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Monday, July 14, 2008

ईरान पर हमले की रणनीति के तहत भारत से परमाणु करार के लिये अमेरिका राजी

अमेरिका भारत को अपने पाले में लाने के लिये हर संभव कोशिश कर रहा है। क्योंकि अमेरिका को ईरान पर हमला करना है इसके लिये उसे भारत का साथ चाहिये। इराक पर बेवजह हमला कर वह इराक को तबाह कर चुका है लेकिन वह अब अपने सैनिकों को खोना नहीं चाहता। लेकिन ऐसे में सवाल है कि क्या भारत इसके लिये तैयार होगा ? यदि भारतीय जनता की बात की जाय तो कभी नहीं चाहेगी कि ईरान का विरोध किया जाये क्योंकि हमारे ऐतिहासिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं। लेकिन यदि केन्द्र की सत्ता में कोई अमेरिकी भक्त बैठा हो तो क्या किया जा सकता है ? बहरहाल अमेरिका भारत को परमाणु करार के लिये दवाब डाल रहा है।

परमाणु करार का सीधा अर्थ है भारत को अप्रत्यक्ष रूप से ईरान पर हमले के लिये राजी करना। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं और न हीं व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध (सीटीबीटी) कानून पर हस्ताक्षर किये हैं। इसके बावजूद अमेरिका भारत से परमाणु करार कर रहा है। हालांकि इन दोनो हीं संधि पर भारत के अलावा पाकिस्तान और इज़रायल ने भी हस्ताक्षर नहीं किया है। जबकि ये तीनों हीं देश बतौर सामरिक परमाणु ताकत में सक्षम है।

अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य हेनरी जे हाईड ने भारत को रियायत देने की बात की है इसके जो मुख्य कारण बताये गये हैं वो निम्नलिखित प्रकार से है – 1. भारत एक स्थायी लोकतांत्रिक देश है। 2. भारत से व्यापारिक और सामरिक रिश्ते बनने से अमेरिका को लाभ होगा। 3. भारत यह सिद्ध कर चुका है कि वह परमाणु का गलत इस्तेमाल नहीं करेगा। 4. पाकिस्तान की जगह अमेरिका को एशिया में भारत को तरजीह देनी चाहिये। क्योंकि भारत एशिया का एक शक्तिशाली देश है। ये सब बाते तो सही है लेकिन हाईड ने यूनाइटेड स्टेट और इंडिया पीसफुल परमाणु ऊर्जा कॉर्डिनेशन एक्ट के तहत जो मुख्य शर्तें भारत के साथ रखी वह बेहद खतरनाक है।

शर्त यह है कि यदि अमेरिका परमाणु कार्यक्रम जांच के मसले पर ईरान के खिलाफ कोई कदम उठाता है तो भारत उसमें साथ दे। ऐसी शर्ते क्यों ? ईरान से हमारे ऐतिहासिक संबंध हैं। ईरान-पाकिस्तान-भारत के बीच गैस पाईप लाइन बिछनी है। हमें गैस से अधिक लाभ है जबकि परमाणु करार से 15-20 साल बाद देश के सिर्फ 5-8 प्रतिशत आबादी ही बिजली का लाभ पा सकेंगे और उसके नुकसान अलग हैं। ऐसे करार से क्या फायदा?

Friday, July 11, 2008

मनमोहन-आडवाणी-सोनिया जी देश को परमाणु डंपिंग ग्रांउड होने से बचायें अन्यथा देश माफ नहीं करेगा

