पहन रखी है इसका सीधा रिश्ता तुम्हारी रोजी-रोटी से है मगर भाई मेरे, ऐसे जीने का भला क्या मतलब ? ”
जवानों और अधिकारियों,
छत्तीसगढ के अविभाजित बस्तर, राजनांदगांव और महाराष्ट्र के गढचिरोली क्षेत्र जिसे दण्डकारण्य के नाम से पुकारा जाता है, में तैनात आप लोगों को अब एक युद्व लड़ने के लिये प्रेरित किया जा रहा है। आपके हाथों में अत्याधुनिक हथियार हैं और ढेर सारा गोलाबारूद। आपको इस मिशन पर भेजते समय आपके अधिकारियों और जंगल वारफेर स्कूल के प्रशिक्षकों ने हमारे (यानी माओवादियों के ) बारे में बहुत सी झूठी बातें बतायी होंगी। जाने अनजाने में आप यहां यह समझकर आये होंगे कि आप यहां युद्व लड़कर देश की सेवा करेंगे या रक्षा करेंगे। यहां आने पर आप एक सच्चाई को जरूर जाना समझा होगा। वो यह है कि आपके थानों-कैंपों के इर्द-गिर्द मौजूद बस्तियों में जीने वाले आदिवासी जो बेहद गरीबी में, बुनियादी सुविधाओं के अभाव में तथा सरकारों द्वारा दशकों से जारी लापरवाही का शिकार बनकर जिंदगी के साथ जद्दोजहद करते हैं। उन्हीं लोगों के खिलाफ आप लोगों को लड़ाई लड़ना है। उन्हीं लोगों के सीने पर ताननी है अपनी रायफलें। क्योंकि सोनिया, मनमोहन सिंह, चिदंबरम, रमण सिंह, ननकीराम, अशोक चव्हान, महेंद्र कर्मा आदि नेताओं ने निर्णायक युद्व या आरपार की लड़ाई का जो हुंकार मार रहे हैं वो यहां के भोले भाले गरीब और मेहनतकश आदिवासी जन समुदाय के खिलाफ हीं है। आखिर यहां के जनता पर इतना गुस्सा क्यों?
भोली-भाली व शांति चाहने वाली यहां की आदिवासी जनता का इतिहास देश के अन्य इलाकों के आदिवासी की तरह ही रहा है। इन्होंने 19 वीं सदी की शुरूआत से लेकर आज तक शोषण, लूट, उत्पीड़न, अन्याय और परायों के शासन के खिलाफ बगावत का परचम हमेशा ऊंचा उठाए रखा है। 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ इनलोगों ने जबरदस्त विरोध किया था जो इतिहास के पन्नों में महान भूमकाल के नाम से अंकित है। आने वाले 2010 में इस विद्रोह की 100 वीं सालगिरह मनानी है। और अब एक ऐसा संयोग बना है कि यह सौवां साल यहां के समूचे आदिवासियों को एक बार फिर प्रतिरोध का झंडा बुंलद करने पर मजबूर कर रहा है।
बहरहाल यहां के आदिवासियों ने कई बिद्रोह किये। काफी खून बहाया, शहादतें दी। पर आजादी और मुक्ति की उनकी चाहतें पूरी नहीं हुई। पहले गोरें लुटेरों और 1947 के बाद से उनका स्थान लेने वाले काले लुटेरों ने इनके हिस्से में अभाव, अन्याय, अपमान और अत्याचार हीं दिये हैं। अपने हीं मां समान जंगल में वन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें चोर बना दिया। जंगल माफिया, मुनाफाखोर व्यापारी, ठेकेदार, पुलिस, फॉरेस्ट अफसर ....सभी ने उनका शोषण किया। उनकी मां-बहनों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया। हालांकि इनके खिलाफ उनके दिलो दिमाग में गु्स्सा उबल रहा था, लेकिन उसे सही दिशा देने की राजनैतिक ताकत उनके पास नहीं थी। ऐसी स्थिति में 1980 के दशक में उन्हें एक नई राह मिल गई। मुक्ति की एक वैज्ञानिक सोच लेकर और जनयुद्व का संदेश लेकर यहां पर हमारी माओवादी पार्टी ने कदम रखा। यहां की दमित-शोषित-उत्पीड़ित आदिवासी जनता में काम करना शुरू किया।
