Sunday, December 9, 2012

कैंसर पीड़ित सुमित कुमार ने इस दुनिया को अलविदा कहा।


ए-प्लास्टिक एनेमिया से पीड़ित धनबाद जिले के 11 वर्षीय सुमित कुमार अब इस दुनिया में नहीं रहे। उन्होंने अंत तक इस बीमारी से संघर्ष किया। यहां तक कि अपने आखिरी समय में भी उन्होंने बातचीत के दौरान यही कहा कि मैं ठीक हूं। लेकिन आखिरकार उसी दिन (25 नवंबर 12) दोपहर ढाई बजे उन्होंने कोलकाता के टाटा कैंसर होस्पिटल में दम तोड़ दिया।

 टाट कैंसर होस्पिटल कोलकाता के निदेशक और ए-प्लास्टिक एनेमिया विशेषज्ञ डॉ मामेन चंडी ने कहा कि हमने सुमित को ठीक करने के लिये बहुत कोशिशें की लेकिन अंतत: असफल रहे। वह काफी हिम्मत वाला लड़का था। इतने कठिन इलाज के दौरान भी वह कभी नहीं घबराया। सुमित की मां शोभा कुमारी एक महान मां है । उन्होंने हर पल अपने पुत्र सुमित कुमार के साथ रही। लगातर अपने पुत्र की सेवा करती रही। उनके पिता हरिद्धार जी ने अथक कोशिश की अपने पुत्र के इलाज के लिए।

हरिद्धार जी पेशे से गणित के शिक्षक हैं और धनबाद के हिरापुर स्थित एक प्राइवेट हाई स्कूल में पढाते हैं। वे इस बीमारी के इलाज के लिये आर्थिक रूप से अक्षम थे लेकिन अपने पुत्र के इलाज के लिये उन्होंने जबरदस्त मेहनत की। और धन जुटाया।

 देश-दुनिया के नामी हस्तियों ने भी सुमित के इलाज के लिये आगे बढे उनमें डॉ मामेन चंडी के अलावा  विश्व प्रसिद्ध उद्योगपति रत्न टाटा, भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली और पश्चिम बंगाल की अभिनेत्री कोयल मुख्य रूप से रही। ये सभी जानी मानी हस्तियों ने व्यक्तिगत तौर पर अस्पताल जाकर सुमित से मुलाकात भी किये। ब्रिटेन के प्रींस विलियम ने भी कोलकाता भ्रमण के दौरान  सुमित से मुलाकात की। इतना हीं नहीं सार्वजिनक कंपनी बीसीसीएल के चेयरमैन टी.के. लाहिरी के नेतृत्व में बीसीसीएल ने भी इलाज के लिये आर्थिक मदद की। धनबाद जिला का डिनोवली स्कूल ने बढ चढ कर सुमित के इलाज के लिये आर्थिक मदद की। इसके अलावा दर्जनों लोगों ने भी आर्थिक मदद की। मास्टर जी के नाम से प्रसिद्ध सुमित कुमार के पिता हरिद्धार जी ने सभी लोगों के प्रति आभार प्रकट किया है।

 सौरभ गांगुली ने अपने प्रशंसक सुमित से जब मिलने अस्पातल पहुंचे तो उनके लिये ढेर सारे क्रिकेट का सामान लेकर गये थे। सुमित भी सौरभ गांगुली बैटिंग कैसे करते हैं यह करके दिखाया था।

 
सुमित का जन्म 27 जनवरी 2001 को धनबाद जिले के सरायढेला में हुआ था। और निधन 25 नवंबर 2012 को। 25 नवंबर को रविवार का दिन था लेकिन जैसे हीं ये खबर पहुंची कि सुमित कुमार इस दुनिया में नहीं रहा वैसे हीं पूरा होस्पिटल सुमित के लिये उमड़ पड़ा। क्या डॉक्टर और क्या नर्स सभी सुमित को देखने के लिये पहुंचने लगे।

यही हाल धनबाद का भी था। जैसे हीं शहर में यह खबर पहुंची कि शहर के लोग उमड़े पड़े। सुमित का पार्थिव शरीर रात दस बजे के बाद धनबाद पहुंचा। लोग पहले से ही बड़ी संख्या में सुमित के घर के बाहर जमा थे। और सुबह होते हीं बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।

 बहरहाल सुमित कुमार ने अपने बाल अवस्था में हीं इस संसार से विदा ले लिये। वे एक मेधावी छात्र थे।

Wednesday, October 24, 2012


स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर और आमिर खान सम्मानित किये गये।  

 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाती आयोग ने टेलीविजन शो सत्यमेव जयते के माध्यम से देश और समाज में फैले सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरुकता फैलाने के लिए स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर और फिल्म स्टार आमिर खान को 18 अक्टूबर 2012 को सम्मानित किया । आयोग ने अंतरराष्ट्रीय वाल्मीकि दिवस के मौके पर नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में दोनों हस्तियों को पुरस्कार प्रदान किया।

 
श्री शंकर के नेतृ्त्व में स्टार प्लेस समेत स्टार इंडिया के आधे दर्जन से अधिक चैनलों में प्रसारित सत्यमेव जयतेकार्यक्रम में तेरह एपिसोड दिखाये गये और वे सभी सामाजिक मुद्दो पर आधारित था। सभी कार्यक्रम महत्वपूर्ण रहा। इसी कार्यक्रम में हाथ से मैला उठाने वाले 3 लाख लोगों की समस्याओं को बेहद संजीदगी से उठाया गया।

 
पुरस्कार समारोह में केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, सामाजिक न्याय मंत्री मुकुल वासनिक, सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पूनिया भी मौजूद थे। और ये सभी लोगो ने स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर की विशेष सराहना की। और श्री शंकर को विशेष धन्यवाद दिया।


इस मौके पर स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर ने कहा, टेलीविजन सिर्फ मनोरंजन का स्रोत नहीं है और 'सत्यमेव जयते' के साथ हमने यह सिद्ध कर दिखाया कि टीवी के पास देश की प्रगति में योगदान और लोगों की मानसिकता बदलने की ताकत है।

 श्री उदय शंकर ने अपने कार्यक्रम सत्यमेव जयते को दूरदर्शन पर भी दिखाने की इजाजत दी। वह भी बिना किसी लाभ के। स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर साहसिक फैसले और देश व समाज के विकास के लिये जाने जाते हैं। उन्होंने देश व समाज के विकास के लिये एक दिशा तय कर दिया।

Friday, August 31, 2012

गुजरात दंगे मामले में कोडनानी और बजरंगी की कड़ी सजा।

नरोडा पाटिया गुजरात दंगे के मामले में विशेष अदालत ने पूर्व मंत्री और बीजेपी एमएलए माया कोडनानी और बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी समेत 32 लोगों को सजा सुनाई है। अदालत ने कोडनानी को 28 साल और बजरंगी को पूरी जिंदगी जेल में बितान का आदेश दिया। बाकी 29 दोषियों में 7 को 31 साल और 22 को 24 साल की सजा सुनाई गई है।


बीजेपी विधायक कोडनानी को दो अलग-अलग धाराओं के तहत 28 साल की सजा सुनाई गई है। कोडनानी को हत्या के आरोप में उम्रकैद और साजिश रचने के आरोप में धारा 326 के तहत सजा सुनाई गई है। एक मामले में 10 और दूसरे मामले में 18 साल की सजा सुनाई गई।  इस तरह उन्हें कुल 28 साल जेल में काटने होंगे। और  बाबू बजरंगी को पूरी जिंदगी जेल में काटनी होगी।  

उल्लेखनीय है कि गोधरा ट्रेन हादसे के बाद नरोडा पाटिया में दंगे हुए थे जिसमें 97 लोगों की हत्या कर दी गई थी। यह मामला 28 फरवरी 2002 का है। इस मामले में कोडनानी और बजरंगी समेत 70 लोंगो को आरोपी बनाया गया। इनमें से 32 लोगों को सजा सुनायी गई। 29 लोगों को बरी किया गया। 2 फरार है और 7 की मौत हो चुकी है।

बहरहाल, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की परेशानी बढ सकती है। क्योंकि माया कोडनानी ने भीड़ को उकसाया था। बाद में कोडनानी महिला और बाल विकास मंत्री बनी थीं। मार्च 2009 में मंत्री रहते गिरफ्तार होने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

बीजेपी चुनाव का इंतजार करें, इस्तीफा नहीं दूंगा – प्रधानमंत्री सिंह

ईरान से वापस दिल्ली आने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बीजेपी पर हमला करते हुए कहा कि वे इस्तीफा नहीं देंगे। प्रधानमंत्री पद की एक गरिमा होती है इसलिये मैं इस मामले में चुप रहूंगा। बीजेपी 2014 चुनाव का इंतजार करे।

 
उल्लेखनीय है कि बीजेपी पिछले एक पखवाड़े से कोयला आवंटन के मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार इस्तीफे की मांग कर ही है। जबकि प्रधानमंत्री सिंह समेत कांग्रेस पार्टी ने इस आरोप को गलत बताया और कहा कि इस बारे में संसद में चर्चा की जानी चाहिये। इतना हीं नहीं कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी पर हमला करते हुए कहा कि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है वहां के मुख्यमंत्री खुद ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इसलिये बीजेपी संसद में चर्चा करने से डर रही है।