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंहजी, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जी और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी जी देश को बचायें। इस परमाणु करार से। इसका तत्कालिक लाभ होगा लेकिन लंबे समय में देश बर्बाद हो जायेगा। आप तीनो का नाम इसलिये ले रहा हूं कि आप तीनों ही देश के कंमाडिंग स्थिति में है। परमाणु करार के तहत बिजली कमी को पूरा किया जायेगा। ये सिर्फ सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू यही है कि विकसित देश भारत को परमाणु कचरे का डंपिंग ग्राउंड बनाने की तैयार में है। वे अणु-परमाणु को कहां रखेंगे। न जमीन में गाड़ सकते हैं और न हीं समुद्र में डाल सकते हैं। तबाही मच जायेगी। उसके लिये एक ऐसा कचरे का मैदान चाहिये जहां डालने पर उससे बिजली या अन्य काम किया जा सके। विकसित देश अपनी जरूरत को पूरा कर चुका है और कचरा हमारे यहां फैक नयी उर्जा की तलाश में जुट गया है। विकसित देश अपनी कचरा हमारे यहां विकास के नाम पर डालने की तैयारी कर लिया है पर हम परमाणु से बिजली पैदा कर कचरा कहां डालेंगे। ऐसी स्थिति में हमारे जेनरेशन को नुकसान होना तय है। विकसित देश अब परमाणु की जगह सोलर ऊर्जा को महत्व देने लगे हैं। इसलिये अंतरिक्ष में हीं सोलर ऊर्जा बनाने की कोशिश हो रही है। समुद्र किनारे बन रहे टावर में हवा से ही बिजली पैदा की जा रही है। और टावर में रह रहे लोगों को बिजली मिल रहा है। हमारा देश भारत दुनिया के उन देशों में से है जो दक्षिण की ओर तीन ओर समु्द्र से घिरा हुआ है। उत्तर की ओर पहाड़ों से। इन सभी जगहों पर तेज हवाएं चलती है। इस ओर आप थोड़ा ध्यान दे दें तो इन इलाकों में बने मकानों में काम चलाने लायक बिजली हवा से ही पैदा की जा सकती है। पठारी इलाकों में इतने झरने हैं कि वहां भी आसपास के गांवों में झरने से बिजली पैदा की जा सकती है। बचे अन्य जगह वहां पर कोयला से बिजली पैदा कर पूरी की जा सकती है। अब तो देश में मिथेन के भंडार भी मिल गये है। देश में कुल 11 मिथेन के भंडार हैं इनमें से 6 विश्व स्तरीय भंडार झारखंड में मिले हैं। जानकारों का दावा है कि झारखंड से मिथेन भंडार चालू होते ही भारत दुनिया का तीसरा देश बन जायेगा अमेरिका और आस्ट्रेलिया के बाद। इस अलावे दर्जनों देशी उपाय है बिजली पैदा करने की। कचरे से बिजली पैदा की जा रही है। गन्ने के खेतों से निकले वाले कचरे से बिजली पैदा हो सकती है। हम जितनी माथापच्ची कर रहे हैं और जितना चुनावी खर्च के लिये तैयार हैं, परमाणु करार को लेकर। उतने ही रकम इधर लगा दे तो गांव-गांव में लघु स्तर पर बिजली मुहैय्या करायी जा सकेगी। जहां तक सामरिक हथियारों का सवाल है तो उसमें हम सक्षम है। ये करार करे या नहीं लेकिन सामरिक अध्ययन तो जारी ही रहेंगे।

Tuesday, February 5, 2008

40 फीट नीचे फेका दो साल के अपने पुत्र को

तस्वीरों को देख आप अपनी अंगुलियां दांतों तले दबा लेंगे। जर्मनी के एक शहर की एक इमारत में आग लग गई। चारों ओर धूआं और आग की लपेटें तेजी से फैलने लगा। जो लोग जवान थे वे अपने आपको किसी तरह बचाने में जुटे थे लेकिन छोटे बच्चों का बुरा हाल था। नीचे उतर नहीं सकते थे। ऐसे में दो साल के बच्चों को बचाने के लिये, जिसका दम घुट रहा था , उसके पिता ने कलेजे पर पत्थर रख अपनी बच्चे को 40 फीट नीचे फेक दिया जिसे पहले से तैयार पुलिस वालो ने कैच कर लिया। बच्चा पुरी तरह स्वस्थ्य और सुरक्षित है।