सिर्फ यहां की आदिवासियों की नहीं बल्कि देश के तमाम इलाकों के लोगों की या यूं कहें कि देश की 90 प्रतिशत मेहनतकश लोगों की कमोबेश यही बदहाली है। देश के मजदुरों, किसानों, छोटे छोटे मंझोले व्यापारियों तथा आदिवासी, दलित, महिलाएं और अन्य पिछड़े समुदायों पर शोषण उत्पीड़न का एक व्यापक दुष्चक्र जारी है। इस स्थिति के लिये जिम्मेदार वे लोग हैं जो आबादी के महज 10 फिसदी का प्रतिनिधि होने के बावजूद देश की समूची सम्पदाओं में 90 प्रतिशत पर हिस्सेदारी रखते हैं। इन गिद्वों को हमारी पार्टी तीन वर्गों – सामंती वर्ग, दलाल पूंजीपति वर्ग और साम्राज्यवादियों में बांटती है जिनकी सांठगांठ से निर्मित व्यवस्था हीं देश की सारी समस्याओं की जड़ है।
आज की तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था दरअसल इस दुष्ट तिकड़ी की मुठ्ठी में ही है। यही लोग चुनाव लड़ते हैं, यही लोग जीतते हैं, पार्टी का नाम और झंडा का रंग जो भी हो। संसद भी इन्हीं लोगों का है। थान, कचहरी, जेल सभी पर नियंत्रण इन्ही का है। देश की श्रमशक्ति, संपदाओं और संसाधनों को यही लोग लुटते हैं। इसके खिलाफ लड़ने पर पुलिस और फौजी बलों को उतारकर जनता पर अकथनीय जु्ल्म ढाते हैं। और उल्टा उन्हीं लोगो पर आंतकवादी या उग्रवादी का ठपा लगा देते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, अकाल, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, किसानों की आत्महत्या, पलायन आदि सभी समा्स्यायें इन्ही तीन वर्गों की निर्मम लूट खसोट के कारण है। मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण के आधार पर खड़ी इनकी व्यवस्था को ध्वस्त करना निहायत जरूरी है ताकि शोषणविहीन, भेदभावरहित तथा रह प्राकर के उत्पीडन से मुक्त खुशहाल समाज का निर्माण किया जा सके। जनता के पास कोई दूसरा और नजदीकी रास्ता नहीं बचा है। हमारी पार्टी की इसी राजनीतिक सोच के साथ दण्डकारण्य के आदिवासी सचेत हुए हैं और फिर संघर्ष का शंखानाद बज गया। सरकारी गुस्से का कारण यही है।
आपलोग क्या इन बदहाल आदिवासियों से अलग हैं? नहीं, हमारी पार्टी ऐसा नहीं मानती। आप लोग जवान और छोटे स्तर के अधिकारी ( आपके बलों का नाम जिला पुलिस, सीएएएफ, सीपीओ, एसपीओ, एसटीएफ, सीआरपीएफ, बीएसएफ, ग्रे-हाउण्डस, कोबरा, आईटीबीपी, एसएसबी....