 
प्रधानमंत्री सिंह ने बीजेपी पर हमला करते हुए कहा कि वो विपक्ष के दवाब में इस्तीफा नहीं देंगे। बीजेपी को चाहिए को वो संसद की गरिमा बनाए रखें। मैं तू-तू, मैं-मैं में नहीं पड़ना चाहता। विपक्ष की वजह से 90.8 फीसदी का ग्रोथ नहीं हो पा रहा है।

 
वहीं कांग्रेस के वरिष्ट नेता दिग्विजय सिंह ने बीजेपी पर हमला करते हुए कहा कि बीजेपी की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक(कैग) विनोद राय राजनीतिक महत्वकांक्षा पाले हुए हैं। उनकी महत्वकांक्षा टी एन चतुर्वेदी की तरह है। दिग्विजय ने कहा कि साल 1989 में टीएन चतुर्वेदी ने बोफोर्स तोप को लेकर एक रिपोर्ट को पेश किया था और बाद में सेवानिवृत्ति के बाद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। बाद में वह संसद के सदस्‍य बने और फिर कर्नाटक के राज्‍यपाल नियुक्‍त किए गए।


कांग्रेस महासचिव सिंह ने विनोद राय एक मनगढ़ंत आंकड़े दे रहे हैं, जिसका वास्‍तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। उन्‍होंने किस प्रकार इस आंकड़े का गणन किया, यह समझ से परे है।

Wednesday, August 29, 2012

दो-दो सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनेंगे बिहार में।


केंद्र सरकार ने बिहार में दो-दो केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने के लिये हरी झंडी दे दी है। ये विश्व-विद्यालय बिहार के गया और मोतिहारी जिले में बनाया जायेगा। और दोनो हीं विश्व विद्यालय के लिये 120-120 करोड़ रूपये आवंटित किये जायेंगे।

 
उल्लेखनीय है कि बिहार में केंद्रीय विश्व विद्यालय खोलने के लेकर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और राज्य के मुख्यमंत्री के बीच मतभेद थे। कपिल सिब्बल पटना या गया जिले में केंद्रीय विश्व विद्यालय बनाना चाहते थे लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत बिहार के तमाम नेता इस पक्ष में थे कि केंद्रीय विश्व विद्यालय मोतीहारी में स्थापित किया जाये। यहीं के चंपारण से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ आगाज किया था।

 
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह भी मानना है कि इससे बिहार में समान रूप से विकास हो सकेगा। वहीं केंद्रीय मंत्री सिब्बल का तर्क यह था कि केंद्रीय विश्व विद्यलाय बनने जा रहा है इसलिये जगह ऐसी जगह हो जो एयरपोर्ट, रेल और हाइवे सड़क से जुड़ी है।

 
बहरहाल कपिल सिब्बल ने ठोस कदम उठाते हुए यह तय किया कि बिहार में दो केंद्रीय विश्व विद्यलाय बनायें जायेंगे। इससे बिहार में पढाई का एक नया वातावरण बनेगा।

Wednesday, August 15, 2012

स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर के नेतृत्व में नये भारत का उदय।

स्टार प्लस पर दिखाये जाने वाले कार्यक्रम सत्यमेव जयतेने भारत में एक साइलेंट क्रांति का आगाज कर दिया है। इस कार्यक्रम ने देश के हर नागरिक को अपने कर्तव्य के प्रति जागरुक होने का अहसास दिलाया। इसका इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि देश के इतिहास में पहली बार, किसी धारावाहिक पर, प्रधानमंत्री से लेकर एक आम आदमी तक चर्चा करते दिखे। इसके लिये स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर और फिल्म स्टार आमिर खान धन्यवाद के हकदार हैं।

आमिर खान पर्दे के एक बड़े नाम हैं। उन्हें हर लोग जानता है। इनसे हम आप सब वाकिब हैं। लेकिन हम आपको ऐसे हस्ती के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर इस कार्यक्रम की सफलता की स्क्रिप्ट लिखी और योजना बनाई। उन्होंने लोगों को देश और समाज की एकता और संपन्नता पर विचार करने के लिये मजबूर कर दिया। वे हैं स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर।

सत्यमेव जयते को कैसे सफल बनाया उदय शंकर ने - टेलीविजन की दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई है पहला समाचार और दूसरा मनोरंजन। और दोनो हीं दुनिया में आज उदय शंकर से बड़ा कोई नाम नहीं है। उदय शंकर आज स्टार इंडिया के सीईओ हैं। इससे पहले वे सफल पत्रकार रह चुके हैं। उनकी पत्रकारिता की सफलता पर चर्चा से पहले हम यह जानेंगे कि उन्होंने सत्यमेव जयते को इतना अधिक लोकप्रिये कैसे बना दिया। फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन के एंकरिंग में कौन बनेगा करोड़पतिजैसा लोकप्रिय कार्यक्रम भी सत्यमेव जयते की लोकप्रियता के सामने काफी छोटा दिखने लगा। एक नजर स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर के दूरदृष्टि पर -

1. वे हमेशा देश और समाज को सही दिशा में ले जाने के लिये प्रयत्नशील रहे।
2. उन्होंने सत्यमेव जयते के विषय को चयन करने में, काफी मेहनत की और सकारात्मक दृष्टि अपनाया।
3. देश और समाज से जुड़े मुद्दों पर आधारित सत्यमेव जयते को, स्टार इंडिया के स्टार प्लस समेत आधा दर्जन से उपर चैनल्स में दिखाने की रही झंडी दी।
4. इतना हीं नहीं अपने लोकप्रिय धारावाहिक सत्यमेव जयते को आमदनी का जरिया नहीं बनाया। उन्होंने विषय के महत्व को अधिक महत्व दिया।
5. देश और समाज को जोड़ने वाले इस कार्यक्रम को उन्होंने दूरदर्शन पर भी दिखाने की हरी झंडी दी। दूर्रदर्शन पर जो सत्यमेव जयते दिखाये गये उसका कॉमर्शियल लाभ भी स्टार इंडिया ने नहीं लिया बल्कि वह लाभ दूरदर्शन के खाते में गया।
6. बताया जाता है कि दूरदर्शन पर बिना कॉमर्शियल लाभ के दिखाने के पीछे उदय शंकर की सोच बेहद सकारात्म थी। वे चाहते थे कि देश और समाज को जोड़ने वाले इस कार्यक्रम को पूरा देश देखे। इसलिये उन्होंने कॉमर्शियल की परवाह नहीं की। उनका यह फैसला अदम्य साहस भरा था। शायद हीं किसी कंपनी का सीईओ ऐसा फैसला कर सके।
7. सफल पत्रकार रहे उदय शंकर ने मनोरंजन टीवी दुनिया की परिभाषा हीं बदल दी। उन्होंने यह कर दिखाया कि मनोरंजन की दुनिया में भी रहकर देश और समाज को आगे बढाने के लिये बहुत कुछ किया जा सकता है बर्शते सही सोच और नजरिया हो। सत्यमेव जयते इसका सबसे ताजा और बड़ा उदाहरण है।

स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर ने बतौर रिपोर्टर अपनी कैरियर की शुरूआत की थी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। वे न्यूज चैनल आजतक और स्टार न्यूज को हेड कर चुके हैं। इसके एडिटर-इन-चीफ रह चुके हैं। बहरहाल उनके नेतृत्व में सत्यमेव जयतेने देश और समाज को उस सच्चाई से रूबरू कराया जिसे काला सच मानकर देश की आधी आबादी ने अपने सीने में दबा रखा था लेकिन सत्यमेव जयते के प्रसारण के बाद लोग देश और समाज में फैली बुराईयों को दूर करने और एक स्वस्थ्य भारत बनाने के लिये खुलकर सामने आने लगे हैं।

बहरहाल, स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर ने एक स्वस्थ्य भारत बनाने की ओर ठोस कदम के साथ आगाज कर दिया है। आप कह सकते हैं कि बंदे में है दम, बंदे मातरम्।

Thursday, March 8, 2012

झारखंड लॉ कमिशन के अध्यक्ष बने राजकिशोर महतो

भारतीय जनता पार्टी प्रदेश उपाध्यक्ष राजकिशोर महतोको झारखंड लॉ कमिशन यानी विधि आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है। श्री महतो के अध्यक्षबनने के बाद अब कई ऐसे मसले हैं जिसपर राज्य की कानूनी नजरीया एकदम साफ होगी।

अभी राज्य में ताजा-ताजा सीएनटी एक्ट का मामला है। इसमामले को लेकर झारखंड की राजनीति चरम पर है। श्री महतो पर पहला दबाब यही होगा किइस मामले में कानूनी पक्ष क्या होगा उसको साफ करे। दूसरा दबाव यह होगा कि मेयर का चुनाव सीधे चुनाव के मार्फत हो या जीते हुए पार्षद अपने में से हीं किसी को मेयर चुने। अभी झारखंड में मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव सीधे तौर पर होता है। लेकिन लोगों की मांग है कि पार्षद हीं अपने में किसी को मेयर और डिप्टी मेयर का चुनावकरें। इसके अलावा दर्जनों मामले हैं जिसका भार राजकिशोर महतो के कंधे पर होगा।