Sunday, January 20, 2008

बिहारियों के साथ भेदभाव

बिहार को लेकर बहस जारी है खासकर दिल्ली और मुंबई जैसे शहरो में। दिल्ली से लेकर मुंबई तक लोग बिहारियों के खिलाफ टिका –टिप्पणी करते रहते हैं। बिहार(जब झारखंड में बिहार शामिल था) एक ऐसा राज्य है जहां सारा कुछ उपलब्ध था चाहे शानदार खेती के लिये जमीन हो या खनिज संपदा। लेकिन कभी भी इस राज्य की ओर ध्यान नहीं दिया - केन्द्र और राज्य सरकार ने।
राज्य के नेताओं का अपना कोई वजूद नहीं था क्योंकि वे निर्भर थे नेहरु-इंदिरा पर। इसलिये मुख्यमंत्री बनने की लालच में बिहार के साथ हो रहे भेदभाव पर राज्य के नेता केन्द्रीय सरकार से संघर्ष तक नहीं कर सके। बिहार में कोयला, लोहा, यूरेनियम और अबऱख जैसे दर्जनों खनिज हैं। लेकिन इसका लाभ बिहार को कभी नहीं मिला। कोयले या अन्य खनिज संपदा की रॉयल्टी यदि अन्य राज्यो को 30 प्रतिशत मिलता था तो बिहार को सिर्फ लगभग 9 प्रतिशत। बतौर उदाहरण इसे रूपये में देंखे तो जहां बिहार को कम से 10 हजार करोड़ रूपये मिलनी चाहिये थी प्रति वर्ष, वहीं बिहार को मिलता था सिर्फ 3 हजार करोड़ के आसपास। यानी बिहार का 7 हजार करोड़ रूपये प्रति वर्ष दिल्ली -मुंबई सहित दूसरे राज्यों में लगाया जाता रहा। यदि यही रुपया बिहार में लगाया जाता तो आज लोग राजधानी दिल्ली की चमक को भी भूल जाते।
इसके लिये हमारे नेता हीं दोषी हैं जो इंदिरा गांधी की बातों में आकर दब्बू बनकर रह गये। इंदिरा गांधी बिहार के नेताओ को यही समझाती रही कि बिहार की भूमिका माता - पिता की तरह होनी चाहिये। इसलिये दूसरे राज्यों के विकास के लिये बिहार का थोड़ा हिस्सा अन्य राज्यों को मिल जाता है तो देश का हीं भला होगा। देश का तो भला हो गया लेकिन बिहार के निवासियों को अब अन्य जगहों पर अपमानित होना पड़ रहा है।
बाढ से निपटने तक के पैसे नहीं है क्योंकि नेपाल से आनी वाली नदियां तबाही मचा देती है प्रत्येक साल। यदि अन्य राज्यों की तरह बिहार भी अपने पैसे का इस्तेमाल करता तो आज बिहार में नदियों की पानी को रोककर बाढ से बचने के उपाय तो कर ही लिये जाते साथ हीं बड़े पैमाने पर बिजली भी पैदा की जाती और खेती भी जमकर होती। वर्तमान काफी बढिया रहता। इतिहास तो शानदार है हीं। देश में लोकतंत्र की बयार भी लगभग ढाई हजार साल पहले बिहार से ही चली थी। बौद्ध और जैन धर्म का उदय भी बिहार में ही हुआ। सिख समुदाय की शानदार पहचान ‘पगड़ी’ गुरू गुरु गोविंद सिंह की देन है जिनका जन्म पटना सीटी में हुआ था। प्रचीन काल में विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय नालंदा और विक्रमशीला बिहार में ही थे। खैर समय से बलवान कोई नहीं।