जो भी हों) ऐसे ही शोषित व मेहनतकश माता-पिता की संताने हैं। रोजी रोटी की तलाश में आपने इस रास्ते को चुना है। वरना इन लोगों के खिलाफ आपके मन में गुस्से का कोई आधार हीं नहीं है। यहां की आदिवासी जनता और उनका नेतृत्व कर रही हमारी पार्टी को आंतकवादी या उग्रवादी कहकर चिदंबरम गिरोह और आपके उच्च अधिकारी आपके मन में हमारे खिलाफ कृत्रिम तरीके से गुस्सा भरने की कोशिश करते हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादियों का वफादार सेवक मनमोहन सिंह जो हमारी पार्टी को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा कहते नहीं थकता, इस बात को छुपा देता है कि दरअसल हमारी पार्टी से देश के मुठ्ठी भर लुटेरों को खतरा है। चूंकि रेडियो, अखबार, और टीवी पर उन्हीं लुटेरों का कब्जा है। इसलिये एक झूठ को सौ बार दोहराकर सच बनाने की उनकी चालें कुछ हद तक चल भी पा रही है।
आज हम (यानी यहां का आदिवासी अवाम और उनके जायज संघर्ष की अगुवाई करने वाली हमारी पार्टी) और आप लोग आमने सामने हैं। आप अपने अधिकारियों के उकसावे और आदेश पर आदिवासियों के गांवों को जला रहे हैं। लूट रहे हैं। या फिर सलवा जुडूमियों के द्वार लुटवा रहे हैं। मारपीट कर रहे हैं। आदिवासी महिलओं के साथ बलात्कार कर रहे हैं। निहत्थे लोंगों पर गोलियां बरसा रहे हैं। झूठी मुठभेड़ कर रहे हैं। और नरसंहारों को अंजाम दे रहे हैं। यह सब उस संविधान के खिलाफ जाकर कर रहे हैं जिसका पालन करने की आप शपथ लेकर इस नौकरी में आये थे। विडम्बना यह है कि जिन लोगों के खिलाफ आप यह सब कुछ कर रहे हैं वो भी आप जैसे गरीब और मेहनतकश लोग हीं हैं। जनता की रक्षा की खातिर हमारी जन सेना- पीएलजीए – आपके खिलाफ जवाबी हमले कर रही है जिसमें दर्जनों की संख्या में आप लोग हताहत हो रहे हैं।
लेकिन यही सबकुछ नहीं है। आपमें से कई लोंगों ने कम मौके पर हीं सही निर्दोष आदिवासियों पर गोली चलाने से इनकार किया। अत्याचारों का विरोध किया। यहां तक कि अपने अधिकारियों के खिलाफ कुछ मौंको पर विद्रोह भी किया। छतीसगढ पुलिस के कई जवानों और अधिकारियों ने हमारे संघर्षके इलाके में ड्यूटी करने से मना कर दिया। क्योंकि उन्हें मालूम है यहां ड्यूटी करने का मतलब अपने हीं भाई बहनों के खिलाफ खड़ा होना और अपनों पर हीं गोलियां बरसाना। हमारे इलाके में नहीं जाने के कारण कई कर्मचारियों को निलंबन किया गया फिर भी वे अपने फैसले पर कायम पर रहे। यहां तक कि कुछ जवानों ने हथियार लाकर भी भी हमें दिया। हम उन सभी लोगों का सरहाना करते हैं जिन्होंने किसी न किसी वजह से आदिवासियों के सीने पर बंदूक उठाने से मना कर दिया। हमारे इलाके में पदस्थ जवान कई परेशानियों और प्रताडनाओं के दौर से गुजर रहे हैं। खास कर उच्च अधिकारियों के बूरे बर्ताव से आहत पुलिस और अर्द्वसैनिक बलों के जवानों ने खुदकुशी कर ली। कुछ लोगों ने दरिंदे अफसरों को गोली मारकर खुद को भी गोली मारी।
हम तमाम जवानों से अपील करते हैं कि आप इस इस तरह निरर्थक मौत को गले न लगायें। आपमें ताकत है और सोच विचार कर फैसला लेने का विवेक भी। अपनी वर्गिय जड़ों को पहाचानिये ... आपको उकसाने और जनता पर कहर ढाने का आदेश देने वालों की वर्गीय जड़ो को पहचानिये। चिदम्बरम, रमनसिंह, महेंद्र कर्मा जैसों के असली चेहरे को पहचानिये। दोनो बिल्कुल अलग अलग हैं। एक दूसरे के विपरित। इसलिये आइए ... दोनो हाथ फैला कर हम आपका स्वागत कर रहे हैं। आप