झारखंड लॉ कमिशन के अध्यक्ष बनने पर गिरिडीह के रहने वाले लोजपा के राष्ट्रीय महासचिव राजकुमार राज ने श्री महतो को बधाई दिया है। उन्होंने कहा कि श्री महतो झारखंड के एक बड़े नाम है। सुप्रीम कोर्ट के वकील है। कानून के जानकार हैं। उनमें विवादित कानूनी विषयों को भी बारीकी से समझने की गजब की क्षमता है। श्री राजकुमार राज ने कहा कि मुख्यमंत्री अर्जुन मुंड़ा जी को भी बधाई क्योंकि इस महत्वपूर्ण पद पर उन्होंने एकदम उपयुक्त व्यक्ति का चयन किया है।

धनबाद के विलाल महतो और उदय चंद्रवंशी ने कहा कि अब समाज के कमजोर वर्ग से जुडे लोगों की हितो की रक्षा हो पायेगी। उनके हित में कानून बन पायेंगे। बहरहाल, राजकिशोर महतो, स्वर्गीय विनोद बिहारी महतो के ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनके पिता विनोद बाबू झारखंड मुक्ति मोर्चा(झामुमो) के संस्थापक अध्यक्ष रहे। राजकिशोर महतो भी अपनी राजनीति की शुरूवात झामुमो से की। लेकिन वर्तमान में वे भाजपा में हैं और धनबाद जिले के सिंद्री विधान सभा से विधायक रह चुके हैं।
इनका जन्म 23 सितंबर 1946 को हुआ। शुरू से मेधावी छात्र रहे श्री महतो ने धनबाद जिले स्थित विश्व प्रसिद्ध माइनिंग इंजीनियरिंग कालेज से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। इसके बाद कानून की पढाई कर कानून की डिग्री हासिल की। पटना उच्च न्यायलय के रांची पीठ में 1990-91 के दौरान दो वर्षों तक सरकारी वकील भी रहे।
18 दिंसबर 1991 को अपने पिताजी के निधन के बाद उनके स्थान पर गिरिडीह संसदीय सीट से उपचुनाव जीतकर लोक सभा पहुंचे। इनके पिताजी गिरिडीह से सांसद थे। बिनोद बाबू को झारखंड का भीष्मपिता माह भी कहा जाता है। वे सांसद से भी बढकर एक क्रांतिकारी थे। उन्होंने झारखंड में दब-कुचलों में चेतना जगायी – पढो और लड़ो के नारे साथ। बहरहाल बीजेपीनेता राजकिशोर महतो के कंधों पर एक बड़ी जिम्मेदारी है।

Sunday, January 1, 2012

भारत रत्न के हकदार है ड़ॉ होमी जहांगीर भाभा

राजेश कुमार।

नये साल की सभी को शुभ कामनायें। इस मौके पर आप सभी से आग्रह है कि अगला भारत रत्न डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा को मिले और इसके लिये इस बात को आगे बढायें।

डॉ होमी जहांगीर भाभा एक ऐसा नाम जो हर भारतीय के नाम को दुनिया में गौरवान्वित करता है। दुनिया के महान वैज्ञानिकों में इनका नाम शुमार है। जब परमाणु बम के दम पर दुनिया में नरंसहार हो रहा था और एक-दूसरे देशों को धमकियां दी जा रही थी।उस समय डॉ भाभा ने नाभिकीय उर्जा की बात की थी। यानी परमाणु से बिजली पैदा की जा
सकती है। यानी दुनिया को ध्वस्त करने की वजाय उन्हें बिजली संकट से ऊबारने की बात
की। विश्व निर्माण की बात की। उनके इस नाभिकीय बिजली की कल्पना को मानने के लिये कोई तैयार नहीं था। लेकिन डॉ भाभा ने इस दिशा में काम करने की योजना बनाई और साथ ही भारत को परमाणु शक्ति देश बनाने की ओर काम करना शुरू कर दिया।

डॉ भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई में हुआ था। उन्होंने मुंबई के एलफिंस्टन
कालेज रायल इंस्टीट्यूट आफ साइंस से बीएससी पास किया और उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज
विश्वविद्यालय में रहकर 1930 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1934 में उन्होंने
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। जर्मनी में उनके कास्मिक किरणों पर
प्रयोग और इस पर उनके गहन अध्ययन की। दुनिया भर में चर्चा हुई। उन्होंने भारत वापस आने पर अपने इस अनुसंधान यानी रिसर्च को आगे बढाने का काम जारी रखा। और 1944 में बहुत कम वैज्ञानिकों की मदद से नाभिकीय
ऊर्जा पर रिसर्च का शुरू किया।
विज्ञान के इस क्षेत्र उन्होंने तब काम करना शुरू किया जब दुनिया में इस बारे में बहुत कम को जानकारी थी। अविछिन्न श्रृखंला अभिक्रिया की जानकारी नहीं के बराबर थी। उन्होंने परमाणु ऊर्जा से बिजली पैदा करने
की बात की तो उन दिनों दुनिया को विश्वास नहीं हुआ। भारत को परमाणु के क्षेत्र में शक्तिशाली बनाने के लिये सबसे पहले उन्होंने 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) की स्थापना की।
आजादी के बाद 1948 में भारत सरकार ने उन्हें परमाणु ऊर्जा आयोग का प्रथम अध्यक्ष
नियुक्त किया। उनकी ख्याति दुनिया भर में हो रही थी। उस दौर में खासकर परमाणु के
क्षेत्र में इतने कुशल वैज्ञानिक बहुत ही कम थे। उनकी क्षमता का अंदाजा इसी से
लगाया जा सकता है कि 1953 में जेनेवा में आयोजित विश्व परमाणुविक वैज्ञानिकों के
महासम्मेलन में उन्होंन सभापतित्व भी किया था।

बहरहाल, 24 जनवरी 1966 का दिन भारत के इतिहास में एक दुखद दिन के रूप में सामने आया। फ्रांस के मोंट ब्लांक में एक विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। इसी दुर्घटना के साथ भारत सालो साल परमाणु कार्यक्रम
के मामले में दुनिया से पिछड़ गया लेकिन उनके द्वारा परमाणु कार्यक्रम की जो बुनियाद रखी गयी, उसी आधार पर देश के अन्य वैज्ञानिक तेजी से भारत को परमाणु संपन्न बनाने में जुटे हैं।
आज भारत परमाणु संपन्न देश है। डॉ भाभा की मौत को लेकर कहा जाता है कि वे विदेशी ताकतों के साजिश के शिकार हो गये । विदेशी ताकतों को लगता था कि डॉ भाभा के रहते भारत बहुत जल्द ही परमाणु ताकत बन जायेगा।
डॉ भाभा के योगदान को भूलाया नहीं जा सकता है। डॉ भाभा के योगदान के कारण ही भारत आज परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी आगे तेजी से बढ रहा है।

Sunday, May 8, 2011

सहारा ग्रूप के न्यूज डायरेक्टर उपेंद्र राय को बदनाम करने की कोशिश

प्रवर्तन निदेशालय के एक अधिकारी राजकेश्वर सिंह ने सहारा ग्रूप के न्यूज डायरेक्टर उपेंद्र राय पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उन्हें रिश्वत देने और धमकी देने की कोशिश की। दूसरी ओर उपेंद्र राय ने कहा कि उन्हें बदनाम करने की साजिश है। अब यह मामला अदालत में है। अब माननीय अदालत को फैसला करने दीजिये। लेकिन कुछ लोग सहारा ग्रूप के न्यूज डायरेक्टर राय के खिलाफ प्रचार अभियान में ऐसे जुट गये हैं जैसे किसी से सुपाड़ी खाई हो।

उपेंद्र राय को जानने वालों का कहना है कि उपेंद्र राय जिस भी समाचार को कवर किये वे उसमें रम जाते थे। तह तक काम करते थे। इस दौरान उनके रिपोर्टिंग से जिसके काले कारनामे सामने आ गये या जिसका लेन-देन का हिसाब किताब गडबड़ा गया वह उपेंद्र के खिलाफ हो गये। वह उपेंद्र को बदनाम करने की हर संभव कोशिश करने लगे।

बहरहाल जो भी हो अब मामला माननीय अदालत में है। लेकिन जो लोग उपेंद्र को बदनाम करने में लगे हैं उन्हें उपेंद्र के पत्रकारिता करियर पर भी एक नजर डाल देनी चाहिये। तब शायद उनका भ्रम दूर हो जायेगा।

उपेंद्र राय सहारा न्जूय में बतौर डायरेक्टर ज्वाइन करने से पहले स्टार न्यूज में सिनियर एडिटर थे।