Sunday, December 30, 2007

बिलावल बने पीपीपी के नेता

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के 19 वर्षीय बेटे बिलावल भुट्टो ज़रदारी को पाकिस्तानी पीपुल्स पार्टी का नेता चुन लिया गया है। बिलावल भुट्टो ज़रदारी का नाम पहले बिलावल ज़रदारी था। इनके पिता आसिफ़ अली ज़रदारी पार्टी के सह-अध्यक्ष होंगे. इस बात का पीपीपी ने एलान कर दिया है। बेनजीर की हत्या के बाद कयास लगाये जा रहे थे कि पार्टी का कमान कौन संभालेगा। गम का बोझ लिये भूट्टों परिवार एक बार फिर चुनावी मैदान में कुद गया है। कमान संभालने के बाद बिलाल ने कहा कि मेरी माँ कहा करती थी कि लोकतंत्र ही बदला लेने का सबसे बेहतर तरीका होता है . इससे पहले बेनजीर के वसियत को पढा गया। पीपीपी के वरिष्ठ नेता मख़दूम अमीन फ़हीम ने कहा कि बेनज़ीर भुट्टो ने वसीयत में लिखा है कि अगर मैं न रहूँ तो फिर चेयरमैन आसिफ़ अली ज़रदारी बनें. इसका पूरे हाउस ने समर्थन किया. लेकिन फिर आसिफ़ अली ज़रदारी ने कहा कि वे अपने बेटे को ये ज़िम्मेदारी देना चाहते हैं. " और आखिर बिलाल को कमान दे दी गई। उसके पढाई लिखाई के दौरान उनके पिता ही पार्टी चालायेंगे।
इस बीच जरदारी ने बेनजीर की हत्या की जांच में यूनाईटेड नेशन और ब्रिटेन से मदद लेने की मांग की है। बहरहाल बिलावल बेनज़ीर भुट्टो और आसिफ़ अली ज़रदारी के बड़े बेटे हैं. उनका जन्म पाकिस्तान के कराची शहर में सितंबर 1988 में हुआ. 90 के दशक में बेनज़ीर भुट्टो निर्वसान में चली गईं. इस दौरान बिलावल ने दुबई में स्कूली शिक्षा ली. उन्होंने 2007 में इंग्लैंड की ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में आगे की पढ़ाई शुरू की थी.
बिलावल को राजनीतिक समझ नहीं के बराबर है लेकिन एक ताकतवर राजनीतिक परिवार के होने के कारण जनता के केन्द्र बिन्दु वो ही है। बिलावल ने ऐसे समय पीपीपी के नेता बने है जब उनके देश और परिवार दोनों ही संकट की दौर से गुजर रहा है। बिलावल के पूरे परिवार को सुरक्षा देने की जिम्मेवारी पाकिस्तान सरकार की है लेकिन कहा जाता है कि सरकार के ही लोग बेनजीर के खात्मे में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है ऐसे में ये परिवार किस पर विश्वास करे उन्हें समझ नहीं आ रहा।

Thursday, October 18, 2007

बुश ने तीसरे विश्व युद्ध की धमकी दी

ईरान को तहस नहस करने के लिये अमेरिका हर संभव कोशिश कर रहा है। ईरान के समर्थन में विश्व जनमत को देख अमेरिका को समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या करे और क्या न करें। इसी असमंजस में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने चेतावनी दी है कि तीसरे विश्व युद्घ को रोकना है तो ईरान को परमाणु संपन्न देश बनने से रोकना होगा। दुनियां के शक्तिशाली देशों से बुश ने कहा है कि वे ईरान को परमाणु कार्यक्रम रोकने के लिये दबाव डाले। इन दिनों विश्व में जो भी कदम उठ रहे हैं उसे अमेरिका अपने खिलाफ उठाये जा रहे कदम के रुप में देख रहा है। रुस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन का ईरान दौरा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण – जब अमेरिका ईरान को परमाणु कार्यक्रम न रोकने पर हमले की धमकी दे रहा हो और ऐसे माहौल में रुस के राष्ट्रपति का ईरान दौरा काफी मायने रखता है। पुतिन का दौरा एक तरह से अमेरिका के एकतरफा दादागिरी को चुनौती भी है और ईरान को नैतिक समर्थन। दौरे के दौरान रूसी राष्ट्रपति पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने कैसपियन समुद्री इलाक़े के नेताओं के सम्मेलन में हिस्सा लिया था. इस सम्मेलन में रूस और ईरान के अलावा अज़रबेइजान, कज़ाख़स्तान और तुर्कमेनिस्तान ने हिस्सा लिया और इन सब नेताओं ने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए कि किसी दूसरे देश द्वारा हमला करने के लिए ये देश अपनी ज़मीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे. एक तरह से यह अमेरिका को चुनौती है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1943 में स्टालिन की ईरान यात्रा के बाद पुतिन तेहरान जाने वाले पहले रूसी राष्ट्रपति हैं। इस दौरे से पहले रुस ने गैरपरमाणु सबसे शक्तिशाली बम का परीक्षण भी किया। इससे घबराये और ईरान पर हमला न कर पाने की बैचेनी में हीं बुश ने तीसरे विश्व युद्ध की धमकी दी है।