अपनी बंदूकें लुटेरों, घोटालेबाजों, रिश्वतखोरों, जमाखोरों, देश की संपदाओं को बेचने वाले दलालों, देश की अस्मिता के साथ सौदा करने वाले देशद्रोहियों के सीने पर तानिये। जिस मेहनत वर्ग में से आपने जन्म लिया है उस वर्ग की मुक्ति के लिये जारी महासंग्राम के सैनिक बनिये। घुसखोरी, गालीगलौज, दलाली, जातिगत भेदभाव, धार्मिक साम्प्रदायिकता आदि सामंती मान्यताओं के ढांचे पर निर्मित पुलिस और अर्द्वसैनिक बलों से वापस आइये।
दोस्तों अगर आप अपने मजबूरियों के कारण नौकरी नहीं छोड सकते तो कम से कम हमारे इलाके में काम करने से मना कर दीजिये। हमलों में शामिल होने से इंकार करिये। अपने अफसरों के हुक्म का पालन मत करिये। जनता के खिलाफ लाठी-गोलियां का प्रयोग करन से दूर रहिये। हमारे साथ सशस्त्र झड़पों के सूरत में हथियार डाल दीजिये और अपनी जान बचा लीजिये। हमारी जनता के जीवन को और संघर्ष को जानने-बूझने की कोशिश कीजिये। यह भी समझने की कोशिश कीजिये कि इतनी व्यापक सरकारी बर्बरता, आतंक और नरसंहारों के बावजूद भी यहां की जनता हमारी पार्टी के साथ क्यों खड़ी है। अपने अधिकारियों और सरकार के झूठे प्रचार के प्रभाव से खुद को बाहर लाइये। सच्चाई को समझने की कोशिश कीजिये। और सच के साथ लड़े हो जाइये।
“ मत भूलों की जिन लोगों ने तुम्हारे हाथों में बंदूके थमाई हैं
वो गद्दार हैं – मुल्क के दुश्मन हैं
मत भूलो, कि तुम हमारे हो, हमारे बीचे के हो...”
क्रांतिकारी अभिनन्दन के साथ,
भाकपा(माओवादी) दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी, महाराष्ट्र राज्य कमेटी। "
जवानों और अधिकारियों,
छत्तीसगढ के अविभाजित बस्तर, राजनांदगांव और महाराष्ट्र के गढचिरोली क्षेत्र जिसे दण्डकारण्य के नाम से पुकारा जाता है, में तैनात आप लोगों को अब एक युद्व लड़ने के लिये प्रेरित किया जा रहा है। आपके हाथों में अत्याधुनिक हथियार हैं और ढेर सारा गोलाबारूद। आपको इस मिशन पर भेजते समय आपके अधिकारियों और जंगल वारफेर स्कूल के प्रशिक्षकों ने हमारे (यानी माओवादियों के ) बारे में बहुत सी झूठी बातें बतायी होंगी। जाने अनजाने में आप यहां यह समझकर आये होंगे कि आप यहां युद्व लड़कर देश की सेवा करेंगे या रक्षा करेंगे। यहां आने पर आप एक सच्चाई को जरूर जाना समझा होगा। वो यह है कि आपके थानों-कैंपों के इर्द-गिर्द मौजूद बस्तियों में जीने वाले आदिवासी जो बेहद गरीबी में, बुनियादी सुविधाओं के अभाव में तथा सरकारों द्वारा दशकों से जारी लापरवाही का शिकार बनकर जिंदगी के साथ जद्दोजहद करते हैं। उन्हीं लोगों के खिलाफ आप लोगों को लड़ाई लड़ना है। उन्हीं लोगों के सीने पर ताननी है अपनी रायफलें। क्योंकि सोनिया, मनमोहन सिंह, चिदंबरम, रमण सिंह, ननकीराम, अशोक चव्हान, महेंद्र कर्मा आदि नेताओं ने निर्णायक युद्व या आरपार की लड़ाई का जो हुंकार मार रहे हैं वो यहां के भोले भाले गरीब और मेहनतकश आदिवासी जन समुदाय के खिलाफ हीं है। आखिर यहां के जनता पर इतना गुस्सा क्यों?