ब्रेकिंग न्जूय - उपेंद्र ने हार्ड न्यूज से लेकर मनोरंजन की दुनिया तक में ऐसे न्यूज ब्रेक किये जिसके बारे में आम लोग जानना चाहते हैं। उन्होंने दर्जनों न्यूज ब्रेक किये हैं लेकिन जो याद है उनका उल्लेख आगे कर रहा हूं। 20 अक्टूबर 2005 को उन्होंने डीमेट एकाउंट घोटाला का पर्दाफाश किया था। इस घोटाले में देश की बड़ी बड़ी फाईनेंश कंपनियां और ट्रैड से जुड़े दिग्गज लोग शामिल थे। इनलोगों ने गरीब लोगों ने नाम पर फर्जी डीमेट एकाउंट खोल रखे थे और करोड़ो करोड़ रुपये के घोटाले को अंजाम दिया। उपेंद्र की रिपोर्ट के बाद दिल्ली से लेकर मुंबई तक की सारी सरकारी मशिनरी हरकत में आई।26 अक्टूबर 2005-2006 के दौरान उपेंद्र ने फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन सहित अन्य कलाकारों के कमाई का लेखा जोखा पेश किया। और टैक्स से जुड़े सारे मामले सामने लाये। यह खबर भी उन दिनों काफी चर्चित रही। जैसे जैसे समय निकलता गया उपेंद्र एक से एक खोजी खबर जनता के सामने लाते गये।5 जनवरी 2007 को उन्होंने घोड़े के कारोबार से जुडे हसन अली को लेकर जबरदस्त खबर ब्रेक की ।

देश-दुनिया से जुड़े 36 हजार करोड के घोटाले का पर्दाफाश जब उपेंद्र ने किया तो सारी दुनिया चकित रह गई। पूरा सरकारी महकमा सकते में आ गया। इतना बड़ा घोटाला देश के सामने पहले कभी नहीं आया था। इसके अलावा दर्जनों हार्ड न्यूज ऐसे हैं जिसका ब्रेक उपेंद्र ने किया। यह न्यूज आज भी छाया हुआ है। और खास बात यह रही कि जिस न्यूज को ब्रेक उपेंद्र ने किया। वह खबर दूसरे रिपोर्टर को अगले दिन भी ठिक से नहीं मिल पाती थी।

मनोरंजन से जुड़े क्षेत्र में भी उपेद्र का जबरदस्त दखल रहा है। फिल्मी दुनियां की हस्ती ऐश्वर्या और अभिषेक बच्चन की शादी को लेकर मीडिया जगत में कयास लगाये जाते रहे। शादी की तिथियों को लेकर अटकलें लगती रही लेकिन पुख्ता तौर पर इस खबर को उपेंद्र ने हीं स्टार न्यूज में ब्रेक किया।


अवार्ड से सम्मानित -उनके जाबांजी रिपोर्टिंग के कारण हीं कई बार उपेंद्र को महत्वपूर्ण पुरूस्कारों से नवाजा गया। 19 जुलाई 2007 को देश का सबसे बढिया टीवी पत्रकार के लिये उन्हें न्यूज टेलीविजन अवार्ड से नवाजा गया। उन्हें इस वर्ष भी शानदार रिपोर्टिंग और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिये लायन गोल्ड अवार्ड से नावाजा गया। इन सबसे पहले उपेद्र को 2006 में स्टार न्यूज एचिवर अवार्ड से नवाजा गया।ब्रेकिंग न्यूज और शानदार रिपोर्टिंग के लिये लगातार किसी न किसी अवार्ड से सम्मानित किया जाना हीं उनकी शानदार सफलता को दर्शाता है।

उपेंद्र ने पत्रकारिता में अपनी कैरियर की शुरूआत राष्ट्रीय सहारा अखबार से शुरू की। सहारा के बाद वे स्टार न्यूज ज्वाईन किये। फिर वे बिजनस चैनल आवाज में गये। यहां यह बता दूं कि उपेंद्र की बिजनस न्यूज के मामले में भी जबरदस्त पकड़ है। उसके बाद फिर स्टार न्यूज आये और अब वे सहारा समय चैनल के न्यूज डायरेक्टर हैं।

बहरहाल यह भी खबर है कि उपेंद्र को हटाने के लिये बड़े बड़े दिग्गज लगे हुए हैं क्योंकि उपेंद्र बहुत कम ही उम्र में सहारा का न्यूज डायरेक्टर बन गये। ऐसे में कई लोग जो सहारा में डायरेक्टर बनने का सपना पाले हुए थे वे अपने सपने को चुर होते देख उपेंद्र के खिलाफ हो गये।

Wednesday, April 6, 2011

भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ एक मजबूत स्तंभ का नाम है सुमन गुप्ता

भ्रष्टाचार के खिलाफ जब पूरे देश में सुगबूगाहट शुरू हो चुकी है तब ऐसे में झारखंड में भी चर्चा होना लाजमी है। झारखंड कैडर की आईपीएस अधिकारी सुमन गुप्ता इन दिनों हर जुबान पर हैं। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली सरकार ने सुमन गुप्ता को पुलिस के वायरलेस विभाग में भेज दिया है। इसको लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा पर अंगुली उठने लगी है। सवाल किये जाने लगें है कि आखिर क्यों एक ईमानदार आईपीएस अफसर को मुख्यधारा से हटाकर वायरलेस विभाग में भेज दिया गया ? क्या ईमानदारी से काम करने का यही ईनाम होता है।


सुमन गुप्ता इससे पहले धनबाद जिले की एसपी थी। वहां उन्होंने आर्गेनाइज क्राईम को पूरी तरह रोक दिया था। अपराध में भारी कमी आ गई थी। लेकिन अर्जुन मुंडा ने विधान सभा का उपचुनाव जितने के बाद हीं आईपीएस अधिकारी सुमन गुप्ता का ट्रांसफर कर दिया। वह भी वायरलेस विभाग में। रांची के महेश रवानी कहते हैं कि सुमन गुप्ता देश की आईरन लेडी हैं। अपराध करने वाले किसी व्यक्ति को नहीं छोडती चाहे वह पुलिस विभाग का ही कोई अधिकारी हो या कोई माफिया डॉन या कोई अन्य भ्रष्टाचारी।


रांची के हीं सुबोध उरांव कहते हैं कि सुमन गुप्ता देश की दूसरी किरण बेदी हैं। ईमानदारी की एक धार भारी पडेगा अपराधियों पर। जब सुमन गुप्ता धनबाद छोड कर जा रही थी तब पूरे शहर की आंखे नम थी। लोगों ने भरे दिल से उन्हें बिदा किया। ऐसा सम्मान पहले किसी भी आईपीएस अधिकारी को नहीं मिला।


बहरहाल जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चल रहे है ऐसे में आईरन लेडी सुमन गुप्ता से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन संपंर्क नहीं हो पाया। शायद वे यही सोच रही होंगी कि ईमानदारी से काम करने, गरीबो पर हो रहे अत्याचार को रोकन और विकास की बातें करने पर ईनाम नहीं, सजा मिलती है। उन्हें जानने वाले लोग बताते हैं कि आईपीएस सुमन गुप्ता अपने कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हट सकती। आज देश ऐसे ही अधिकारियों के दम पर आगे बढ रहा है।

Thursday, September 30, 2010

अदालत का फैसला मंदिर-मस्जिद के पक्ष में

इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच ने विवादित अयोध्या मसले(बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूमि) पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया जाये। एक हिस्सा मंदिर के लिये होगा(जहां राम लल्ला की प्रतिमा है), दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाडा और तीसरा हिस्सा मस्जिद के लिये होगा।

न्यायाधीश एस यू खान, न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल और न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा की तीन सदस्यीय बेंच ने इस मामले में आज (30 सिंतबर, 2010) दोपहर साढे तीन बजे फैसला सुनना शुरू किया था। यह फैसला बहुमत के आधार पर किया गया है सर्वसम्मति के आधार पर नहीं। एक अक्टूबर को रिटायर हो रहे है न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा पूरी जमीन हिन्दुओं को देने के पक्ष में थे लेकिन न्यायाधीश अग्रवाल और न्यायाधीश खान जमीन को तीन हिस्सो को विभाजित करने के पक्ष में फैसला दिया।

तीनो जजों ने इस बात को स्वीकार किया कि विवादित जगह पर पहले मंदिर था। लेकिन न्यायाधीश खान ने यह भी कहा कि वहां पूजा नहीं की जाती थी। इस फैसले को 24 सितंबर को ही सुनाया जाना था लेकिन रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका पर सु्प्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर को निर्णय को एक हफ्ते के लिये टाल देने का आदेश दिया। फिर सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को याचिक पर सुनवाई करते हुए याचिक खारिज कर दी। इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले सुनाने का रास्ता साफ हो गया। और हाई कोर्ट ने 30 सितंबर को साढे तीन बजे फैसला सुनाने का निर्णय लिया। तीन जजों में एक न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा फैसला सुनाने के अगले दिन यानी एक अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं।

फैसले के महत्वपूर्ण बिन्दु –
- सुन्नी वक्फ बोर्ड की राम जन्म भूमि से संबंधित दावे को खारिज कर दिया गया।
- जमीन को तीन भागो में बांटी जायेगी।
- जहां राम लल्ला की प्रतिमा है वही राम जन्मभूमि है।
- जहां राम लल्ला की प्रतिमा है वह इलाका और उसके आसपास के इलाके मंदिर के लिये दी जायेगी।
- अदालत ने यह माना है कि विवादित स्थान पर प्रतिमा बाहर से रखी गई थी।
- मस्जिद के लिये एक तिहाई जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जायेगा।
- एक तिहाई जमीन निर्मोही अखाड़ा को भी दिया जायेगा। इनमें सीता रसोई और राम चबूतरा भी शामिल है।
- मंदिर बनने और पूजा करने पर कोई रोक नहीं।
- अदालत ने तीन महीने तक यथा स्थिति बनाये रखने के लिये कहा।