Thursday, September 20, 2007

मुंहतोड जवाब मिलेगा अमेरिका को : ईरान

ईरान पर हमला कब होगा समय सीमा तय नहीं है लेकिन अमेरिका ने ईरान पर जल्द से जल्द हमला करने के लिये माहौल बनाना शुरु कर दिया है। फ्रांस के राष्टपति निकोलस सारकोजी के बाद अमेरिका की विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस ने भी ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से इंकार नहीं किया है। बताया जा रहा है कि ईरान के खिळाफ हमले में इजरायल भी शामिल होगा। ईरान ने कहा है कि यदि इजरायल और अमेरिका उस पर हमला करता है तो उसे मुंहतोड जवाब मिलेगा। ईरान इराक के अपेक्षा काफी बड़ा देश है। इस लिये अमेरिका ईरान को चारो ओर घेर कर मारने की योजना बना रहा है। ईरान से सटे इराक में एक तरह से अमेरिका का कव्जा है और वहां अमेरिकी फौज पूरे साजो सामान के साथ तैयार है ।ईरान का द. पूर्वी इलाका पाकिस्तान से मिलता है।और यहां के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ अमेरिकी समर्थक हैं । इसके अलावा ईरान और इजरायल के बीच बहुत दूरी नहीं है जहां से अमेरिका हवाई हमला कर सकता है। लेकिन रुस ने कहा है कि ईरान पर हमला नहीं किया जाना चाहिये । रुस पहले की तरह ताकतवार देश नहीं रहा इस लिये अमेंरिका पूरी दुनिया में मनमानी कर रहा है। और वह रुस की परवाह भी नहीं करता। लेकिन कहा जा रहा है कि रुस सामरिक दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिये फिर अमादा है। इस लिये हाल हीं मे उन्होंने एक ताकतवार बम का टेस्ट किया है। ऐसे भी शीत युद्ध के दौर में ईरान रुस के साथ था इस लिये हो सकता है कि रुस ईरान के पक्ष में आ जाये । ईरान के साथ भारत के भी अच्छे रिश्ते हैं लेकिन भारत इस मामले में दोराहे पर दिख सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिकी समर्थक माने जाते हैं और जिनके बल पर सरकार चल रही है वो ईरान समर्थक। ईरान से भारत के ऐतिहासिक रिश्ते भी हैं और बड़े पैमाने पर आर्थिक रिश्ते होने वाले हैं। बहरहाल अमेरिका ईरान पर हमले के लिये तैयार है बस जरुरत है एक बहाने की।