भोली-भाली व शांति चाहने वाली यहां की आदिवासी जनता का इतिहास देश के अन्य इलाकों के आदिवासी की तरह ही रहा है। इन्होंने 19 वीं सदी की शुरूआत से लेकर आज तक शोषण, लूट, उत्पीड़न, अन्याय और परायों के शासन के खिलाफ बगावत का परचम हमेशा ऊंचा उठाए रखा है। 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ इनलोगों ने जबरदस्त विरोध किया था जो इतिहास के पन्नों में महान भूमकाल के नाम से अंकित है। आने वाले 2010 में इस विद्रोह की 100 वीं सालगिरह मनानी है। और अब एक ऐसा संयोग बना है कि यह सौवां साल यहां के समूचे आदिवासियों को एक बार फिर प्रतिरोध का झंडा बुंलद करने पर मजबूर कर रहा है।
बहरहाल यहां के आदिवासियों ने कई बिद्रोह किये। काफी खून बहाया, शहादतें दी। पर आजादी और मुक्ति की उनकी चाहतें पूरी नहीं हुई। पहले गोरें लुटेरों और 1947 के बाद से उनका स्थान लेने वाले काले लुटेरों ने इनके हिस्से में अभाव, अन्याय, अपमान और अत्याचार हीं दिये हैं। अपने हीं मां समान जंगल में वन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें चोर बना दिया। जंगल माफिया, मुनाफाखोर व्यापारी, ठेकेदार, पुलिस, फॉरेस्ट अफसर ....सभी ने उनका शोषण किया। उनकी मां-बहनों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया। हालांकि इनके खिलाफ उनके दिलो दिमाग में गु्स्सा उबल रहा था, लेकिन उसे सही दिशा देने की राजनैतिक ताकत उनके पास नहीं थी। ऐसी स्थिति में 1980 के दशक में उन्हें एक नई राह मिल गई। मुक्ति की एक वैज्ञानिक सोच लेकर और जनयुद्व का संदेश लेकर यहां पर हमारी माओवादी पार्टी ने कदम रखा। यहां की दमित-शोषित-उत्पीड़ित आदिवासी जनता में काम करना शुरू किया।
सिर्फ यहां की आदिवासियों की नहीं बल्कि देश के तमाम इलाकों के लोगों की या यूं कहें कि देश की 90 प्रतिशत मेहनतकश लोगों की कमोबेश यही बदहाली है। देश के मजदुरों, किसानों, छोटे छोटे मंझोले व्यापारियों तथा आदिवासी, दलित, महिलाएं और अन्य पिछड़े समुदायों पर शोषण उत्पीड़न का एक व्यापक दुष्चक्र जारी है। इस स्थिति के लिये जिम्मेदार वे लोग हैं जो आबादी के महज 10 फिसदी का प्रतिनिधि होने के बावजूद देश की समूची सम्पदाओं में 90 प्रतिशत पर हिस्सेदारी रखते हैं। इन गिद्वों को हमारी पार्टी तीन वर्गों – सामंती वर्ग, दलाल पूंजीपति वर्ग और साम्राज्यवादियों में बांटती है जिनकी सांठगांठ से निर्मित व्यवस्था हीं देश की सारी समस्याओं की जड़ है।
आज की तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था दरअसल इस दुष्ट तिकड़ी की मुठ्ठी में ही है। यही लोग चुनाव लड़ते हैं, यही लोग जीतते हैं, पार्टी का नाम और झंडा का रंग जो भी हो। संसद भी इन्हीं लोगों का है। थान, कचहरी, जेल सभी पर नियंत्रण इन्ही का है। देश की श्रमशक्ति, संपदाओं और संसाधनों को यही लोग लुटते हैं। इसके खिलाफ लड़ने पर पुलिस और फौजी बलों को उतारकर जनता पर अकथनीय जु्ल्म ढाते हैं। और उल्टा उन्हीं लोगो