Tuesday, September 28, 2010

देश में कई समस्याएं हैं धार्मिक उन्माद से बचें।

सुप्रीम कोर्ट ने रमेश चंद्र त्रिपाठी की अर्जी खारिज कर दी। यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट का लखनऊ बेंच अब अयोध्या मसले पर फैसला सुनाने के लिये आजाद है। 30 सितंबर को साढे तीन बजे लखनऊ बेंच अपना फैसला सुनायेगी। 1 अक्टूबर को लखनऊ बेंच के तीन जजों में से एक जज धर्मवीर शर्मा 1 अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं।

अब माहौल गर्म होता जा रहा है। हिन्दू पक्ष और मुस्लिम पक्ष दोनों हीं इस मामले में कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। यदि फैसला किसी एक के पक्ष में जाता है तो दूसरा पक्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। इसलिये देश में धार्मिक उन्माद करने से दोनो ही पक्षों को बचना चाहिये।

ऐसे भी देश में बड़ी बड़ी समस्याएं मौजूद है। भारत को एक साथ दोहरी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अंदरूनी हालात मंहगाई से त्रस्त है। लोगों के पास रोजगार नहीं है। बेमौसम के कारण किसानों की हालात अच्छी नहीं है। फसलें बर्बाद हो रहे हैं। इतना हीं नहीं सीमा पर देश को एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में तबाही मचा रहा है। चीन पाकिस्तान से मिलकर भारत को हर ओर से घेर रहा है। चीन नॉर्थ से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक इलाके में नदियों में बांध बनाकर भारत को पानी से वंचित करने में लगा है। आने वाले दिनों में भारत को पानी के संकट का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में मंदिर-मस्जिद को लेकर धार्मिक उन्माद से बचना चाहिये।

Thursday, August 26, 2010

सबसे बड़े नक्सली नेता हैं राहुल गांधी।

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को नक्सली कहते सुन आपको थोड़ा अटपट्टा जरूर लग रहा होगा लेकिन वास्तव में राहुल गांधी गांधीवादी नक्सली है। जो किसी समस्या के समाधान के लिये हिंसा को सही नहीं मानते लेकिन ससमयाओं के निदान के लिये हर संभव कोशिश करते हैं। उडीसा के कालाहांडी में उन्होंने कहा कि वे वहां के लोगों का सिपाही हैं। वे उनकी आवाज को दिल्ली में उठायेंगें। राहुल गांधी देश के ऐसे पहले उंचे कद के नेता है जो सीधे गरीबो से जुड उनकी समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करते हैं। वे जातिवादी भेदभाव को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। देश के दूर-दराज इलाके में जाकर दलित-आदिवासी सुमदाय को यह एहसास दिलाते हैं कि देश में उनका भी उतना हीं अधिकार जितना दूसरे का। राहुल गरीबो से वादा कर रहे हैं कि वे उनकी सुरक्षा के लिये हर संभव कदम उठायेंगे। वे उनकी समस्याओं को उनके बीच जाकर सुनते हैं। सुलझाने की कोशिश करते हैं। यही काम तो नक्सली कर रहे हैं।

गरीबों के प्रति राहुल गांधी की सच्ची लगन को देखते हुए उनके पार्टी के उच्च वर्ण और सामंतवादी मानसिकता में रंगे नेता भी अपने को गरीबों का सेवक बताते हैं। बताया जाता है कि राहुल गांधी के ईद-गिर्द ऐसे लोग भले हों जो उच्च वर्ण और सामंतवादी मानसिकता वाले हों लेकिन राहुल गांधी इस बात का हमेशा ख्याल रखते हैं कि वे उनके भंवर जाल में नही फसेंगे।

राहुल गांधी अब इस बात को समझने लगे हैं कि विकास के नाम पर जो लुट खसोट हुआ। गरीबों के इलाके में विकास का काम नहीं हुआ। इसी कारण लोग नक्सली बने। कांग्रेस पार्टी के सबसे मजबूत स्तंभ राहुल गांधी का कदम गरीबो के हित में उठते देख गरीबों में एक नया सुर्योदय का अहसास होने लगा है। वही अच्छी बात यह है कि सरकारी स्तर पर भी यह मान लिया गया है कि नक्सली अपने हैं पराये नहीं। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि नक्सली अपने हैं पराये नहीं। नहीं तो पहले उन्हें सिर्फ आंतकवादी कहा जाता था सरकार की ओर से।

प्रधानमंत्री जी और राहुल जी आप दोनों हीं ईमानदार हैं और सामंतवादी प्रवृति के नही हैं। इसलिये आपसे उम्मीद की जा सकती है कि गरीबों के लिये विकास की प्रक्रिया तेजी से शुरू होगी। यदि आप चाहतें हैं कि नक्सल समस्या वास्तव में खत्म हो तो व्यवहार में गरीबों को सामतों और पुलिसिया अत्याचार से बचाना होगा और साथ हीं विकास के काम करने होंगे। यदि ऐसा व्यवहार में नहीं होता है तो फोर्स के बल पर नक्सली मूवमेंट को रोका नहीं जा सकेगा। आप एक मारोगे तो इस चार जुड़ जायेंगे।

Monday, July 26, 2010

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में गुजरात के मंत्री शाह पहुंचे सलाखों के पीछे। सोहराबुद्दीन शाह का हीं गुर्गा था।

गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह को सीबीआई की अदालत ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। उनपर हत्या तक का आरोप है। आईपीसी की धारा 201, 302, 365, 368 और 384 के तहत आरोप लगाए गए हैं जो हत्या, अपहरण, सबूत नष्ट करना और प्रताड़ना की धाराएं हैं। 2005 में सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में सीबीआई ने 23 जुलाई को शाह के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था।

इस मामले में सीबीआई ने गुजरात के गृह राज्य मंत्री अमित शाह को सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में हाजिर होने के लिये तीन समन भेजे लेकिन वे हाजिर नहीं हुए। इसके बाद उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई।

शाह का इस्तीफा मोदी ने स्वीकार किया

आज सुबह शाह के अपना पक्ष रखने के लिये सीबीआई दफ्तर पहुंचे जहां उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया और सीबीआई के विशेष जज ए. वी. दवे ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में साबरमती जेल भेज दिया। इससे पहले मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमित शाह का गृहराज्य मंत्री पद से दिये इस्तीफे को स्वीकार कर लिया था।

अमित शाह की पेशी के दौरान सीबीआई ने लोगों के उम्मीद के विपरित शाह की रिमांड की मांग नहीं की। शाह ने मीडिया से कहा कि वे निर्दोष हैं। उनपर लगाये गये सभी आरोप राजनीति से प्रेरित हैं। शाह ने कहा कि सोहराबुद्दी के घर से 40 से ज्यादा ए के 47 बरामद हुए हैं। उसके साथ गुजरात पुलिस ने जो किया वह सही किया।


गुजरात पुलिस ने 2005 में सोहराबुद्दीन को एक एनकाउंटर में मार गिराया और आरोप लगाया कि वह आंतकवादी संगठन लश्कर का आदमी है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की योजना बना रहा था। लेकिन यह फर्जी एनकाउंटर था इसकी आशंका तभी होने लगी जब पुलिस ने सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी और एनकाउंटर का प्रत्यक्षदर्शी तुलसी प्रजापति को पुलिस ने अगवा कर लिया। पुलिस ने दावा किया कि प्रजापति एक मुठभेड़ में मारा गया। जबकि सोहराबुद्दीन की पत्नी की लाश आज तक नहीं मिली। बताया जाता है कि गुजरात के पुलिस अधिकारी ने उसे मारकर जला कर उसकी राख को बिखेर दिया।

इस फर्जी एनकाउंटर के मामले में गुजरात और राजस्थान के 14 पुलिस अधिकारी सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं। एनकाउंटर के फर्जी होने का मामला जैसे हीं सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने ये पूरा मामला सीबीआई को सौप दिया।


शाह के खिलाफ हत्या, जबरन वसूली और आपराधिक षडयंत्र के आरोप हैं, सोहराबुद्दीन पहले शाह के लिये हीं काम करता था।

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में शामिल गृहराज्यमंत्री अमित शाह एक्सटॉर्शन रैकेट चलाते थे। वह एक खूंखार गिरोह के सरगना था। सोहराबुद्दीन शाह का हीं खास गुर्गा था। सोहराबुद्दीन एन्काउटर मामले में सीबीआई ने अपने चार्जशीज में शाह के खिलाफ हत्या, आपराधिक षडयंत्र, अपहरण और जबरन वसूली के आरोप लगाये हैं।
शाह के कोर ग्रूप में चार लोग बताये जातै हैं खुद अमित शाह, तत्कालीन डीआईजी डी जी बंजारा, डीसीपी अभय चुडस्मा और सोहराबुद्दीन। अमित शाह अपराध का योजना बनाता, उसे अंजाम तक पहुंचाता था सोहराबुद्दीन और पुलिस प्रोटेक्शन या दूसरे गिरोह का खात्मा का काम डीआईजी बंजारा और डीसीपी चुडस्मा के जिम्मे था। सीबीआई ने इन अपने चार्जशीट में इन चारों का उल्लेख किया है।