Tuesday, September 18, 2007

ईरान पर हमले की तैयारियां

इन दिनों ईरान पश्चिमी देशों की नज़र में एक बार फिर खटकने लगा है. फ़्राँस के विदेश मंत्री बर्नार्ड कुशनेर ने कहा है कि दुनिया को ईरान के साथ संभावित युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। कुशनेर के इस बयान के बाद ईरान के विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और कहा कि फ्रांस अमेरिकी नीति पर चल कर विश्वसनीयता खो दी है। कुशनेर ने कहा कि ईरान पूरी दुनियां के लिये खतरा बन सकता यदि उसने परमाणु बम बना लिये तो। उन्होने अपने ही देश की कंपनियों को सलाह दी है कि वे ईरान में पूंजी न लगाये।
फ्रांस का रवैया आक्रमक हो गया है । बताया जाता है फ्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति निकोलाई सरकोजी ईरान को निशाना बनाने के लिये अमादा हैं। इन्हें फ्रांस के अन्य राष्ट्रपतियों के उल्ट अमेरिकी समर्थन माना जाता है । कहा यह भी जा रहा है सरकोजी को राष्ट्रपति बनाने में अमेरिका ने अह्म भूमिका निभाई। इस लिये फ्रांस ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका के साथ दिख रहा है। पिछले फ्रांसीसी राष्ट्रपति ज्याक शिराक अमरीकी नीतियों के विरोधी रहे थे.
फ्रांस के विदेश मंत्री के बयान के बाद संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के प्रमुख ने यह बयान देकर माहौल को और गर्म कर दिया है कि बल प्रयोग अंतिम विकल्प है। इसका अर्थ यही है कि यदि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम नहीं रोकता है तो ईरान पर हमला तय है।
अमेरिका ईरान पर सीधे बयान बाजी न कर अब फ्रांस के हवाले से करवा रहा है ताकि दुनिया के उन देशों का भी समर्थन मिले जो अमेरिकी विरोधी और फ्रांसीसी मित्र रहे हैं।

Wednesday, September 12, 2007

रुस ने किया “डैड ऑफ ऑल बम्स” का परीक्षण

काफी लंबे समय बाद रुस ने सामरिक दुनियां में ज़बरदस्त का धमाका किया है। रुस ने अब तक का सबसे शक्तिशाली गैरपरमाणुविक बम का सफल परीक्षण करने का दावा किया। सात टन वजन वाले इस बम से विस्फोट होते हीं जबरदस्त आग का गोला पैदा होता है।बताया जाता है कि यह बम हवा में मौजूद वायू को ही विस्फोट के लिये ईधन के रुप में इस्तेमाल करता है। इस बम का इस्तेमाल आकाश और ज़मीन दोनों जगहो से किया जा सकता है। इस बम की खासियत यह है कि इसकी तबाही क्षमता परमाणु बम के बराबर है लेकिन पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है। इस शक्तिशाली बम का परीक्षण रुस के टेलीविज़न पर प्रसारित किया गया। विस्फोट के बाद रुस ने कहा है कि इस परीक्षण से किसी संधी का उल्लघंन नहीं होगा और न हीं हथियारों के होड़ को बढावा मिलेगा।
अमेरिका के ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ से यह बम चार गुना अधिक ताकतवर है। रुस ने इस बम को “डैड ऑफ ऑल बम्स” कहा है।.विश्लेषक मानते हैं कि रुस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने इस बम विस्फोट के ज़रिए दुनिया में अपनी सैन्य शक्ति को एक बार फिर स्थापित करने की कोशिश की है।

Tuesday, September 11, 2007

डॉ कलाम के लिये आवास की व्यवस्था कब तक ?

देश का सरकारी तंत्र कितना लचर है इसका ताजा उदाहरण है पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को अभी तक रहने के लिये आवास का उपलब्ध न कराना। उन्हें अपने पद से इस्तीफा दिये एक माह से अधिक हो चुका है। कारण बताया जा रहा प्रशासन उनके आवास को अभी तक तैयार नहीं करा पाया है।सभी लोगों को पहले से हीं जानकारी होती है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का कार्यकाल कब खत्म होगा और उन्हें क्या क्या सुविधा उपलब्ध करानी है लेकिन हमारा प्रशासन सोया हुआ है।उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत को भी अभी तक आवास उपल्ब्ध नहीं कराया गया है।डा कलाम और अन्य पूर्व राष्ट्रपतियों में अंतर है। डा कलाम दुनियां के जाने माने वैज्ञानिक भी हैं।सुरक्षा की लिहाज से डा कलाम को जेड प्लस सुरक्षा कवर मिला हूआ है लेकिन वे एक गेस्ट हाउस में रहने को विवश हैं। उन्हें आंतकवादी संगठनों से भी खतरा है।केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग एक पूर्व राष्ट्रपति को आवास उपलब्ध नहीं करा पायी है इससे अधिक हास्यास्पद और क्या हो सकता है।