पर आंतकवादी या उग्रवादी का ठपा लगा देते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, अकाल, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, किसानों की आत्महत्या, पलायन आदि सभी समा्स्यायें इन्ही तीन वर्गों की निर्मम लूट खसोट के कारण है। मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण के आधार पर खड़ी इनकी व्यवस्था को ध्वस्त करना निहायत जरूरी है ताकि शोषणविहीन, भेदभावरहित तथा रह प्राकर के उत्पीडन से मुक्त खुशहाल समाज का निर्माण किया जा सके। जनता के पास कोई दूसरा और नजदीकी रास्ता नहीं बचा है। हमारी पार्टी की इसी राजनीतिक सोच के साथ दण्डकारण्य के आदिवासी सचेत हुए हैं और फिर संघर्ष का शंखानाद बज गया। सरकारी गुस्से का कारण यही है।
आपलोग क्या इन बदहाल आदिवासियों से अलग हैं? नहीं, हमारी पार्टी ऐसा नहीं मानती। आप लोग जवान और छोटे स्तर के अधिकारी ( आपके बलों का नाम जिला पुलिस, सीएएएफ, सीपीओ, एसपीओ, एसटीएफ, सीआरपीएफ, बीएसएफ, ग्रे-हाउण्डस, कोबरा, आईटीबीपी, एसएसबी....जो भी हों) ऐसे ही शोषित व मेहनतकश माता-पिता की संताने हैं। रोजी रोटी की तलाश में आपने इस रास्ते को चुना है। वरना इन लोगों के खिलाफ आपके मन में गुस्से का कोई आधार हीं नहीं है। यहां की आदिवासी जनता और उनका नेतृत्व कर रही हमारी पार्टी को आंतकवादी या उग्रवादी कहकर चिदंबरम गिरोह और आपके उच्च अधिकारी आपके मन में हमारे खिलाफ कृत्रिम तरीके से गुस्सा भरने की कोशिश करते हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादियों का वफादार सेवक मनमोहन सिंह जो हमारी पार्टी को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा कहते नहीं थकता, इस बात को छुपा देता है कि दरअसल हमारी पार्टी से देश के मुठ्ठी भर लुटेरों को खतरा है। चूंकि रेडियो, अखबार, और टीवी पर उन्हीं लुटेरों का कब्जा है। इसलिये एक झूठ को सौ बार दोहराकर सच बनाने की उनकी चालें कुछ हद तक चल भी पा रही है।
आज हम (यानी यहां का आदिवासी अवाम और उनके जायज संघर्ष की अगुवाई करने वाली हमारी पार्टी) और आप लोग आमने सामने हैं। आप अपने अधिकारियों के उकसावे और आदेश पर आदिवासियों के गांवों को जला रहे हैं। लूट रहे हैं। या फिर सलवा जुडूमियों के द्वार लुटवा रहे हैं। मारपीट कर रहे हैं। आदिवासी महिलओं के साथ बलात्कार कर रहे हैं। निहत्थे लोंगों पर गोलियां बरसा रहे हैं। झूठी मुठभेड़ कर रहे हैं। और नरसंहारों को अंजाम दे रहे हैं। यह सब उस संविधान के खिलाफ जाकर कर रहे हैं जिसका पालन करने की आप शपथ लेकर इस नौकरी में आये थे। विडम्बना यह है कि जिन लोगों के खिलाफ आप यह सब कुछ कर रहे हैं वो भी आप जैसे गरीब और मेहनतकश लोग हीं हैं। जनता की रक्षा की खातिर हमारी जन सेना- पीएलजीए – आपके खिलाफ जवाबी हमले कर रही है जिसमें दर्जनों की संख्या में आप लोग हताहत हो रहे हैं।