सोहराबुद्दीन का शाह से अलग होना -

समय बीतने के साथ सोहराबुद्दीन ने शाह को खबर किये बिना हीं अपहरण और वसूली जैसे मामले को अंजाम देने लगा। उसने राजस्थान के कई मार्बल व्यापारियो से पैसे वसुले। उनमें से कई व्यापारी बीजपी से जुड़े थे और उन दिनों राजस्थान में बीजेपी की सरकार थी। यहीं से शाह और सोहराबुद्दीन के रिश्ते में तनाव आ गया। सोहराबुद्दीन को लेकर शाह पर दबाव इतना अधिक था कि उसने आखिरकार सोहराबुद्दीन को सदा के लिये रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया।


सोहराबुद्दीन और प्रजापति -

सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति अपराध जगत से जुडे थे। वे लोग वसूली का काम रहे थे। दोनो ने मिलकर एक गैंग बना लिया था। सोहराबुद्दीन साल 2002 में गैंग बनाने के बाद अपने प्रतिद्वंद्वी हामिद लाला की हत्या कर दी। सीबाआई के मुताबिक, सन् 2004 में सोहराबुद्दीन ने राजस्थान के आरके मार्बल्स के मालिक पटनी ब्रदर्स को एक्सटॉर्शन के लिए फोन किया। धमकी दी। पटनी ब्रदर्स के संपंर्क बीजेपी में काफी उपर तक थी। बताया जाता है कि सोहराबुद्दीन को दबाने के लिये शाह पर भारी दबाब पड़ने लगा। बढ़ते दबाव के बीच शाह ने आखिरकार सोहराबुद्दीन को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया। शाह ने इसकी जिम्मेवारी दी पुलिस अधिकारी डी जी बंजारा को।

सोहराबुद्दीन के खिलाफ गुजरात में कोई मामला दर्ज नहीं था, फर्जी केस दर्ज किये गये

सोहराबुद्दीन के खिलाफ में कोई चार्जशीट दाखिल नहीं था। इसलिये उसे गिरफ्तार करना गुजरात पुलिस के लिये आसान नहीं था। गुजरात पुलिस की जगह यदि शाह पुलिस कहें तो अधिक उपयुक्त होगा। सोहराबुद्दीन को ठिकाने लगाने के लिये शाह हर कोशिश करनी शुरू कर दी। इसी बीच शाह ने पुलिस अधिकारी बंजारा को सोहराबुद्दीन के खात्मे की कामन सौंपी। सबसे पहले बंजारा ने पुलिस क्राइम ब्रांच के चीफ अभय चुडस्मा से संपंर्क कर उसे पूरी जानकारी दी और सोहराबुद्दीन के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। इसके बीच सोहराबुद्दीन को निपटाने की तैयारी शुरू हो गई।

सोहराबुद्दीन को पकडने के लिये चुडस्मा ने उसके सहयोगी प्रजापति से संपंर्क किया। और सोहराबुद्दीन के बारे में कब कहां मिलेगा जानकारी मांगी। साथ हीं प्रजापति को पुलिस अधिकारी चुडस्मा ने आश्वासन दिया कि वह उसकी ह्त्या नहीं करेगा।


सोहराबुद्दीन, कैसर बी और प्रजापति की हत्या

बंजारा ने प्रजापति को भरोसा दिलाया कि पॉलिटिकल दबाव के तहत उसे सिर्फ गिरफ्तार करना है एन्काउंटर नहीं। बंजारा के विश्वास दिलाने के प्रजापति ने पुलिस को सोहराबुद्दीन का पता-ठिकाना बता दिया। गुजरात पुलिस के दोनो अधिकारी बंजारा और चुडस्मा ने एक लोकल व्यापारी से क्वॉलिस लिया। दोनो अधिकारी को पता चल गया था कि किस बस में सोहराबुद्दीन अपनी पत्नी और तुलसी प्रजापति के साथ सफर कर रहा था। पुलिस टीम ने डिंगोला के पास बस को रूकवाया और सोहराबुद्दीन को बस नीचे उतरने को कहा। सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी भी उसके साथ जाने के लिये जिद्द करने लगी।


इस बीच गुजरात पुलिस ने प्रजापति को एक पुराने केस के मामले में राजस्थान भेज दिया और इधर सोहराबुद्दीन की हत्या कर दी गई और उसे एन्काउंटर का नाम दिया गया। बाद में सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी की भी हत्या कर दी गई। कौसर की लाश को इलोलो में जला दी गई। इललोलो डीआईजी बंजारा का होमटाउन है। यहीं पर उसकी अस्थियां नर्मदा नदी में बहा दी गई ताकि किसी को कुछ भी मालूम न पड़े। सीबीआई के चार्जशीट में ये सारी बातें उल्लेखित है।

चार्जशीट के मुताबिक सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने उसके भाई की हत्या की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इसके बाद चुडस्मा ने केस वापस लेने के लिए उसे 50 लाख रुपये का लालच दिया। जब रुबाबुद्दीन ने इनकार कर दिया तो चुडस्मा ने उसे जान से मारने की धमकी दी।


अमीन बने सरकारी गवाह, शाह की मुश्किलें बढ़ीं

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अमित शाह की मुश्किलें अभी और बढ़ने वाली हैं। सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में ही जेल में बंद क्राइम ब्रांच के पूर्व एसीपी एन.के. अमीन ने सरकारी गवाह बनने की इच्छा जताई है। इस बात की जानकारी अमीन के वकील जगदीश रमानी ने दी।

गौरतलब है कि एसीपी अमीन के साथ-साथ आईपीएस अधिकारी डी. जी. बंजारा और आर. के. पांड्या को भी गिरफ्तार किया गया था। अमीन को सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी के अपहरण के मामले में एक गवाह के बयान के आधार पर 2007 में गिरफ्तार किया गया था। बाद में सीबीआई ने इस साल मई में डीसीपी (क्राइम)अभय चुडस्मा को गरिफ्तार किया था और गुजरात कैडर के 6 आईपीएस अधिकारियों को समन भेजकर पूछताछ की थी।

सीबीआई कांग्रेस जांच ब्यूरो नहीं – प्रधानमंत्री
अमित शाह के गिरफ्तारी को लेकर बीजेपी लगातार यह कहते आ रही थी कि यह सबकुछ राजनीतिक षडयंत्र का हिस्सा है। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए साफ कर दिया कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट की देख-रेख में हो रहा है। विपक्ष इसे अच्छी तरह जानता है। इसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) 'कांगेस जांच ब्यूरो' नहीं है।

Thursday, July 15, 2010

एक व्यंग्य - नितिन गडकरी ने हिंदी भाषी नेताओं को गाली देने में अपने दोस्त राज ठाकरे को भी पीछे छोड़ दिया।

महाराष्ट्र के दो नेता और दोनो हीं दोस्त हैं। और दोनो हीं अपने-अपने पार्टी के अध्यक्ष हैं। आप समझे क्या कि ये कौन हैं? ये हैं बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी और एमएनएस के अध्यक्ष राज ठाकरे।


लोग मजाक करने लगे हैं कि दोनों दोस्तों में एक बार बाजी लगा था कि उत्तर भारतीयों को कौन अधिक से अधिक गाली दे सकता है। इस मामले में शुरू शूरू में एमएनएस नेता राज ठाकरे ने नितिन गडकरी को काफी पीछे छोड दिया। देश भर में हंगामा हुआ। महाराष्ट्र के कई इलाकों में उत्तर भारतीयों की जमकर पीटाई हुई। राज ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनियां गांधी से लेकर राजद नेता लालू यादव और सपा नेता मुलायम सिंह और तत्कालीन सपा नेता अमर सिंह को खूब खरी खोटी सुनाई। नकारात्मक प्रचार को लेकर राज चर्चित हो गये।


यही बात राज ठाकरे के मित्र नितिन गडकरी को खल गया कि मैं उनसे कैसे पीछे हो गया। फिर उन्होंने चाल चली बीजेपी के नेतृत्व स्तर की आपसी लड़ाई का फायदा उठातचे हुए आरएसएस की मदद से बीजेपी के अध्यक्ष हो गये। फिर उन्होंने पंजाब में राजद अध्यक्ष लालू यादव और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के खिलाफ खूब खरी खोटी सुनाया। यहां तक कहा गया कि वे कांग्रेस के तलवे चाटने वाले हैं लेकिन फिर वे थोड़ा डर गये। क्योंकि नितिन गडकरी को महाराष्ट्र के बाहर की राजनीति करनी थी वहां उनकी पीटाई होने की गुजाइंश थी इसलिये उन्होंने माफी मांग ली।