Monday, September 10, 2007

नवाज़ शरीफ और मुशर्रफ के बीच टकराव

पाकिस्तान में हो रही गतिविधियों पर झारखंड के लोगों की पैनी नज़र है। यहां के लोग देश विदेश में हो रहे हर महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करते हैं। ऐसा नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय चर्चायें सिर्फ झारखंड राज्य के महत्वपूर्ण संस्थाओं तक है। यहां के चाय - पान की दूकानों पर भी विश्व स्तरीय विषयों पर चर्चा होती है। लोग जानना चाहते है कि दुनियां में क्या हो रहा है। झारखंड में लोगों से आज मेरी बातचीत हुई लोग मुझसे सिर्फ यहीं जानना चाह रहे थे पाकिस्तान में क्या होगा ?
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को एक बार फिर पाकिस्तान से बाहर भेज दिया गया। सात साल तक देश से निर्वासित जीवन बिताने के बाद आज सुबह साढे 9 बजे इस्लामाबाद पहुंचते हीं उन्हें हिरासत में ले लिया गया और जैसी उम्मीद थी कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ नवाज शरीफ को वापस पाकिस्तान से बाहर करवा देंगे आखिर वही हुआ। इस्लामाबाद में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि “ लोकतंत्र की बहाली के लिये सभी लोगों को मिल कर काम करना चाहिये ”. बहरहाल नवाज शरीफ के इस्लामाबाद पहुंचने से पहले हीं, जहां एक ओर एयरपोर्ट और आसपास के इलाके को पुलिस छावनी में बदल दिया गया वहीं शहर में नवाज़ के समर्थक आंदोलन करते रहे।
पूर्व प्रधानमंत्री को भले हीं सउदी अरब भेज दिया गया हो लेकिन यह मामला यहीं रुकने वाला नहीं है। इसके संकेत मिलने लगे हैं। लंदन से इस्लामाबाद पहुंचे नवाज शरीफ के साथ उसके भाई शाहबाज़ शरीफ साथ में नहीं थे।
जानकारों का कहना कि मियां नवाज शरीफ इस बार राष्ट्रपति मुशर्रफ के खिलाफ जमकर लोहा लेने का मन बना लिये हैं। कहा जाता है कि शरीफ साहब ने इस बार अपनी जान को भी दांव पर लगाने को तैयार हैं। भाई शाहबाज शरीफ को लंदन में इस लिये रहने दिया कि यदि इस्लामाबाद में लोकतंत्र बहाली के लिये आंदोलन के दौरान उन्हें कुछ हो गया तो आंदोलन खत्म नहीं होगा और कमान उसका भाई शाहबाज सभांल लेगा। शरीफ साहब की आक्रमकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कुछ दिन पहले यह धमकी दी थी कि यदि राष्ट्रपति मशर्रफ कुछ गलत करने कि कोशिश करते हैं तो पाकिस्तान में 1971 वाली हालात पैदा हो जायेगी। इसका अर्थ यही है कि पाकिस्तान का एक और विभाजन।
1971 में बांगला देश ,जो पहले पाकिस्तान का हिस्सा था, में पाकिस्तानी फौज अपनी ही जनता के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करती थी। फौजी हुकूमत से तंग आकर पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से के लोगो ने एक अलग देश की मांग को लेकर पाकिस्तानी फौज से लड़ गई. इस लड़ाई में भारत की सेना ने भी बंगाल के लोगों की मदद की और पाकिस्तान से अलग बांगला देश का उदय हुआ। शरीफ साहब के आंदोलन का खासा असर पंजाब पर पड़ेगा। लेकिन उसका असर किस हद तक होगा ये सब कुछ आने वाले दिनों में हीं चल पायेगा। भारत ने पाकिस्तान में घट रही घटनाओं के मद्देनज़र सिर्फ इतना हीं कहा कि वहां जो भी घटनायें घट रहीं हैं वो सब कुछ वहां कि अंदरुनी मामला है।बहरहाल पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ का भविष्य अमेरिका के रुख पर हीं निर्भर है। देखना यह है कि पाकिस्तान में जनता की जीत होती है या अमरीकी दबदबा की।