लेकिन यही सबकुछ नहीं है। आपमें से कई लोंगों ने कम मौके पर हीं सही निर्दोष आदिवासियों पर गोली चलाने से इनकार किया। अत्याचारों का विरोध किया। यहां तक कि अपने अधिकारियों के खिलाफ कुछ मौंको पर विद्रोह भी किया। छतीसगढ पुलिस के कई जवानों और अधिकारियों ने हमारे संघर्षके इलाके में ड्यूटी करने से मना कर दिया। क्योंकि उन्हें मालूम है यहां ड्यूटी करने का मतलब अपने हीं भाई बहनों के खिलाफ खड़ा होना और अपनों पर हीं गोलियां बरसाना। हमारे इलाके में नहीं जाने के कारण कई कर्मचारियों को निलंबन किया गया फिर भी वे अपने फैसले पर कायम पर रहे। यहां तक कि कुछ जवानों ने हथियार लाकर भी भी हमें दिया। हम उन सभी लोगों का सरहाना करते हैं जिन्होंने किसी न किसी वजह से आदिवासियों के सीने पर बंदूक उठाने से मना कर दिया। हमारे इलाके में पदस्थ जवान कई परेशानियों और प्रताडनाओं के दौर से गुजर रहे हैं। खास कर उच्च अधिकारियों के बूरे बर्ताव से आहत पुलिस और अर्द्वसैनिक बलों के जवानों ने खुदकुशी कर ली। कुछ लोगों ने दरिंदे अफसरों को गोली मारकर खुद को भी गोली मारी।
हम तमाम जवानों से अपील करते हैं कि आप इस इस तरह निरर्थक मौत को गले न लगायें। आपमें ताकत है और सोच विचार कर फैसला लेने का विवेक भी। अपनी वर्गिय जड़ों को पहाचानिये ... आपको उकसाने और जनता पर कहर ढाने का आदेश देने वालों की वर्गीय जड़ो को पहचानिये। चिदम्बरम, रमनसिंह, महेंद्र कर्मा जैसों के असली चेहरे को पहचानिये। दोनो बिल्कुल अलग अलग हैं। एक दूसरे के विपरित। इसलिये आइए ... दोनो हाथ फैला कर हम आपका स्वागत कर रहे हैं। आप अपनी बंदूकें लुटेरों, घोटालेबाजों, रिश्वतखोरों, जमाखोरों, देश की संपदाओं को बेचने वाले दलालों, देश की अस्मिता के साथ सौदा करने वाले देशद्रोहियों के सीने पर तानिये। जिस मेहनत वर्ग में से आपने जन्म लिया है उस वर्ग की मुक्ति के लिये जारी महासंग्राम के सैनिक बनिये। घुसखोरी, गालीगलौज, दलाली, जातिगत भेदभाव, धार्मिक साम्प्रदायिकता आदि सामंती मान्यताओं के ढांचे पर निर्मित पुलिस और अर्द्वसैनिक बलों से वापस आइये।
दोस्तों अगर आप अपने मजबूरियों के कारण नौकरी नहीं छोड सकते तो कम से कम हमारे इलाके में काम करने से मना कर दीजिये। हमलों में शामिल होने से इंकार करिये। अपने अफसरों के हुक्म का पालन मत करिये। जनता के खिलाफ लाठी-गोलियां का प्रयोग करन से दूर रहिये। हमारे साथ सशस्त्र झड़पों के सूरत में हथियार डाल दीजिये और अपनी जान बचा लीजिये। हमारी जनता के जीवन को और संघर्ष को जानने-बूझने की कोशिश कीजिये। यह भी समझने की कोशिश कीजिये कि इतनी व्यापक सरकारी बर्बरता, आतंक और नरसंहारों के बावजूद भी यहां की जनता हमारी पार्टी के साथ क्यों खड़ी है। अपने अधिकारियों और सरकार के झूठे प्रचार के प्रभाव से खुद को बाहर लाइये। सच्चाई को समझने की कोशिश कीजिये। और सच के साथ लड़े हो जाइये।
“ मत भूलों की जिन लोगों ने तुम्हारे हाथों में बंदूके थमाई हैं
वो गद्दार हैं – मुल्क के दुश्मन हैं
मत भूलो, कि तुम हमारे हो, हमारे बीचे के हो...”