फिर कुछ समय बाद कांग्रेस के खिलाफ बयान दे दिया। उन्होंने कहा कि क्या कांग्रेस अफजल गुरू का जमाई है। क्या कांग्रेस वालों ने अपनी बेटी दी रखी है अफजल गुरू को। एक अन्य सभा में उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह को औरंगजेब की औलाद कह दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिये वे माफी नहीं मांगेगे। उनके इस बयान से नितिन का सीना चौड़ा हो गया। उसने राज ठाकरे को मुंह चिढाने वाला कारनामा कर दिखाय था। यानी राज ठाकरे ने जो भी दुषित बयान दिया वो महाराष्ट्र में दिया जहां वे पूरी तरह सुरक्षित हैं। वहीं नितिन गडकरी ने उतर भारत के गढ में घुस कर उत्तर भारतीय नेताओं को गाली दी। यहां पर वे उत्तर भारतीयों को गाली देने में राज को भी पीछे छोड़ दिया।

नितिन गडकरी कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को भी गाली देकर अपना कॉलर टाईट कर रहे थे क्योंकि राज ठाकरे ने भी मध्य प्रदेश के नेताओं को गाली नहीं दे पाये थे क्योंकि मध्यप्रदेश में मराठी बड़ी संख्या में रहते हैं। और राज का पूर्वज भी मध्य प्रदेश में रहते थे।


बहरहाल यह तो मानना पड़ेगा कि बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने हिंदी भाषी नेताओं को गाली देने में एमएनएस नेता राज ठाकरे को भी पीछे छोड़ दिया।

मैं तो श्री बलभद्र सिंह की औलाद हूं लेकिन गडकरी जी आप किसकी औलाद हैं महाराणा प्रताप की या शिवाजी की – दिग्विजय सिंह

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी की टिप्पणी से कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह बेहद नाराज हैं। वे काफी गुस्से में है। उनका गुस्सा करना लाजिमी है। कांग्रेस महासचिव ने नितिन गडकरी पर उसी की भाषा में पलटवार करते हुए पूछा है कि बीजेपी अध्यक्ष को यह बताना चाहिये कि वे किसके औलाद है शिवाजी महाराज के या महाराणा प्रताप के।
श्री सिंह ने इंदौर प्रेस क्लब में संवाददाताओं से कहा, ‘‘माननीय नितिन गडकरी जी ने मेरी वल्दियत पर सवाल उठाते हुए कहा कि मैं शिवाजी की औलाद हूं या औरंगजेब की। मैं तो श्री बलभद्र सिंह की औलाद हूं.’’ मेरा संबंध मध्यप्रदेश की पूर्व राघौगढ़ रियासत के राजवंश से है। लेकिन गडकरी जी आपका। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भाजपा की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष प्रभात झा को भी निशाने पर लिया, जिनके साथ उनका हालिया ‘पत्र युद्ध’ काफी चर्चा में रहा था। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा ‘‘गडकरी और झा के इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों और संस्कृति का पता चलता है.’’

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी से उनके हीं पार्टी के लोग कन्नी काटने लगे हैं। उनके साथ एक मंच शेयर करने में संकोच महूसूस करते हैं। बीजेपी नेताओ को लगता है कि उनके साथ यदि एक मंच पर आये तो सबसे पहले यही डर लगता है कि वे न जाने कब क्या कह जायें। और गडकरी जी के साथ साथ उनकी भी छवि खराब हो जायेगी। लेकिन आरएसएस के कारण उनकी मजबूरी है कि वे गडकरी जी को अपना नेता माने।

4 जुलाई की बात है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पहली बार बीजेपी अध्यक्ष की सभा होने वाली थी। बताया जाता है कि उनकी सभा में सिर्फ एक सौ लोग हीं जुटे होंगे। उसमें भी लाज बचाने के लिये चालीस से पाचस कार्यकर्ता तो आरएसएस के सदस्य थे। राज्य के महत्वपूर्ण नेताओं ने भी उन्हें महत्व नहीं दिया। आप सोच सकते हैं एक ऐसी पार्टी जो संसद में मुख्य विपक्ष की भूमिका है। कई राज्यों में बीजेपी की सरकार है। उसके पीछे आरएसएस जैसे संघटन है, इसके बावजूद उस पार्टी के नेता नितिन गडकरी को सुनने मुठ्ठी भर लोग हीं पहुंचे।

दिग्विजय जी आपका गुस्सा जायज है लेकिन आप भी नितिन गडकरी के तरह बयान देंगे तो उचित नहीं है। कीचड़ में पत्थर फैकियेगा तो छींटा आपको भी पड़ेगा।

Tuesday, July 13, 2010

दिग्विजय सिंह औरंगजेब के औलाद हैं – नितिन गडकरी

आरएसएस का प्रतिनिधित्व करने वाले बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ब्राहम्णवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। वे सोचते हैं कि उन्होंने जो कहा वह सही कहा। अभी हालहीं में उन्होंने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को औरंगजेब का औलाद कह दिया। इसका अर्थ सभी जानते हैं।

आईये नजर डालते हैं भाजपा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष गडकरी के तीन बयानों पर – 1. राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव कांग्रेस के तलवे चाटते हैं। 2. संसद हमले का दोषी अफजल गुरू क्या कांग्रेस का दामाद है? क्या कांग्रेस वालों ने अपनी बेटी दी है? 3. कांग्रेस के वरिष्ट नेता दिग्विजय सिंह मुगल बादशाह औरंगजेब की औलाद है।

ये तीनो बयान असंसदीय है। एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता को इस प्रकार के बयान नहीं देने चाहिये। लेकिन वे लगातार इस तरह के बयान दे रहें हैं जो असंसदीय है। आखिर क्यो?
इसके दो कारण हो सकते हैं – 1. या तो वे अभी राष्ट्रीय राजनीति के लायक नहीं थे उन्हें इतना बड़े पद पर बैठा दिया गया और वे अपनी पद की गरिमा को समझ नहीं पाये। 2. या जान बूझ कर एक रणनीति के तहत वे इस तरह का बयान दे रहे हैं।

उनके बयान को लेकर मीडिया जगत में विचार मंथन शुरू हो गया है। आखिर राजद अध्यक्ष लालू यादव के खिलाफ असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने के बाद माफी मांगना। फिर कुछ समय बाद कांग्रेस के खिलाफ असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करना और थोडे समय बाद सीधे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को औरंगजेब की औलाद कहना और माफी मांगने से इंकार करने को, राजनीतिक विश्लेषक अपने नजरीये से देखने लगे हैं।

राजनीतिक अर्थ -
नितिन गडकरी ने लालू से माफी क्यों मांगी?

दरअसल बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जमकर असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया था। और देशभर में इसकी प्रतिक्रिया हुई थी। बाद में माफी मांग ली। जानकार बताते हैं कि आरएसएस के कुछ नेताओं का मानना है कि लालू-मुलायम राजनीतिक तौर पर एक बड़ी ताकत तो हैं हीं। और पिछड़ो के नेता माने जाते हैं। उनपर इस प्रकार के हमले का मतलब है पिछड़े वर्ग के जो लोग बीजेपी से जुड़े हैं, वे बीजेपी से कटने लगेगें। क्योंकि वे पहले से हीं बीजेपी से नाराज है क्योंकि बीजेपी ने पिछड़े वर्ग के बीजेपी नेता कल्याण सिंह और उमा भारती को किनारा कर दिया है। दूसरा वे दोनो हीं आक्रमक हैं ऐसे में बिहार और उत्तर प्रदेश में नितिन गडकरी के लिये सभा या रैली करना मुश्किल भरा होगा। इसलिये आरएसएस की सलाह पर नितिन गडकरी ने बिना देर किये माफी मांग ली।


कांग्रेस और दिग्विजय सिंह पर हमला क्यों?
देश भर में बीजेपी का मुकाबला कांग्रेस से है। इसलिये कांग्रेस पर उनका राजनीतिक हमला करना वाजिब है। लेकिन इस तरह के असंसदीय भाषा के साथ नितिन गडकरी इस्तेमाल करेंगे यह कोई सोचा नहीं था। उनका असंसदीय भाषा कांग्रेस पर था उन्होंने किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया था। लेकिन उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ट नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ असंसदीय भाषा का इस्तेमाल कर सारी हदें पार कर दी।

दिग्विजय सिंह को औरंगजेब का औलाद क्यों कहा?
नितिन गडकरी आरएसएस से जुड़े हैं। आरएसएस ब्राहम्ण जाति का प्रतिनिधित्व करता है। नितिन गडकरी भी ब्राहम्ण हैं। राजनीतिक तौर पर आरएसएस के लिये राजपूत जाति का कोई खास महत्व नहीं है। उनके लिये राजपूत से अधिक दलित और आदिवासी अधिक प्रिये है। आरएसएस राजपूत जाति का इस्तेमाल सिर्फ लठैतों के तौर पर करता रहा है। पहले एक जमाना था जब चुनाव में बूथ लुटने का काम हो या दंगे करवाने का। ऐसे में वे राजपूत जाति से जुड़े नेताओं का गुणगान करते और दंगल में उतार देते थे। लेकिन अब इन दोनों हीं काम के लिये राजपूत जाति उपयुक्त नहीं रहा। क्योंकि चुनाव तगड़े सुरक्षा निगरानी में होने लगे हैं। मंडल-कमंडल के बाद राज्यों की सरकारों में पिछड़े नेताओं का दबदबा है। बीजेपी अध्यक्ष गडकरी महाराष्ट्र के हैं और महाराष्ट्र में राजपूत जाति का कोई वजूद नहीं है।
नितिन गडकरी यह भी जानते हैं राजनीति में अब राजपूत जाति का उतना महत्व नहीं है जितना अन्य वर्ग के लोगों का। यदि राजपूत जाति नेतृत्व स्तर पर बढता है तो वह ब्राहम्ण वर्ग का हिस्सा काटेगा। राजनीतिक गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी अध्यक्ष गडकरी ने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को औरंगजेब की औलाद कह कर बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह समेत तमाम राजपूत जाति को नीचा दिखाया है। राजनाथ सिंह को सिर्फ एक मोहरे के रूप बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया था। और जसवंत सिंह को सिर्फ इस्तेमाल करने के लिये बीजेपी में लाया गया है।

बहरहाल, बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष हैं। उन्हें संभल कर कोई बयान देना चाहिये। विराधी दल के अध्यक्ष का एक विशेष महत्व होता है। इस प्रकार की भाषा लोकतंत्र के लिये अच्छा नहीं है।

Friday, July 9, 2010

गडकरी जी मजबूत विपक्ष की भूमिका फूहड बयान से नहीं चलेगा।

बीजेपी एक राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन उसके अध्यक्ष नितिन गडकरी के बयान बहुत हीं फूहड़ है। उन्होंने 8 जुलाई को एक सभा में कहा कि अफजल गुरू कांग्रेस का दामाद है। क्या कांग्रेस वालों ने उसे अपनी बेटी दी है। इस पर गडकरी जी का कहना है कि वे माफी नहीं मांगेगे। उन्होने जो कहा सही कहा। इस तरह का बयान एक राष्ट्रीय अध्यक्ष के जुबान से अच्छा नहीं लगता। यह कोई पहला मौका नहीं है इससे पहले भी उन्होंने आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव के लिये अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था।

कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला और कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। राजीव शुक्ला का कहना है कि अफजल गुरू संसद हमले का दोषी है। यह घटना जब हुई तब बीजेपी की सरकार थी केंद्र में। तब उन्होंने फांसी पर क्यों नहीं लटका दिया। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि बीजेपी के सम्माननीय अध्यक्ष पूरी तरह से 'मानसिक रोगी' हो गए हैं, इसलिए वे क्या बोल रहे हैं उन्हें खुद नहीं मालूम।

बहरहाल बीजेपी अध्यक्ष गडकरी के इस तरह के बयान से खुद बीजेपी के वरिष्ठ नेता सहमत नहीं है। लेकिन वह खुलकर कुछ नहीं कहना चाहते क्योंकि बीजेपी अध्यक्ष गडकरी आरएसएस के प्रतिनिधि हैं बीजेपी में। बताया जाता है कि एक कॉर्पोरेटर स्तर के नेता को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का अध्यक्ष आरएसएस ने हीं बनवाया।

इसमें गडकरी जी का भी कोई खास दोष नहीं है। क्योंकि वे इस स्तर के नेता होंगे वे कभी सोचे भी नहीं थे। उनका आचरण लोकल स्तर का था उसी स्तर की राजनीति की। वैसे हीं भाषा का इस्तेमाल करने वाले लोग उनके सर्किल में हैं। वे इस तरह की बातचीत के आदि हैं। उन्हें ये सब गलत नहीं लगता। लेकिन अब वे क्या करें। आरएसएस ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा दिया। वे संभलकर बोलने की कोशिश करते हैं लेकिन औच्छी हरकत की आदी रह चुके गडकरी जी कभी कभी अपने असली रूप में आ जाते हैं। अब उनकी सच्चाई छुप नहीं पाती। क्योंकि राष्ट्रीय स्तर का ओहदा पाने के बाद मीडिया की नजर उनपर हमेशा बनी रहती है और वे अपने बुराइयों के लिये चर्चा में आ जाते हैं।

गडकरी जी आप अपने व्यवहार में सुधार लाये। इस समय देश को एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है।

Thursday, July 8, 2010

जातीय व्यवस्था खत्म करने के लिये अगड़ी जातियों को हीं पहल करनी होगी - कृष्ण किशोर पांडे

जब कभी भी भारतीय राजनीति के बारे में चर्चा होगी तो जातीय राजनीति की चर्चा किये बिना पूर्ण राजनीति की चर्चा संभव नहीं है। मंडल-कंमडल की राजनीति के बाद भारतीय राजनीति के बदलाव के बारे में बहुत कुछ लिखा गया लेकिन आधे सच के साथ। कुछ लोगो ने सच्चाई के साथ लेखन किया। लेकिन उनकी लेखन पर भी दबाव पड़ने लगा। दैनिक हिन्दुस्तान में वरिष्ठ सहायक संपादक रहे कृष्ण किशोर पांडे जी ने अपने लेखन में कई बार समाज के बदलते राजनीति की ओर इशारा किया लेकिन लोग उसे मानने से इंकार करते रहे। उनका कहना था कि समाज के अगडे वर्ग को पिछडे वर्ग के लिये खुलकर ईमानदारी से काम करना चाहिये और उसी प्रकार समाज के कमजोर वर्ग को अगड़े समाज के लिये खुलकर ईमानदारी से काम करना चाहिये। नहीं तो समाज का विकास संभव नहीं है। इसमें पहल अगड़े समाज को हीं करना होगा क्योंकि हालात को बिगाड़ने मे अगड़े समाज का ही हाथ रहा है। यदि ऐसा नहीं होता है तो आने वाले दिनों में समाज का सबसे ताकतवर अगड़ा समाज, सबसे कमजोर हो जाये तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये।


कृष्ण किशोर पांडे जी की बात धीरे-धीरे सच लगने लगी है। वे हमेशा देश और समाज के उज्जवल भविष्य के लिये हीं चिंता करते रहे। अपनी लेखन से लोगों को मार्ग दर्शन देते रहे। इसके लिये श्री पांडे जी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लोग उन्हें भी मंडलवादी कहने लगे। लेकिन वे किसी की भी प्रवाह नहीं की। उन्होंने वही किया जो देश और समाज के हित में रहा।

मंडल-कमंडल -
मंडल-कमंडल के दौर में जब देश झुलस रहा था तब श्री पांडे ने कहा था कि यह सब कुछ देश के लिये अच्छा नहीं है। और जिस दुषित मानसिकता के साथ विरोध को अंजाम दिया जा रहा है उससे यही लगता है कि अगड़ा समाज खुद हीं अपने पैर में कुल्हाडी मार रहा है। उसी दौर में उन्होंने कहा था कि एक दिन ऐसा समय जल्द हीं आने वाला है कि अगड़ा समाज खुद हीं अपमानित होने लगेगा। और राजनीति के हाशिये पर धकेल दिये जायेगें।

उनकी भविष्यवाणी धीरे धीरे सच होने लगने लगी है। एक समय था कि जब केंद्र सरकार से लेकर देश अधिकांश राज्यों में उच्च वर्ग का दबदबा था। अधिकांश राज्यों में मुख्यमंत्री अगड़े समाज के हीं होते थे। केंद्रीय मंत्रियों में अगड़े समाज के नेता हीं दिखते थे लेकिन मंडल-कंमडल की ने सारे राजनीति परिदृश्य हीं बदल दिया है। आज लोग यह गिनते हैं कि किसी राज्य में कोई अगड़ा मुख्यमंत्री है या नहीं। झारखंड, बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रेदश, आदि राज्यों पर नजर दौडायें तो हर जगह आपको पिछड़े वर्ग के हीं मुख्यमंत्री दिखेंगे।


निष्कर्ष – श्री कृष्ण किशोर पांडे जी का कहना था कि यदि आप जहर की फसल पैदा करेंगे तो जहर हीं मिलेगा अमृत नहीं। समाज के अधिकांश अगड़े वर्ग के लोगो ने जातीय व्यवस्था को बनाये रखा और पिछड़े-दलित-आदिवासी समुदाय के लिये काम नहीं किया। उन्हें आगे नहीं बढने दिया। नतीजा जब राजनीति ने करवट ली तो अगड़े समाज के सभी बड़े नेता धाराशायी हो गये। अभी भी समय है कि जातीय कटुता को छोड़ अगड़े समाज के लोग खुलकर कमजोर समाज के लिये काम करें तभी आप समाज की धारा में बने रहेंगे अन्यथा जिस प्रकार पिछड़े समाज के साथ हुआ वही हाल अगड़े समाज का होगा।

Wednesday, July 7, 2010

साक्षी पहुंची ससुराल, रांची में जबरदस्त स्वागत

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उनकी पत्नी साक्षी रांची पहुंच गये है। आज यानी 7 जुलाई को महेंद्र सिंह धोनी का जन्म दिन भी है। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच रांची पहुंचे साक्षी-धोनी का रांची में उनके प्रशसकों ने शानदार स्वागत किया। और साक्षी-धोनी दोनो ने हीं हाथ हिलाकार अपने प्रशसकों का बधाई स्वीकार किया। घर पहुंचने पर उनकी मां देवकी देवी और बहन जयंती ने घर में आई नई दुल्हन साक्षी और धोनी की परंपरा अनुसार आरती उतारी। महेंद्र सिंह धोनी के विवाह में उनके घनिष्ट मित्र और झारखंड के पूर्व गृहमंत्री सुदेश महतो भी देहरादुन पहुंचे थे।