क्रांतिकारी अभिनन्दन के साथ,
भाकपा(माओवादी) दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी, महाराष्ट्र राज्य कमेटी। "
उपरोक्त पत्र मीडिया के लिये माओवादियों ने जारी किया है।
Tuesday, October 27, 2009
छत्रधर महतो को छुड़ाने के लिये राजधानी एक्सप्रेस हाईजेक
पीसीपीए(People's committee against police atrocities ) के ने
ता छत्रधर महतो को जेल से छोडने की मांग को लेकर माओवादियों ने भूवनेश्लर से दिल्ली आ रही राजधानी एक्सप्रेस को अगवा कर लिया था जिसे चार-पांच घंटे बाद सीआरपीएफ के जवानो ने छुडवाया। इस दौरान किसी भी यात्री को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया।
दिन में साढ़े तीन बजे पश्चिम बंगाल के झारग्राम इलाके के बांसतला में माओवादियों ने लाल झंडा दिखा कर राजधानी एक्सप्रेस को रुकवा दिया था। ड्राइवर ने लाल झंडा देख गाड़ी रोक दी। इसके बाद माओवादियों ने ट्रेन के ड्राइवर तथा असिस्टेंट ड्राइवर को अपने कब्जे में कर लिया था। उन्हें छुड़ाने गए सीआरपीएफ के जवानों के साथ माओवादियों की झड़प भी हुई। सीआरपीएफ के जवानों ने माओवादियों को मौके वारदात से छुडाकर ट्रेन और ट्रेन के ड्राईवर को अपने संरक्षण में ले लिया।
देश के गृहमंत्री ने कहा है कि ट्रेन को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। सभी यात्री सुरक्षित है। लेकिन सवाल उठता है कि इस नक्सल समस्याओं से कैसे निपटा जाये। यदि सरकार सिर्फ कंमाडो के बल पर नक्सलियों को खत्म करना चाहती है तो यह संभव नहीं दिखता। केंद्र और राज्य सरकारों को आम जनता की समस्याओं को समझना होगा। उनके लिये सरकारें जो बजट पास करती है उन्हें विकास के काम लगना होगा नहीं तो आने वाले दिनों में हालात और भी खराब होते जायेगें। पुलिस-प्रशासन को समझना होगा कि आम आदमी को न्याय कैसे दिलायें।
ता छत्रधर महतो को जेल से छोडने की मांग को लेकर माओवादियों ने भूवनेश्लर से दिल्ली आ रही राजधानी एक्सप्रेस को अगवा कर लिया था जिसे चार-पांच घंटे बाद सीआरपीएफ के जवानो ने छुडवाया। इस दौरान किसी भी यात्री को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया।दिन में साढ़े तीन बजे पश्चिम बंगाल के झारग्राम इलाके के बांसतला में माओवादियों ने लाल झंडा दिखा कर राजधानी एक्सप्रेस को रुकवा दिया था। ड्राइवर ने लाल झंडा देख गाड़ी रोक दी। इसके बाद माओवादियों ने ट्रेन के ड्राइवर तथा असिस्टेंट ड्राइवर को अपने कब्जे में कर लिया था। उन्हें छुड़ाने गए सीआरपीएफ के जवानों के साथ माओवादियों की झड़प भी हुई। सीआरपीएफ के जवानों ने माओवादियों को मौके वारदात से छुडाकर ट्रेन और ट्रेन के ड्राईवर को अपने संरक्षण में ले लिया।
देश के गृहमंत्री ने कहा है कि ट्रेन को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। सभी यात्री सुरक्षित है। लेकिन सवाल उठता है कि इस नक्सल समस्याओं से कैसे निपटा जाये। यदि सरकार सिर्फ कंमाडो के बल पर नक्सलियों को खत्म करना चाहती है तो यह संभव नहीं दिखता। केंद्र और राज्य सरकारों को आम जनता की समस्याओं को समझना होगा। उनके लिये सरकारें जो बजट पास करती है उन्हें विकास के काम लगना होगा नहीं तो आने वाले दिनों में हालात और भी खराब होते जायेगें। पुलिस-प्रशासन को समझना होगा कि आम आदमी को न्याय कैसे दिलायें।
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